Author Archives: अजय प्रताप सिंह

मौखिक दुर्व्यवहार के घाव या निशान  

दुर्व्यवहार शारीरिक, मौखिक, भावनात्मक या यौन प्रकृति का हो सकता है। यह लेख विशेष रूप से मौखिक दुर्व्यवहार के बारे में है। मौखिक दुर्व्यवहार अक्सर भावनात्मक शोषण के साथ ओवरलैप होता है। यह काफी सामान्य है और अक्सर इसे क्रोध के रूप में खारिज कर दिया जाता है। हालाँकि, सादे क्रोध और क्रोध से प्रेरित मौखिक दुर्व्यवहार के बीच अंतर की एक पतली रेखा है। यह इंगित करना कठिन हो सकता है कि क्रोध कहाँ समाप्त होता है और दुर्व्यवहार कहाँ शुरू होता है। एक अपमानजनक व्यक्ति वह होता है जो तीव्र दर्द और आघात से गुजरा है और अनजाने में दूसरों पर भी ऐसा ही थोपता है। व्यक्ति अधिकांश समय बहुत अच्छा हो सकता है। लेकिन जब उसे ट्रिगर किया जाता है, तो वह एक जहरीले सांप में बदल जाता है जो आपको सबसे ज्यादा चोट पहुंचाने वाली जगहों पर काटता है और आपके शरीर और दिमाग में विष भर देता है। 

याद करें कि जब कभी किसी ने आपको डराने के लिए जोड़-तोड़ की रणनीति का इस्तेमाल किया, आप पर अन्याय का आरोप लगाया, आपका अपमान किया, आपको नाम दिया, आपको गलती न होने पर भी गलती मानने को बाध्य किया या ऐसा ही कुछ। आपसे कही जा रही सभी बकवासों से आप शायद चौंक गए थे, लेकिन आप शक्तिहीन महसूस कर रहे थे क्योंकि आप दूसरे व्यक्ति को निष्पक्ष नहीं बना सके। 

हम में से कई लोगों ने अलग-अलग रिश्तों में ऐसे अनुभव किए हैं, हालांकि यह माता-पिता-बच्चे, पति-पत्नी, बहुत ही करीबी मित्रों आदि जैसे करीबी रिश्तों में होने की अधिक संभावना है। कई बार, हम भी अपने शब्दों से दूसरों को गाली देने और दर्द देने वाले हो सकते हैं। हमें अपनी हरकतों को भी स्वीकार करना होगा। 

किसी भी प्रकार की नकारात्मक भावनाएं और अनुभव चाहे आपके स्वयं के हों या आप पर थोपे गये हों, आपके पूरे के पूरे ऊर्जा तंत्र, आपके शरीर और आपकी भावनाओं को बर्बाद कर सकते हैं। परिणाम शारीरिक और मानसिक व्याधियों के रूप में प्रकट होगा। ऐसी सभी स्थितियों के प्रभाव को आपकी जीवनी शक्ति के भीतर से, आपके ऊर्जा क्षेत्र से, आपके आभामंडल से या यूँ कहें आपके पूरे के पूरे व्यक्तित्व से मिटना ही होगा।  

और अधिक जानकारी के लिये आप संपर्क कर सकते हैं।  

अभी के लिये बस इतना ही।  

आपके भीतर के परमात्मा को हृदय से प्रणाम।  

नकारात्मक ध्यान

 ध्यान के विषय में इतना कुछ पहले ही लिखा, पढ़ा, देखा और सुना जा चुका है कि उस बारे में फिर से कुछ कहना पहिये की दुबारा खोज जैसा ही होगा।  यहाँ पर मैं बात ध्यान की ही करूंगा परंतु किसी और संदर्भ में।  

मैं समझता हूँ कि ध्यान लगाने की कोशिश करने जैसा आसान और आनंददायक काम कुछ और हो ही नहीं सकता है।  करना क्या है बस आँखें बंद करो और चुपचाप बैठे रहो, बस इसी छोटी सी क्रिया से प्रारंभ होता है वह जो आप के जीवन में वह सब कुछ उत्पन्न कर सकता है जिसकी आपको प्रत्यक्ष या परोक्ष इच्छा है।  लेकिन समस्या यह है कि हमें पता ही नहीं है हमारी इच्छाओं के बारे में।  इच्छाएं तो हमारी अनन्त हैं लेकिन हमें उनका न आदि पता है और न अंत।  

हमारे सर्वाधिक विशेष और परमप्रिय परामर्शदाता हमारे छोटे भाई श्री अरुण हैं।  अरुण की पूजा पाठ, तंत्र मंत्र, आध्यात्म आदि में गहरी रूचि है और परिणाम स्वरूप लगभग २२ वर्षों का अध्ययन है।  अब अध्ययन है तो ज्ञान और अनुभव होना तो स्वाभाविक ही है।  जब हम लोग आपस में बातें करते हैं तो या तो सिर्फ मस्ती ही कर रहे होते हैं अन्यथा विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक बातचीत ही कर रहे होते हैं।  अरुण की कुछ बातों को मैं यहाँ और आने वाले लेखों में संदर्भित करूंगा इसलिये इनका परिचय यहाँ अपरिहार्य हो जाता है।  

एक बार हमारी चर्चा हो रही थी कि किस प्रकार मंत्र जाप, यज्ञों या किन्हीं और विधियों से मनचाहा प्राप्त किया जा सकता है।  अरुण ने एक बात विशेष बल देकर कही थी कि जब आप किसी प्रयोजन से कोई यज्ञ आदि करते हैं तो वह विशेष प्रयोजन पूर्ण होने से पहले गहराई में दबी हुई इच्छाएं पूरी होती हैं चाहे आप को याद हों या आप भूल चुके हों।  इसलिये आपकी इच्छाएं और आपका संकल्प पूर्णरूपेण ऐसे प्रतिबिंबित होना चाहिये जैसे आप दर्पण में देख रहे हों।  

