Author Archives: अजय प्रताप सिंह

श्राइना और सृष्टि की हिचकियाँ

जब आप किसी काम को करते हैं या किसी तरह का अध्ययन करते हैं तो उससे संबंधित बहुत सारी बातें और बहुत सारा ज्ञान ऐसा होता है जिससे आपका स्वतः ही मिलन आरंभ हो जाता है।  बहुत कुछ आपको दिखने लगता है, आपको अनुभव होने लगता है और आपके आस पास वैसा ही वातावरण बनने लगता है।  

स्पिरिचुवल हीलिंग या एनर्जी हीलिंग का अभ्यास करते करते कुछ समय बीता तो धीरे धीरे बहुत कुछ और भी जानने का अवसर मिला, कई और तरह के लोग, उनका अनुभव और कुछ लोगों की सेवा का भी अवसर प्राप्त हुआ।  समय के साथ साथ ध्यान, योगासन, मनोविज्ञान, पेंडुलम डाउसिंग, चक्र बैलेनसिंग, रेकी हीलिंग, कलर थेरेपी, मसाज थेरेपी, ऍरोमा थेरेपी, सूजोक, प्राणिक हीलिंग आदि के बारे में भी अध्ययन का अवसर मिला।  धीरे धीरे कुछ अंतर्दृष्टि विकसित होना प्रारंभ हुई।  

हमारे एक सीनियर संजीव सर (बदला हुआ नाम) एक बार अपना एक अनुभव सुना रहे थे जिसमें उनका मिलना किसी आध्यात्मिक महिला से हुआ था। उनके ऑफिस में कोई आध्यात्मिक कार्यक्रम हुआ था उसके अनुभव बहुत ही रोमांचक थे। संजीव सर किसी भी तरह के ऊर्जा संबंधित किसी सिस्टम का भाग कम से कम उस समय तक तो नहीं थे। जो अनुभव उन्होंने सुनाये वह सिर्फ उनके ही नहीं , एक साथ उनके कई सहकर्मियों के थे। उस समय उसका नाम तो उन्हें स्मरण नहीं था लेकिन मेरे लिये उन्होंने काफी ढूँढ ढाँढ़ कर उसी सिस्टम की एक पुस्तक की व्यवस्था की। उसे मैंने पढ़ा और उन्हें वापस कर दिया। बात आयी गयी हो गयी।  

कभी कभी हमारे जीवन में कुछ चीज़ें अकस्मात आती हैं, अपनी झलक छोड़ती हैं और विस्मृत हो जाती हैं। इस जीवन में, संसार में कुछ भी बस यूँ ही नहीं होता है; उसके पीछे नियति की कोई योजना होती है जो हमें बहुत बाद में समझ में आती है, और अक्सर तो हमें इस बात का कभी आभास भी नहीं होता है। कुछ ऐसा ही इस संबंध में हुआ था। उस पुस्तक तो बस यूँ ही पढ़ना, और उसका कुछ अंश याद रह जाना भविष्य में मेरे काम आया और इस छोटी सी दिखने वाली घटना ने मेरे आध्यात्मिक जीवन में एक बड़ा परिवर्तन किया। खैर, अभी इतना विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है।  

एक दिन की बात है, श्राइना को काफी हिचकियाँ आ रही थीं, और वह काफी असुविधा महसूस कर रही थी। बहुत सारे घरेलू उपाय कर लिये गये और कई घंटे बीत गये, परन्तु कोई आराम नहीं मिला। मुझे एकाएक उसी पुस्तक का कुछ अंश याद आया जो मैंने संजीव सर के देने पर पढ़ी थी। जितना याद आया उसी हिसाब से मैंने कुछ उपाय किया। मुझे जहाँ तक याद है, शायद २-३ मिनटों में उसे पूरी तरह आराम मिल गया। उस दिन मैंने तय किया कि अब इस सिस्टम का भी अध्ययन करना है और इसे भी अपने जीवन में ले कर आना है।  