आजकल जिसे हम ध्यान कहते हैं वह ध्यान से अलग ही कुछ है, या कह सकते हैं कि यह सिर्फ गाइडेड मेडिटेशन है।  यहाँ पर ध्यान की स्थिति वाला ध्यान नहीं है अपितु ध्यान रखने वाला या ध्यान देने वाला ध्यान है।  गाइडेड मेडिटेशन को मैं ध्यान कि संज्ञा में नहीं रखता हूँ, अपितु यह प्राप्य को प्राप्त करने का बहुत ही शानदार प्रत्योकक्षकरण (विजुवालाइजेशन) तकनीक है।  अब प्राप्य क्या है यह आप पर निर्भर करता है।  किसी के लिये प्राप्य ध्यान की ही कोई स्थिति हो सकती है, किसी के लिये धन सम्पदा हो सकती है, किसी के लिये स्वास्थ्य हो सकता है किसी के लिये कुछ और भी।  

कुछ इसी तरह से ध्यान (आजकल का, मैं फ़िलहाल इसी को ध्यान कहूँगा ) भी है।  आज हम सभी हर समय ध्यान की स्थिति में रहते हैं, लेकिन यह ध्यान जागृत अवस्था का नहीं है अपितु यांत्रिक है, स्वचालित है।  ध्यान हम किसी भी महत्त्वपूर्ण बात पर नहीं देते हैं परन्तु हमारे ध्यान में निरंतर नकारात्मकता चलती रहती है।  सुबह का नाश्ता समय पर नहीं मिला उसकी नकारात्मकता, यातायात में असुविधा हुई उसकी नकारात्मकता, किसी ने नमस्ते नहीं की उसकी नकारात्मकता, किसी ने अनदेखा कर दिया, किसी ने कुछ कह दिया, किसी ने कुछ नहीं कहा – इन सब बातों की नकारात्मकता; और पता नहीं किस किस तरह की नकारात्मकता।  यह नकारात्मकता हमारे भीतर ही भीतर चलती रहती है, लगातार हमारे ध्यान में रहती है।  हम चर्चा भी इन्ही बातों की करते हैं।  अनजाने में हमारा पूरा प्रयास रहता है कि कहीं यह मस्तिष्क से बाहर न निकल जाए।  इसी को मैं कहता हूँ नकारात्मकता पर ध्यान या नकारात्मक ध्यान।   

यदि सिर में दर्द हो तो पूरा दिन, सारा ध्यान उसी दर्द पर रहेगा; किसी भी प्रकार की शारीरिक समस्या हो तो ध्यान उसी पर रहेगा; कार्यालय में, दूकान पर, कार्यशाला में, कहीं भी कोई भी समस्या हो तो सारा का सारा ध्यान उसी पर रहेगा।  और इसका परिणाम क्या होगा? परिणाम होगा उन सभी की पुनरावृत्ति।  आकर्षण का नियम भी यही कहता है कि जैसे आपके विचार होंगे उसकी प्रकार की आपकी आवृत्ति होगी और वैसी ही घटनाएं, परिस्थितियाँ, भावनाएं, लोग आकर्षित होंगे और आपके जीवन में उत्पन्न होंगे।  

आजकल बहुत से सिद्ध लोग एक विशेष प्रकार के ध्यान का अभ्यास करवाते हैं जिसमें कि आपको बहुत बारीकी से उन सभी इच्छाओं को पूर्ण होते हुए विजुवलाइज़ करना होता है जो आप पूरा करना चाहते हैं; और इस प्रकार के ध्यान का बहुत चमत्कारिक प्रभाव भी देखा गया है। विजुवालाइज़ेशन को आसान भाषा में कहा जाय तो यह कल्पना एक परिष्कृत रूप है। तो, समझ लीजिये जितना अधिक आप इस प्रकार की कल्पनाओं में डूबेंगे उतनी ही वह परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी। इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता है कि आप सकारात्मक या नकारात्मक क्या और कैसा विजुवलाइज़ करते हैं; जो आप विजुवलाइज़ करेंगे वह प्रकट होकर ही रहेगा। यह सब कुछ आपके अवचेतन मन से नियंत्रित होता है, उस मन को इससे कोई लेना देना नहीं है कि आप मज़ाक कर रहे हैं, झूठ बोल रहे हैं, झूठ को सच समझ कर बोल रहे हैं या सच बोल रहे हैं। आप किसी को शत्रु समझते हैं तो वह आपका शत्रु बनेगा, आप खुद अनावश्यक गरीब कहते हैं तो आप बनेंगे, आपके मन में शंकाएं चलती हैं तो वह शंकाएं भी फलीभूत होंगी ही।  

आपके मन में जो कुछ भी चल रहा है वह भी एक ध्यान है जो फलीभूत अवश्य होगा, अगर वह नकारात्मक है तो यही नकारात्मक ध्यान है। नकारात्मकता को आप अपने जीवन से निकाल नहीं सकते परन्तु उसे सकरात्मकता से प्रतिस्थापित अवश्य कर सकते हैं।  

अभी के लिये बस इतना ही।  

आपके भीतर के परमात्मा को हृदय से प्रणाम  

संपर्क और जुड़ाव

एक साधु का न्यूयार्क में एक इंटरव्यू चल रहा था।

पत्रकार: सर, आपने अपने लास्ट लेक्चर में संपर्क (कान्टैक्ट) और जुड़ाव (कनेक्शन) पर स्पीच दिया लेकिन यह बहुत कन्फ्यूज करने वाला था। क्या आप इनका अंतर समझा सकते हैं ?

साधु मुस्कराये और उन्होंने कुछ अलग पत्रकारों से ही पूछना शुरू कर दियाः “आप न्यूयॉर्क से हैं?”

पत्रकार: हाँ

संन्यासी: “आपके घर मे कौन-कौन हैं?”

पत्रकार को लगा कि साधु उनका सवाल टालने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि उनका सवाल बहुत व्यक्तिगत और उसके सवाल के जवाब से अलग था।

फिर भी पत्रकार बोला: मेरी “माँ अब नही हैं, पिता हैं तथा 3 भाई और एक बहन हैं ! सब शादीशुदा हैं। “

साधू ने चेहरे पर मुस्कान लाते हुए पूछा: “आप अपने पिता से बात करते हैं?”

पत्रकार चेहरे से गुस्सा झलकने लगा…

साधू ने पूछा, “आपने अपने फादर से पिछली बार कब बात की थी?”

पत्रकार ने अपना गुस्सा दबाते हुए जवाब दिया: “शायद एक महीने पहले।”

साधू ने पूछा: “क्या आप भाई-बहन अक़्सर मिलते हैं? आप सब आखिर में कब मिले एक परिवार की तरह?”

इस सवाल पर पत्रकार के माथे पर पसीना आ गया कि, इंटरव्यू मैं ले रहा हूँ या ये साधु? ऐसा लगा साधु, पत्रकार का इंटरव्यू ले रहा है?

एक आह के साथ पत्रकार बोला: “क्रिसमस पर 2 साल पहले”.

साधू ने पूछा: “कितने दिन आप सब साथ में रहे?”

पत्रकार अपनी आँखों से निकले आँसुओं को पोंछते हुये बोला: “3 दिन।”

साधु: “कितना वक्त आप भाई-बहनों ने अपने पिता के बिल्कुल करीब बैठ कर गुजारा?”

पत्रकार हैरान और शर्मिंदा दिखा और एक कागज़ पर कुछ लिखने लगा।

साधु ने पूछा: “क्या आपने पिता के साथ नाश्ता, लंच या डिनर लिया? क्या आपने अपने पिता से पूछा के वो कैसे हैं? माता की मृत्यु के बाद उनका वक्त कैसे गुज़र रहा है?

साधु ने पत्रकार का हाथ पकड़ा और कहा: ” शर्मिंदा, या दुःखी मत होना। मुझे खेद है अगर मैंने आपको अनजाने में चोट पहुँचाई हो, लेकिन ये ही आपके सवाल का जवाब है । “संपर्क और जुड़ाव” (कान्टैक्ट और कनेक्शन) आप अपने पिता के सिर्फ (संपर्क) “कान्टैक्ट” में हैं ‌पर आपका उनसे कोई “कनेक्शन” (जुड़ाव ) नही हैं। यू आर नॉट कनेक्टेड टू हिम. आप अपने पिता से संपर्क में हैं जुड़े नही हैं कनेक्शन हमेशा आत्मा से आत्मा का होता है। हार्ट से हार्ट का होता है। एक साथ बैठना, भोजन साझा करना और एक दूसरे की देखभाल करना, स्पर्श करना, हाथ मिलाना, आँखों का संपर्क होना, कुछ समय एक साथ बिताना आप अपने पिता, भाई और बहनों के संपर्क (“कान्टैक्ट“) में हैं लेकिन आपका आपस में कोई जुड़ाव (“कनेक्शन”) नहीं है।

पत्रकार ने आँखें पोंछी और बोला: “मुझे एक अच्छा और अविस्मरणीय सबक सिखाने के लिए धन्यवाद”।

आज यह भारत की भी सच्चाई हो चली है। सबके हज़ारों संपर्क (कॉन्टैक्ट्स) हैं पर कोई जुड़ाव (कनेक्शन) नहीं हैं। कोई विचार-विमर्श नहीं है। हर आदमी अपनी-अपनी नकली दुनिया में खोया हुआ है।

वो साधु और कोई नहीं “स्वामी विवेकानंद” थे।

समस्याएं तो जादू की तरह ही गायब होंगी

पिछले कई सालों के अध्ययन, उपचार और अनुभवों के आधार पर मेरा मानना है कि बहुत से ऐसे मामले होते हैं जिनमें समस्याएं तो भौतिक शरीर पर दिख रही होती हैं, मेडिकल रिपोर्ट्स में भी दिखती हैं और संबंधित व्यक्ति को कष्ट भी होता है; लेकिन समस्या की जड़ मानसिक होती है और इस स्तर भी पर यदि उपचार दिया जाय तो परिणाम भी अति शीघ्र प्राप्त होते हैं। कुछ मामलों में मैंने देखा है कि कई कई दिनों की समस्या या दर्द में लगभग तुरंत ही परिणाम मिलते हैं। हमने अधिक तो नहीं जांचा है परन्तु इधर कुछ दिनों में ३-४ मामलों में उपचार से पहले और उसके बाद की मेडिकल टेस्ट रिपोर्ट्स में अंतर देखा है।  

मैं जो भी अनुभव साझा करता हूँ, हर उस मामले में संबंधित व्यक्ति की अनुमति के बाद ही लिखता हूँ, यहाँ तक कि उनका अनुभव/लाभ और उनका सही नाम साझा करने से पहले अनुमति लेता हूँ। कुछ ऐसे भी मामले होते हैं जिनमें अनुभव तो अद्भुत होते हैं लेकिन मैं इन्हीं कारणों से साझा नहीं करता हूँ।  

मैं क्या करता हूँ और कैसे करता हूँ यह मैंने अभी तक पूरी तरह से उजागर नहीं किया है, सही समय आने पर उसे भी साझा करूंगा। मैं अपनी बातों को जान बूझ कर संक्षेप में कहता हूँ जिससे कि पढ़ने वाले पर अनावश्यक बोझ न पड़े। 