अभी ४-५ दिन पहले हिचकियों की उसी तरह की समस्या जैसी श्राइना को हुई थी वैसी ही सृष्टि को हुई। वह तो इसके पूरे मजे ले रही थी, लेकिन हमें बड़ी असुविधा हो रही थी। श्राइना की सहज गंभीरता के उलट सृष्टि कुछ ज़्यादा ही चंचल है, हिचकियों से श्राइना को जितनी परेशानी हो रही थी सृष्टि को उतना ही मज़ा आ रहा था। सृष्टि को हिचकी आये तो वो फिर ज़ोर ज़ोर से हँसे और हमें दूसरे कामों में और विशेष रूप से सोने में व्यवधान पैदा हो रहा था। फिर सृष्टि की हिचकियों के लिये वही उपाय किया गया तो करीब ३.५ साल पहले श्राइना के लिये किया गया था। कुल १-२ मिनटों में हिचकियाँ पूरी तरह से बंद हो गईं।  

आज उस सिस्टम का भाग बने हुए मुझे करीब ४० महीने हो चुके हैं। और इस समय काल में बहुत लोगों की सेवा का अवसर मिला। बहुत सारी सफलताएं मिलीं और असफलताएं भी। असफलताओं के कारणों का अध्ययन किया गया और धीरे धीरे सुधार भी आया।  

अभी के लिये बस इतना ही।  

आपके भीतर के परमात्मा को हृदय से प्रणाम।  

प्रथम अनुभव

जब मैं इस सिस्टम में नया नया था, मुझे इस पर बहुत संशय था, मुझे स्वयं को ही विश्वास नहीं था इस सब प्रकार की बातों पर।  यहाँ तक कि मैंने अपने परिवार के सदस्यों से भी बोल रखा था कि मैं कुछ अलग सा करने की शुरुआत कर रहा हूँ, मुझे नहीं पता है, यह वास्तव में क्या है, काम करता है या नहीं और आगे कुछ करूंगा भी या नहीं।  मैं जो भी कर रहा हूँ मुझे करने देना, मुझे टोकना मत और मुझसे कुछ पूछना भी मत, जब मुझे समझ में आ जायेगा तो सबको समझा दूंगा।  कुछ समझ में आया तो ठीक नहीं तो मैं खुद ही इसे त्याग दूंगा।  थोड़ा बहुत पढ़ा लिखा हूँ, भला बुरा समझ सकता हूँ, थोड़ी बहुत खोज बीन भी कर सकता हूँ, कुछ गलत, अनावश्यक या मूर्खतापूर्ण तो करूंगा नहीं।  यह अलग बात है कि मुझे यह थोड़ा बहुत अजीब तो लग ही रहा था।  मतलब, अगर मैंने खुद इसका अध्ययन नहीं किया होता सिर्फ किसी से सुना होता तो संभवतया कभी विश्वास नहीं करता।    

आज इंटरनेट का समय है, आप बहुत कुछ ढूँढ सकते हैं, बहुत सारी वीडियोज़ देख सकते हैं, बहुत सारे लेख पढ़ सकते हैं, और थोड़ा सा दिमाग लगा कर किसी निष्कर्ष तक पहुँच सकते हैं।  कुछ दिन बीतने के बाद मुझे याद आया कि मैंने इसी विषय पर वर्ष १९९४-९५ में एक पुस्तक पढ़ी थी, जो मेरे पास अभी भी होनी चाहिये।  बस फिर क्या था, सबको लगा दिया उस विशेष पुस्तक को ढूँढने पर।  पुस्तक मिल भी गयी, और पढ़ने पर पता चला कि जिस सिस्टम को मैं नया समझ रहा था, उस पर आश्चर्य और संशय कर रहा था उसे मैं स्वयं इतने वर्षों पहले पढ़ चुका था।  परन्तु संभवतया वह समय सिर्फ प्रस्तावना भर के लिये था।  खैर अब विश्वास दृढ़ होना प्रारंभ हुआ।   