हमारे आस पास बहुत से लोगों को कोई न कोई शारीरिक, मानसिक या ऊपरी समस्या अवश्य है, उन सभी को समाधान चाहिये होता है। उनमें से कुछ का संपर्क हमसे होता है और उनमें से भी कुछ लोगों की समस्याओं का समाधान हमारे पास होता है। यदि हम किसी की समस्या के समाधान के लिये स्वयं अपने व्यस्त समय में से समय निकालें और उसे स्वयं के लिये ही समय न हो; तो ऐसे संबंधों में हमारा समय और ऊर्जा देना व्यर्थ है। मेरा प्रतिदिन ठीक ठाक समय जाता है इन सब क्रियाओं में इसलिये यदि किसी का सही समय पर जवाब नहीं मिलता है तो १-२ दिन के बाद ऐसे मामलों को विराम दे देता हूँ और सिर्फ उन्हीं लोगों पर काम करता हूँ जो उपचार को लेकर गंभीर हैं, समय समय पर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं और जहां प्रयोज्य है ऊर्जा विनिमय करते हैं।  सामान्यतया किसी भी क्रिया का कोई शुल्क नहीं लिया जाता है, लोगों को उनकी इच्छा से कोई भी दान करने की सलाह दी जाती है और समय समय पर संपर्क करते रहने को कहा जाता है। संभवतया, कुछ लोग इसलिये भी गंभीर नहीं होते हैं क्योंकि इसमें उनका कोई खर्च नहीं होता है। हम किसी भी प्रकार का कोई कर्म काण्ड, विशेष परहेज, विशेष कसरत, कोई दवा अपनाने या बदलने के लिये परामर्श नहीं देते हैं, इनका अपना महत्त्व है जिससे हम कोई छेड़छाड़ नहीं करते हैं।  

बहुत बार ऐसा भी होता है कि लोगों ने समस्याओं तो कई सालों से पाल रखा है और बहुत कोशिश करके भी समाधान नहीं मिला, फिर भी उनकी इच्छा होती है कि एक ही दिन में जादू हो जाय। समस्याएं तो जादू की तरह ही गायब होंगी लेकिन समय अवश्य लगेगा।  

आप हमारे साथ बने रहिये धीरे धीरे सब दर्पण की तरह साफ हो जायेगा। अभी के लिये बस इतना ही।  

आप के भीतर के परमात्मा को हृदय से प्रणाम।  

विनोद की माताजी का दर्द

जब किसी का किसी प्रकार का ऊर्जा संबंधित उपचार चल रहा हो तो समस्या की गम्भीरता के अनुसार दवाइयों को, पीने के पानी को, भोजन आदि को भी चार्ज किया जाता है।  किसी किसी को क्रिस्टल या किसी और प्रकार के रत्न, कोई विशेष एसेंशियल ऑइल आदि का प्रयोग करने की भी सलाह दी जाती है।  कुछ मामलों में कुछ विशेष परहेज भी करने होते हैं।  इस पूरे सिस्टम में ध्यान का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान है, बहुत से लोगों को ध्यान की भी सलाह दी जाती है।  यह सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि समस्या का प्रकार और उसकी गम्भीरता कितनी है।  कभी कभी लक्षण तो शारीरिक होते हैं परन्तु समस्या विशुद्ध रूप से सिर्फ मानसिक ही होती है।  यहाँ पर मानसिक समस्या का मतलब मनोरोग, पागलपन या मूर्खता जैसा कुछ नहीं है अपितु कुछ और ही है, इसे अलग से फिर कभी समझाया जाएगा।  

हमारे एक साथी हैं विनोद जी, विनोद जी कुछ समय से गंभीर रूप से अस्वस्थ हैं।  उनके लिये समय समय पर पानी की चार्जिंग भी करते हैं हम लोग।  इसी संबंध में उनकी माताजी का आगमन हुआ।  बातों ही बातों में पता चला कि उन्हें दाहिनी ओर के हाथ और पैर दोनों में भीतर की तरफ थोड़ा सा तेज दर्द हो रहा था।  घरेलू कामों का यदा कदा कुछ ज़्यादा बोझ उन पर आ जाता है जो कि उनकी उम्र को देखते हुए उनके शरीर के लिये कष्टदायक हो जाता है।  घर के दूसरे सदस्यों की आकस्मिक महत्त्वपूर्ण व्यस्तता के कारण इस प्रकार की परेशानियाँ उन्हें अक्सर उठानी पड़ जाती हैं।  माँ हैं, माँ तो रूप ही है त्याग का, ममता का, करुणा का; अब ऐसा है तो इसके परिणाम भी होंगे ही, चाहे वह मानसिक स्तर पर हो, शारीरिक स्तर पर हों या फिर दोनों ही हों।   

उनकी समस्या की और गहराई में जब उतरा गया तो समझ में आया कि इसके कारण शारीरिक और मानसिक (सिर्फ तनाव) दोनों ही थे।  उनकी भी इच्छा थी और हमें भी अनुमति चाहिये थी कि इस समस्या का कुछ समाधान तो होना ही चाहिये।  सबसे पहले तो उन्हें थोड़ा शीतल जल पिलाया गया, फिर कुछ विशेष मुद्रा में बैठकर थोड़ी देर शांत होने का आग्रह किया गया, और उसके बाद उनकी दोनों ही समस्याओं का समाधान किया गया।  इस प्रकार की समस्याओं के समाधान में करीब ५-१० मिनट लगते हैं।  और लगभग इतने समय के अंदर उन्हें काफी आराम मिल चुका था।  एक और भी समस्या महसूस हुई जिसका कि उन्हें अनुभव नहीं हो रहा था लेकिन मेरा अंतर्मन कह रहा था कि वह समस्या या तो है या फिर प्रकट होने वाली है।  इसके लिये इसके लिये उनके आभामंडल पर कुछ विशेष क्रिया करके उन्हें अगले ८ दिनों तक के लिये निगरानी में रखा गया है।  

बहुत बार ऐसा होता है कि किसी को कोई समस्या होती है, लोगों को तो पता चल रही होती है लेकिन स्वयं समस्याग्रस्त व्यक्ति को आभास तक नहीं होता है।  ऐसी समस्याओं का समय पर पहचाना जाना, और उनका निवारण आवश्यक हो जाता है।  ऐसी समस्याओं का कारण हो सकता है कार्मिक हो, दूषित विचार (अपने या दूसरों के) हों, या फिर अनचाहे  सूक्ष्म व्यक्तित्व की उपस्थिति हो।  

एक अलग दृष्टि से अगर बात की जाय तो किसी के भी स्वास्थ्य के बिगड़ने के तीन मुख्य कारण हो सकते हैं – १. पूर्ण रूप से भौतिक, २. ऊर्जा संबंधित एवं ३. कर्म जनित।  पहले दो कारणों में तो उपचार का प्रभाव लगभग तुरंत ही दिखता है लेकिन तीसरे कारण के संबंध में प्रभाव आते आते काफ़ी समय लग सकता है और संभव है कि प्रभाव हो ही न; तब तक, जब तक कि उसे पहचान कर सुधारा न जाय।  इस संबंध में फिर कभी चर्चा करेंगे।  

अभी के लिये इतना ही।  

आपके भीतर के परमात्मा को हृदय से प्रणाम।  

श्राइना और सृष्टि की हिचकियाँ

जब आप किसी काम को करते हैं या किसी तरह का अध्ययन करते हैं तो उससे संबंधित बहुत सारी बातें और बहुत सारा ज्ञान ऐसा होता है जिससे आपका स्वतः ही मिलन आरंभ हो जाता है।  बहुत कुछ आपको दिखने लगता है, आपको अनुभव होने लगता है और आपके आस पास वैसा ही वातावरण बनने लगता है।  

स्पिरिचुवल हीलिंग या एनर्जी हीलिंग का अभ्यास करते करते कुछ समय बीता तो धीरे धीरे बहुत कुछ और भी जानने का अवसर मिला, कई और तरह के लोग, उनका अनुभव और कुछ लोगों की सेवा का भी अवसर प्राप्त हुआ।  समय के साथ साथ ध्यान, योगासन, मनोविज्ञान, पेंडुलम डाउसिंग, चक्र बैलेनसिंग, रेकी हीलिंग, कलर थेरेपी, मसाज थेरेपी, ऍरोमा थेरेपी, सूजोक, प्राणिक हीलिंग आदि के बारे में भी अध्ययन का अवसर मिला।  धीरे धीरे कुछ अंतर्दृष्टि विकसित होना प्रारंभ हुई।  

हमारे एक सीनियर संजीव सर (बदला हुआ नाम) एक बार अपना एक अनुभव सुना रहे थे जिसमें उनका मिलना किसी आध्यात्मिक महिला से हुआ था। उनके ऑफिस में कोई आध्यात्मिक कार्यक्रम हुआ था उसके अनुभव बहुत ही रोमांचक थे। संजीव सर किसी भी तरह के ऊर्जा संबंधित किसी सिस्टम का भाग कम से कम उस समय तक तो नहीं थे। जो अनुभव उन्होंने सुनाये वह सिर्फ उनके ही नहीं , एक साथ उनके कई सहकर्मियों के थे। उस समय उसका नाम तो उन्हें स्मरण नहीं था लेकिन मेरे लिये उन्होंने काफी ढूँढ ढाँढ़ कर उसी सिस्टम की एक पुस्तक की व्यवस्था की। उसे मैंने पढ़ा और उन्हें वापस कर दिया। बात आयी गयी हो गयी।  

कभी कभी हमारे जीवन में कुछ चीज़ें अकस्मात आती हैं, अपनी झलक छोड़ती हैं और विस्मृत हो जाती हैं। इस जीवन में, संसार में कुछ भी बस यूँ ही नहीं होता है; उसके पीछे नियति की कोई योजना होती है जो हमें बहुत बाद में समझ में आती है, और अक्सर तो हमें इस बात का कभी आभास भी नहीं होता है। कुछ ऐसा ही इस संबंध में हुआ था। उस पुस्तक तो बस यूँ ही पढ़ना, और उसका कुछ अंश याद रह जाना भविष्य में मेरे काम आया और इस छोटी सी दिखने वाली घटना ने मेरे आध्यात्मिक जीवन में एक बड़ा परिवर्तन किया। खैर, अभी इतना विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है।  

एक दिन की बात है, श्राइना को काफी हिचकियाँ आ रही थीं, और वह काफी असुविधा महसूस कर रही थी। बहुत सारे घरेलू उपाय कर लिये गये और कई घंटे बीत गये, परन्तु कोई आराम नहीं मिला। मुझे एकाएक उसी पुस्तक का कुछ अंश याद आया जो मैंने संजीव सर के देने पर पढ़ी थी। जितना याद आया उसी हिसाब से मैंने कुछ उपाय किया। मुझे जहाँ तक याद है, शायद २-३ मिनटों में उसे पूरी तरह आराम मिल गया। उस दिन मैंने तय किया कि अब इस सिस्टम का भी अध्ययन करना है और इसे भी अपने जीवन में ले कर आना है।  