यह सब अध्ययन चल ही रहा था, कुछ दीक्षाएं भी सम्पन्न हुईं; परन्तु सिवाय अपने, कभी किसी पर इसका प्रयोग नहीं किया था, और बिना प्रयोग के तो परिणाम पता चलना नहीं था।  अब समय आ गया था कि मैं यह जो कुछ भी कर रहा था उसे अपने निकट संपर्क के लोगों में घोषित करने का, प्रतीक्षा थी तो बस उचित अवसर और घटना की।  

एक दिन सर्दियों की शाम की बात है, स्वाति (बदला हुआ नाम) ने मुझसे बताया कि उसे कंधे में बहुत ज़्यादा दर्द है और कोई भी काम करना बहुत ही मुश्किल हो रहा है।  विस्तार से बातचीत करने पर पता चला कि फ्रोज़न शोल्डर की समस्या है।   

यह समस्या आमतौर पर धीरे धीरे पैदा होती है और ठीक होने में भी काफी समय, कभी कभी २ साल तक लग जाते हैं।  इस समस्या में कंधों में जकड़न और जोड़ों में काफी दर्द होता है।   इलाज के लिये जोड़ों में कॉर्टिकोस्टीरॉयड्स के इन्जेक्शन दिये जाने आवश्यकता भी पड़ सकती है, और बहुत ज़्यादा गंभीर होने पर सर्जरी भी करवानी पड़ सकती है।  

हमें इसके बारे में इतना नहीं पता था, और न जानने की आवश्यकता थी।  हमारे लिये तो दर्द का निवारण ही काफी था उस समय के लिये।  रात में सर्दियाँ अधिक थीं, बाहर जाने की इच्छा नहीं हो रही थी और समय भी अधिक हो गया था।  मुझे लगा शायद यही अवसर है कि अब इसका प्रयोग किया जाय।  मैंने बताया कि  मैं कुछ सीख रहा हूँ, मुझे यह तो नहीं पता कि कितना काम करेगा लेकिन एक बार कोशिश करते हैं।  उम्मीद थी कि लगभग २० मिनट लगेंगे इस क्रिया में।  हमने आपसी सहमति से तय किया कि इस सिस्टम में बताई गई विधि को अपनाते हैं, और हमने ऐसा ही किया।  २० मिनटों के बाद आश्चर्यजनक रूप से लगभग ७०% आराम मिल गया था, अगली दोपहर तक सारा का सारा दर्द लगभग ठीक हो गया था।  बाद में कुछ दिनों तक कुछ खास तरह की कसरतें ज़रूर की थी, जिससे की इस तरह की समस्या की संभावना को कुछ कम किया जा सके।  और इसके अलावा, इस समस्या के लिये हमने कभी किसी भी प्रकार का इलाज या दवाइयाँ नहीं अपनाईं और न ही यह दर्द दुबारा कभी हुआ। 

यह मेरे साथ घटी अपने आप में पहली घटना थी और इस घटना ने इस सिस्टम पर हमारा विश्वास बहुत अधिक बढ़ा दिया।  

अभी के लिये बस इतना ही।  

आपके भीतर के परमात्मा को हृदय से प्रणाम।   

इसकी शुरुआत कैसे हुई

मेरा आध्यात्मिकता  की ओर जो  झुकाव या आकर्षण हुआ और जिस समय काल में हुआ उस समय परिस्थितियाँ ऐसी नहीं थीं जिन्हें इसका कारण माना जाय।   जो भी हुआ बस यूं ही होता चला गया।  यदा कदा हमारे जीवन में ऐसा कुछ घटता है,  ऐसे कुछ विचार आते हैं, ऐसे कुछ कर्म और क्रियाएं होती है, ऐसा कुछ आकर्षण, प्रतिकर्षण, उद्दीपन या जाना अनजान प्रभाव होता है, जो हमारी मूल विचारधारा एवं क्रिया कलापों से विलग होता है।  शायद इसे ही नियति का चलन कहते होंगे।   