अभी ४-५ दिन पहले हिचकियों की उसी तरह की समस्या जैसी श्राइना को हुई थी वैसी ही सृष्टि को हुई। वह तो इसके पूरे मजे ले रही थी, लेकिन हमें बड़ी असुविधा हो रही थी। श्राइना की सहज गंभीरता के उलट सृष्टि कुछ ज़्यादा ही चंचल है, हिचकियों से श्राइना को जितनी परेशानी हो रही थी सृष्टि को उतना ही मज़ा आ रहा था। सृष्टि को हिचकी आये तो वो फिर ज़ोर ज़ोर से हँसे और हमें दूसरे कामों में और विशेष रूप से सोने में व्यवधान पैदा हो रहा था। फिर सृष्टि की हिचकियों के लिये वही उपाय किया गया तो करीब ३.५ साल पहले श्राइना के लिये किया गया था। कुल १-२ मिनटों में हिचकियाँ पूरी तरह से बंद हो गईं।  

आज उस सिस्टम का भाग बने हुए मुझे करीब ४० महीने हो चुके हैं। और इस समय काल में बहुत लोगों की सेवा का अवसर मिला। बहुत सारी सफलताएं मिलीं और असफलताएं भी। असफलताओं के कारणों का अध्ययन किया गया और धीरे धीरे सुधार भी आया।  

अभी के लिये बस इतना ही।  

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प्रथम अनुभव

जब मैं इस सिस्टम में नया नया था, मुझे इस पर बहुत संशय था, मुझे स्वयं को ही विश्वास नहीं था इस सब प्रकार की बातों पर।  यहाँ तक कि मैंने अपने परिवार के सदस्यों से भी बोल रखा था कि मैं कुछ अलग सा करने की शुरुआत कर रहा हूँ, मुझे नहीं पता है, यह वास्तव में क्या है, काम करता है या नहीं और आगे कुछ करूंगा भी या नहीं।  मैं जो भी कर रहा हूँ मुझे करने देना, मुझे टोकना मत और मुझसे कुछ पूछना भी मत, जब मुझे समझ में आ जायेगा तो सबको समझा दूंगा।  कुछ समझ में आया तो ठीक नहीं तो मैं खुद ही इसे त्याग दूंगा।  थोड़ा बहुत पढ़ा लिखा हूँ, भला बुरा समझ सकता हूँ, थोड़ी बहुत खोज बीन भी कर सकता हूँ, कुछ गलत, अनावश्यक या मूर्खतापूर्ण तो करूंगा नहीं।  यह अलग बात है कि मुझे यह थोड़ा बहुत अजीब तो लग ही रहा था।  मतलब, अगर मैंने खुद इसका अध्ययन नहीं किया होता सिर्फ किसी से सुना होता तो संभवतया कभी विश्वास नहीं करता।    

आज इंटरनेट का समय है, आप बहुत कुछ ढूँढ सकते हैं, बहुत सारी वीडियोज़ देख सकते हैं, बहुत सारे लेख पढ़ सकते हैं, और थोड़ा सा दिमाग लगा कर किसी निष्कर्ष तक पहुँच सकते हैं।  कुछ दिन बीतने के बाद मुझे याद आया कि मैंने इसी विषय पर वर्ष १९९४-९५ में एक पुस्तक पढ़ी थी, जो मेरे पास अभी भी होनी चाहिये।  बस फिर क्या था, सबको लगा दिया उस विशेष पुस्तक को ढूँढने पर।  पुस्तक मिल भी गयी, और पढ़ने पर पता चला कि जिस सिस्टम को मैं नया समझ रहा था, उस पर आश्चर्य और संशय कर रहा था उसे मैं स्वयं इतने वर्षों पहले पढ़ चुका था।  परन्तु संभवतया वह समय सिर्फ प्रस्तावना भर के लिये था।  खैर अब विश्वास दृढ़ होना प्रारंभ हुआ।   

यह सब अध्ययन चल ही रहा था, कुछ दीक्षाएं भी सम्पन्न हुईं; परन्तु सिवाय अपने, कभी किसी पर इसका प्रयोग नहीं किया था, और बिना प्रयोग के तो परिणाम पता चलना नहीं था।  अब समय आ गया था कि मैं यह जो कुछ भी कर रहा था उसे अपने निकट संपर्क के लोगों में घोषित करने का, प्रतीक्षा थी तो बस उचित अवसर और घटना की।  

एक दिन सर्दियों की शाम की बात है, स्वाति (बदला हुआ नाम) ने मुझसे बताया कि उसे कंधे में बहुत ज़्यादा दर्द है और कोई भी काम करना बहुत ही मुश्किल हो रहा है।  विस्तार से बातचीत करने पर पता चला कि फ्रोज़न शोल्डर की समस्या है।   

यह समस्या आमतौर पर धीरे धीरे पैदा होती है और ठीक होने में भी काफी समय, कभी कभी २ साल तक लग जाते हैं।  इस समस्या में कंधों में जकड़न और जोड़ों में काफी दर्द होता है।   इलाज के लिये जोड़ों में कॉर्टिकोस्टीरॉयड्स के इन्जेक्शन दिये जाने आवश्यकता भी पड़ सकती है, और बहुत ज़्यादा गंभीर होने पर सर्जरी भी करवानी पड़ सकती है।  

हमें इसके बारे में इतना नहीं पता था, और न जानने की आवश्यकता थी।  हमारे लिये तो दर्द का निवारण ही काफी था उस समय के लिये।  रात में सर्दियाँ अधिक थीं, बाहर जाने की इच्छा नहीं हो रही थी और समय भी अधिक हो गया था।  मुझे लगा शायद यही अवसर है कि अब इसका प्रयोग किया जाय।  मैंने बताया कि  मैं कुछ सीख रहा हूँ, मुझे यह तो नहीं पता कि कितना काम करेगा लेकिन एक बार कोशिश करते हैं।  उम्मीद थी कि लगभग २० मिनट लगेंगे इस क्रिया में।  हमने आपसी सहमति से तय किया कि इस सिस्टम में बताई गई विधि को अपनाते हैं, और हमने ऐसा ही किया।  २० मिनटों के बाद आश्चर्यजनक रूप से लगभग ७०% आराम मिल गया था, अगली दोपहर तक सारा का सारा दर्द लगभग ठीक हो गया था।  बाद में कुछ दिनों तक कुछ खास तरह की कसरतें ज़रूर की थी, जिससे की इस तरह की समस्या की संभावना को कुछ कम किया जा सके।  और इसके अलावा, इस समस्या के लिये हमने कभी किसी भी प्रकार का इलाज या दवाइयाँ नहीं अपनाईं और न ही यह दर्द दुबारा कभी हुआ। 

यह मेरे साथ घटी अपने आप में पहली घटना थी और इस घटना ने इस सिस्टम पर हमारा विश्वास बहुत अधिक बढ़ा दिया।  

अभी के लिये बस इतना ही।  

आपके भीतर के परमात्मा को हृदय से प्रणाम।   

इसकी शुरुआत कैसे हुई

मेरा आध्यात्मिकता  की ओर जो  झुकाव या आकर्षण हुआ और जिस समय काल में हुआ उस समय परिस्थितियाँ ऐसी नहीं थीं जिन्हें इसका कारण माना जाय।   जो भी हुआ बस यूं ही होता चला गया।  यदा कदा हमारे जीवन में ऐसा कुछ घटता है,  ऐसे कुछ विचार आते हैं, ऐसे कुछ कर्म और क्रियाएं होती है, ऐसा कुछ आकर्षण, प्रतिकर्षण, उद्दीपन या जाना अनजान प्रभाव होता है, जो हमारी मूल विचारधारा एवं क्रिया कलापों से विलग होता है।  शायद इसे ही नियति का चलन कहते होंगे।   

योगासन, प्राणायाम और ध्यान में रुचि तो यौवन काल से ही थी और इसका कारण संभवतया हमारा विद्यालय था जहां पर कि इन सब कार्यक्रमों पर विशेष ध्यान दिया जाता था।  समय के साथ चलते चलते जीवन बीतता गया और कभी इतना समय ही नहीं मिला, ऐसा कोई मार्गदर्शक ही जीवन में नहीं टकराया कि जो कोई दिशा दे सके।  लेकिन नियति अपने समय और अपने तरीके से आपको उस ओर भेज ही देती है जहाँ  वह चाहती है।   

मेरे ऑफिस में मेरे एक सीनियर, वर्मा सर (बदला हुआ नाम) थे, वर्मा सर लगभग ८० वर्ष के थे। वर्मा सर का मानना था की वह दुनिया का हर वह देश जो नक्शे पर दिखता है, घूम चुके थे। इस प्रकार का घूमना उनकी ऑफिशियल जरूरत भी थी और कुछ उन्हें इसका शौक भी था। अब यह तो निश्चित है कि उनकी पिछली और उस समय की ऑफिशियल प्रोफाइल भी इसी हिसाब से रही होगी। उनसे जीवन में बहुत कुछ सीखा हम सभी लोगों ने, जो उनके संपर्क में थे। जिसकी जैसी पसंद उसने वैसा सीखा। कुछ लोग उन्हें बहुत पसंद करते थे तो कुछ इसके विपरीत भी थे।  

मैंने अपने उस समय तक के जीवन में वर्मा सर जैसा स्वस्थ, ऊर्जावान, नियम का पक्का, सुलझा हुआ इंसान नहीं देखा था, बल्कि अभी तक नहीं देखा है। वर्मा सर को आखिरी के कुछ महीनों में काफी सारी स्वास्थ्य समस्याएं भी उत्पन्न हो गई थी। उन्हें कई प्रकार के दर्द सहने पड़ रहे थे, वह ऑफिस आते थे, अपना सारा काम करते थे, लेकिन दर्द उनके चेहरे पर स्पष्ट दिखता था। हम सभी का जैसा उनसे लगाव था, हमें उनका वह दर्द अच्छा नहीं लगता था।  

मुझे इसका कोई उपाय तो नहीं पता था लेकिन मैं सोचता था कि ऐसा कुछ तो अवश्य होगा जो ऐसे लोगों को राहत दे सके जो कष्ट में हों। मैं सोचता था कि मानव सभ्यता और मेडिकल साइंस का विकास तो बाद में हुआ लेकिन जीव के कष्ट और उनका उपाय तो पहले से ही होगा। ईश्वर के नियम और उनकी योजनाओं में कमी नहीं हो सकती। यही सोच कर इधर उधर खोजने लगा बिना किसी दिशानिर्देश के, बिना किसी ज्ञान के, बिना किसी अनुभव के।  

उसी दौरान मुझे ब्लॉगिंग का नया नया शौक लगा था, मैं एक गुरुजी की बातों को नोट करता था और उनकी सहमति से उन बातों को अपने ब्लॉग पर पोस्ट करता था। मैंने कुछ दिनों में यह गौर किया कि एक विशेष व्यक्ति मुझे (मेरे ब्लॉग पोस्ट्स पर) जाने अनजाने में फॉलो कर रहा था। शायद हमारी विचारधारा में समन्वय था। फिर उत्सुकतावश मैंने उन्हें भी फॉलो करना प्रारंभ कर दिया। मुझे समझ में आया कि वह एक विशेष स्पिरिचुअल हीलिंग सिस्टम का प्रचार कर रहे थे। मुझे भी उत्सुकता जगी और मैं उन्हें लगातार फॉलो किया, कुछ समय बाद उनसे संपर्क भी हुआ और मैं भी उसी एनर्जी सिस्टम का एक भाग बन गया। मुझे लगा कि मैंने कुछ ढूँढ ही लिया आखिरकार, लेकिन मेरे आश्चर्य के लिये बताया गया कि आप कुछ नहीं ढूंढते हैं, बल्कि आपको ढूंढा जाता है।  