योगासन, प्राणायाम और ध्यान में रुचि तो यौवन काल से ही थी और इसका कारण संभवतया हमारा विद्यालय था जहां पर कि इन सब कार्यक्रमों पर विशेष ध्यान दिया जाता था।  समय के साथ चलते चलते जीवन बीतता गया और कभी इतना समय ही नहीं मिला, ऐसा कोई मार्गदर्शक ही जीवन में नहीं टकराया कि जो कोई दिशा दे सके।  लेकिन नियति अपने समय और अपने तरीके से आपको उस ओर भेज ही देती है जहाँ  वह चाहती है।   

मेरे ऑफिस में मेरे एक सीनियर, वर्मा सर (बदला हुआ नाम) थे, वर्मा सर लगभग ८० वर्ष के थे। वर्मा सर का मानना था की वह दुनिया का हर वह देश जो नक्शे पर दिखता है, घूम चुके थे। इस प्रकार का घूमना उनकी ऑफिशियल जरूरत भी थी और कुछ उन्हें इसका शौक भी था। अब यह तो निश्चित है कि उनकी पिछली और उस समय की ऑफिशियल प्रोफाइल भी इसी हिसाब से रही होगी। उनसे जीवन में बहुत कुछ सीखा हम सभी लोगों ने, जो उनके संपर्क में थे। जिसकी जैसी पसंद उसने वैसा सीखा। कुछ लोग उन्हें बहुत पसंद करते थे तो कुछ इसके विपरीत भी थे।  

मैंने अपने उस समय तक के जीवन में वर्मा सर जैसा स्वस्थ, ऊर्जावान, नियम का पक्का, सुलझा हुआ इंसान नहीं देखा था, बल्कि अभी तक नहीं देखा है। वर्मा सर को आखिरी के कुछ महीनों में काफी सारी स्वास्थ्य समस्याएं भी उत्पन्न हो गई थी। उन्हें कई प्रकार के दर्द सहने पड़ रहे थे, वह ऑफिस आते थे, अपना सारा काम करते थे, लेकिन दर्द उनके चेहरे पर स्पष्ट दिखता था। हम सभी का जैसा उनसे लगाव था, हमें उनका वह दर्द अच्छा नहीं लगता था।  

मुझे इसका कोई उपाय तो नहीं पता था लेकिन मैं सोचता था कि ऐसा कुछ तो अवश्य होगा जो ऐसे लोगों को राहत दे सके जो कष्ट में हों। मैं सोचता था कि मानव सभ्यता और मेडिकल साइंस का विकास तो बाद में हुआ लेकिन जीव के कष्ट और उनका उपाय तो पहले से ही होगा। ईश्वर के नियम और उनकी योजनाओं में कमी नहीं हो सकती। यही सोच कर इधर उधर खोजने लगा बिना किसी दिशानिर्देश के, बिना किसी ज्ञान के, बिना किसी अनुभव के।  

उसी दौरान मुझे ब्लॉगिंग का नया नया शौक लगा था, मैं एक गुरुजी की बातों को नोट करता था और उनकी सहमति से उन बातों को अपने ब्लॉग पर पोस्ट करता था। मैंने कुछ दिनों में यह गौर किया कि एक विशेष व्यक्ति मुझे (मेरे ब्लॉग पोस्ट्स पर) जाने अनजाने में फॉलो कर रहा था। शायद हमारी विचारधारा में समन्वय था। फिर उत्सुकतावश मैंने उन्हें भी फॉलो करना प्रारंभ कर दिया। मुझे समझ में आया कि वह एक विशेष स्पिरिचुअल हीलिंग सिस्टम का प्रचार कर रहे थे। मुझे भी उत्सुकता जगी और मैं उन्हें लगातार फॉलो किया, कुछ समय बाद उनसे संपर्क भी हुआ और मैं भी उसी एनर्जी सिस्टम का एक भाग बन गया। मुझे लगा कि मैंने कुछ ढूँढ ही लिया आखिरकार, लेकिन मेरे आश्चर्य के लिये बताया गया कि आप कुछ नहीं ढूंढते हैं, बल्कि आपको ढूंढा जाता है।  

बस, इसी प्रकार इसका प्रारंभ हुआ, और आज यह सब लिखते समय तक मुझे इस सिस्टम में करीब ९ साल पूरे हो चुके हैं। इस समय काल में बहुत सारे अनुभव हुए, बहुत सारी सफलताएं मिलीं, बहुत सारी असफलताएं मिलीं और अनुभव भी।  

अपने अनुभव एक-एक करके साझा करूंगा और वह भीतरी ज्ञान भी साझा करने का प्रयास करूंगा जिसका कुछ अंश मैंने प्राप्त और अनुभव किया है।  

आपके भीतर के परमात्मा को हृदय से प्रणाम।  

तीन छन्नियों का परीक्षण

प्राचीन यूनान में सुकरात अपने ज्ञान और विद्वता के लिए बहुत प्रसिद्ध था। एक दिन एक परिचित व्यक्ति उसके पास आकर कहने लगा, मैंने आपके एक मित्र के बारे में कुछ सुना है, और वह आपको बताना चाहता हूं।

सुकरात ने कहा, दो पल रुको। तुम कुछ बताओ, इससे पहले मैं चाहता हूं कि हम एक छोटा-सा परीक्षण कर लें। परिचित ने हामी भर दी। सुकरात ने आगे बताया, इसे मैं तीन छन्नियों का परीक्षण कहता हूं। पहली बात तो यह बताओ कि क्या तुम यह सौ फीसदी दावे से कह सकते हो कि जो बात तुम मुझे बताने जा रहे हो, वह पूरी तरह सच है?

नहीं, परिचित ने कहा, दरअसल मैंने सुना है कि…सुकरात ने उसकी बात बीच में ही काटते हुए कहा, इसका अर्थ है कि तुम जो कहने जा रहे हो, उसके बारे में पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो कि वह पूरी तरह सत्य है। चलो, अब दूसरी छन्नी का प्रयोग करते हैं। इसे मैं अच्छाई की छन्नी कहता हूं। यह बताओ कि तुम जो बताने जा रहे हो, क्या वह कोई अच्छी बात है?

नहीं, बल्कि वह तो…परिचित अपनी बात पूरी करता कि सुकरात ने उसे टोकते हुए कहा, अर्थात तुम जो कुछ कहने वाले थे, उसमें कोई भलाई की बात नहीं है। यह भी पता नहीं कि वह सच है या झूठ। चलो, छन्नी का एक परीक्षण अभी बचा हुआ है, और वह है, उपयोगिता की छन्नी। यह बताओ कि जो बात तुम बताने वाले हो, क्या वह किसी काम की है?

परिचित ने कहा, नहीं, ऐसा तो नहीं है। सुकरात ने इसके बाद कहा, बस हो गया। जो बात तुम बतानेवाले थे, वह न तो सत्य है, न ही भली, और न ही मेरे काम की। उसे जानने में कीमती समय नष्ट करने की जरूरत मैं नहीं समझता। इसीलिए मुझे मत बताओ।

चोरी की सजा

जेन मास्टर बनकेइ ने एक ध्यान शिविर लगाया, तो कई बच्चे उनसे सीखने आये। पहले दिन उन्होंने ध्यान के कुछ सूत्र बताए और यह भी कि अपने आचरण के साथ पड़ोसी के बारे में क्या-क्या ध्यान देना है। शिविर के दौरान किसी दिन एक छात्र को चोरी करते हुए पकड़ लिया गया।

बनकेइ को यह बात बताई गई, बाकी साधकों ने अनुरोध किया की चोरी की सजा के रूप में इस छात्र को शिविर से निकाल देना चाहिए। पर बनकेइ ने इस अनुरोध पर ध्यान नहीं दिया और सबके साथ उस बच्चे को भी पढ़ाते-सिखाते रहे।

लेकिन कुछ दिन बाद फिर वैसी ही चोरी की घटना हुई। वही छात्र दुबारा चोरी करते हुए पकड़ा गया। उसे फिर बनकेइ के सामने ले जाया गया। इस बार तो साधकों को पूरी उम्मीद थी कि उसे शिविर से निकाल दिया जाएगा। पर इस बार भी उन्होंने छात्र को कोई सजा नहीं दी।