बस, इसी प्रकार इसका प्रारंभ हुआ, और आज यह सब लिखते समय तक मुझे इस सिस्टम में करीब ९ साल पूरे हो चुके हैं। इस समय काल में बहुत सारे अनुभव हुए, बहुत सारी सफलताएं मिलीं, बहुत सारी असफलताएं मिलीं और अनुभव भी।  

अपने अनुभव एक-एक करके साझा करूंगा और वह भीतरी ज्ञान भी साझा करने का प्रयास करूंगा जिसका कुछ अंश मैंने प्राप्त और अनुभव किया है।  

आपके भीतर के परमात्मा को हृदय से प्रणाम।  

तीन छन्नियों का परीक्षण

प्राचीन यूनान में सुकरात अपने ज्ञान और विद्वता के लिए बहुत प्रसिद्ध था। एक दिन एक परिचित व्यक्ति उसके पास आकर कहने लगा, मैंने आपके एक मित्र के बारे में कुछ सुना है, और वह आपको बताना चाहता हूं।

सुकरात ने कहा, दो पल रुको। तुम कुछ बताओ, इससे पहले मैं चाहता हूं कि हम एक छोटा-सा परीक्षण कर लें। परिचित ने हामी भर दी। सुकरात ने आगे बताया, इसे मैं तीन छन्नियों का परीक्षण कहता हूं। पहली बात तो यह बताओ कि क्या तुम यह सौ फीसदी दावे से कह सकते हो कि जो बात तुम मुझे बताने जा रहे हो, वह पूरी तरह सच है?

नहीं, परिचित ने कहा, दरअसल मैंने सुना है कि…सुकरात ने उसकी बात बीच में ही काटते हुए कहा, इसका अर्थ है कि तुम जो कहने जा रहे हो, उसके बारे में पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो कि वह पूरी तरह सत्य है। चलो, अब दूसरी छन्नी का प्रयोग करते हैं। इसे मैं अच्छाई की छन्नी कहता हूं। यह बताओ कि तुम जो बताने जा रहे हो, क्या वह कोई अच्छी बात है?

नहीं, बल्कि वह तो…परिचित अपनी बात पूरी करता कि सुकरात ने उसे टोकते हुए कहा, अर्थात तुम जो कुछ कहने वाले थे, उसमें कोई भलाई की बात नहीं है। यह भी पता नहीं कि वह सच है या झूठ। चलो, छन्नी का एक परीक्षण अभी बचा हुआ है, और वह है, उपयोगिता की छन्नी। यह बताओ कि जो बात तुम बताने वाले हो, क्या वह किसी काम की है?

परिचित ने कहा, नहीं, ऐसा तो नहीं है। सुकरात ने इसके बाद कहा, बस हो गया। जो बात तुम बतानेवाले थे, वह न तो सत्य है, न ही भली, और न ही मेरे काम की। उसे जानने में कीमती समय नष्ट करने की जरूरत मैं नहीं समझता। इसीलिए मुझे मत बताओ।

चोरी की सजा

जेन मास्टर बनकेइ ने एक ध्यान शिविर लगाया, तो कई बच्चे उनसे सीखने आये। पहले दिन उन्होंने ध्यान के कुछ सूत्र बताए और यह भी कि अपने आचरण के साथ पड़ोसी के बारे में क्या-क्या ध्यान देना है। शिविर के दौरान किसी दिन एक छात्र को चोरी करते हुए पकड़ लिया गया।

बनकेइ को यह बात बताई गई, बाकी साधकों ने अनुरोध किया की चोरी की सजा के रूप में इस छात्र को शिविर से निकाल देना चाहिए। पर बनकेइ ने इस अनुरोध पर ध्यान नहीं दिया और सबके साथ उस बच्चे को भी पढ़ाते-सिखाते रहे।

लेकिन कुछ दिन बाद फिर वैसी ही चोरी की घटना हुई। वही छात्र दुबारा चोरी करते हुए पकड़ा गया। उसे फिर बनकेइ के सामने ले जाया गया। इस बार तो साधकों को पूरी उम्मीद थी कि उसे शिविर से निकाल दिया जाएगा। पर इस बार भी उन्होंने छात्र को कोई सजा नहीं दी।

इस वजह से दूसरे बच्चे रुष्ट हो उठे और उन्होंने मिलकर बनकेइ को पत्र लिखा कि यदि उस छात्र को नहीं निकाला जाएगा, तो हम सब शिविर छोड़ कर चले जाएंगे। बनकेइ ने पत्र पढ़ा और सभी साधकों को तुरंत इकट्ठा होने के लिए कहा।

उनके इकट्ठा होने पर बनकेइ ने बोलना शुरू किया, ‘आप सभी बुद्धिमान हैं। आप जानते हैं कि क्या सही है और क्या गलत। यदि आप कहीं और पढ़ने जाना चाहते हैं, तो जा सकते हैं। पर यह बेचारा यह भी नहीं जानता कि क्या सही है और क्या गलत। यदि इसे मैं नहीं पढ़ाऊंगा तो इसे कौन और पढ़ाएगा?

आप सभी चले भी जाएं, तो भी मैं इसे यहां पढ़ाऊंगा।’ यह सुनकर चोरी करने वाला छात्र फूट-फूटकर रोने लगा। अब उसके अंदर से चोरी करने की इच्छा हमेशा के लिए जा चुकी थी। दूसरे छात्र उसे रोता देख कर उसे चुप कराने लगे।