इस वजह से दूसरे बच्चे रुष्ट हो उठे और उन्होंने मिलकर बनकेइ को पत्र लिखा कि यदि उस छात्र को नहीं निकाला जाएगा, तो हम सब शिविर छोड़ कर चले जाएंगे। बनकेइ ने पत्र पढ़ा और सभी साधकों को तुरंत इकट्ठा होने के लिए कहा।

उनके इकट्ठा होने पर बनकेइ ने बोलना शुरू किया, ‘आप सभी बुद्धिमान हैं। आप जानते हैं कि क्या सही है और क्या गलत। यदि आप कहीं और पढ़ने जाना चाहते हैं, तो जा सकते हैं। पर यह बेचारा यह भी नहीं जानता कि क्या सही है और क्या गलत। यदि इसे मैं नहीं पढ़ाऊंगा तो इसे कौन और पढ़ाएगा?

आप सभी चले भी जाएं, तो भी मैं इसे यहां पढ़ाऊंगा।’ यह सुनकर चोरी करने वाला छात्र फूट-फूटकर रोने लगा। अब उसके अंदर से चोरी करने की इच्छा हमेशा के लिए जा चुकी थी। दूसरे छात्र उसे रोता देख कर उसे चुप कराने लगे।

भिक्षुक और शेर

एक बौद्ध भिक्षुक भोजन बनाने के लिए जंगल से लकड़ियाँ चुन रहा था कि तभी उसने कुछ अनोखा देखा, “कितना अजीब है ये !”, उसने बिना पैरों की लोमड़ी को देखते हुए मन ही मन सोचा.

“आखिर इस हालत में ये जिंदा कैसे है?” उसे आश्चर्य हुआ , “और ऊपर से ये बिलकुल स्वस्थ है”

वह अपने ख़यालों में खोया हुआ था कि अचानक चारो तरफ अफरा – तफरी मचने लगी; जंगल का राजा शेर उस तरफ आ रहा था. भिक्षुक भी तेजी दिखाते हुए एक ऊँचे पेड़ पर चढ़ गया, और वहीँ से सब कुछ देखने लगा.  शेर ने एक हिरन का शिकार किया था और उसे अपने जबड़े में दबा कर लोमड़ी की तरफ बढ़ रहा था, पर उसने लोमड़ी पर
हमला नहीं किया बल्कि उसे भी खाने के लिए मांस के कुछ टुकड़े डाल दिए.

“ये तो घोर आश्चर्य है, शेर लोमड़ी को मारने की बजाये उसे भोजन दे रहा है.” , भिक्षुक बुदबुदाया, उसे अपनी आँखों पर भरोसा नहीं हो रहा था इसलिए वह अगले दिन फिर वहीँ आया और छिप कर शेर का इंतज़ार करने लगा.  आज भी वैसा ही हुआ , शेर ने अपने शिकार का कुछ हिस्सा लोमड़ी के सामने डाल दिया.

“यह भगवान् के होने का प्रमाण है!”  भिक्षुक ने अपने आप से कहा. “ वह जिसे पैदा करता है उसकी रोटी का भी इंतजाम कर देता है, आज से इस लोमड़ी की तरह मैं भी ऊपर वाले की दया पर जीऊंगा,  ईश्वर मेरे भी भोजन की व्यवस्था करेगा.” और ऐसा सोचते हुए वह एक वीरान जगह पर जाकर एक पेड़ के नीचे बैठ गया.

पहला दिन बीता, पर कोई वहां नहीं आया, दूसरे दिन भी कुछ लोग उधर से गुजर गए पर भिक्षुक की तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया.  इधर बिना कुछ खाए -पीये वह कमजोर होता जा रहा था.  इसी तरह कुछ और दिन बीत गए, अब तो उसकी रही सही ताकत भी खत्म हो गयी …वह चलने -फिरने के लायक भी नहीं रहा.  उसकी हालत बिलकुल मृत व्यक्ति की तरह हो चुकी थी कि तभी एक महात्मा उधर से गुजरे और भिक्षुक के पास पहुंचे.  उसने अपनी सारी कहानी महात्मा जी को सुनाई और बोला, “अब आप ही बताइए कि भगवान् इतना निर्दयी कैसे हो सकते हैं, क्या किसी व्यक्ति को इस हालत में पहुंचाना पाप नहीं है?”

“बिल्कुल है,” महात्मा जी ने कहा, “लेकिन तुम इतना मूर्ख कैसे हो सकते हो?  तुमने ये क्यों नहीं समझे कि भगवान् तुम्हे उसे शेर की तरह बनते देखना चाहते थे, लोमड़ी की तरह नहीं !!!”

दोस्तों, हमारे जीवन में भी ऐसा कई बार होता है कि हमें चीजें जिस तरह समझनी चाहिए उसके विपरीत समझ लेते हैं.  ईश्वर ने हम सभी के अन्दर कुछ न कुछ ऐसी शक्तियां दी हैं जो हमें महान बना सकती हैं, ज़रुरत है कि हम उन्हें पहचाने,  उस भिक्षुक का सौभाग्य था कि उसे उसकी गलती का अहसास कराने के लिए महात्मा जी मिल गए पर हमें खुद भी चौकन्ना रहना चाहिए कि कहीं हम शेर की जगह लोमड़ी तो नहीं बन रहे हैं.

बाज के बच्चे

बहुत समय पहले की बात है, एक राजा को उपहार में किसी ने बाज के दो बच्चे भेंट किये ।  वे बड़ी ही अच्छी नस्ल के थे, और राजा ने कभी इससे पहले इतने शानदार बाज नहीं देखे थे। राजा ने उनकी देखभाल के लिए एक अनुभवी आदमी को नियुक्त कर दिया।

जब कुछ महीने बीत गए तो राजा ने बाजों को देखने का मन बनाया , और उस जगह पहुँच गए जहाँ उन्हें पाला जा रहा था।  राजा ने देखा कि दोनों बाज काफी बड़े हो चुके थे और अब पहले से भी शानदार लग रहे थे।  राजा ने बाजों की देखभाल कर रहे आदमी से कहा, “मैं इनकी उड़ान देखना चाहता हूँ, तुम इन्हे उड़ने का इशारा करो।” आदमी ने
ऐसा ही किया।  इशारा मिलते ही दोनों बाज उड़ान भरने लगे, पर जहाँ एक बाज आसमान की ऊंचाइयों को छू रहा था, वहीँ दूसरा, कुछ ऊपर जाकर वापस उसी डाल पर आकर बैठ गया जिससे वो उड़ा था।

ये देख, राजा को कुछ अजीब लगा।  “क्या बात है जहाँ एक बाज इतनी अच्छी उड़ान भर रहा है वहीँ ये दूसरा बाज उड़ना ही नहीं चाह रहा ?”, राजा ने सवाल किया।  “जी हुजूर ,
इस बाज के साथ शुरू से यही समस्या है, वो इस डाल को छोड़ता ही नहीं।”

राजा को दोनों ही बाज प्रिय थे, और वो दुसरे बाज को भी उसी तरह उड़ना देखना चाहते थे।  अगले दिन पूरे राज्य में ऐलान करा दिया गया कि जो व्यक्ति इस बाज को ऊँचा उड़ाने में कामयाब होगा उसे ढेरों इनाम दिया जाएगा।  फिर क्या था, एक से एक विद्वान् आये और बाज को उड़ाने का प्रयास करने लगे, पर हफ़्तों बीत जाने के बाद भी बाज
का वही हाल था, वो थोडा सा उड़ता और वापस डाल पर आकर बैठ जाता।

फिर एक दिन कुछ अनोखा हुआ, राजा ने देखा कि उसके दोनों बाज आसमान में उड़ रहे हैं।  उन्हें अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ और उन्होंने तुरंत उस व्यक्ति का पता लगाने को कहा जिसने ये कारनामा कर दिखाया था। वह व्यक्ति एक किसान था।  अगले दिन वह दरबार में हाजिर हुआ। उसे इनाम में स्वर्ण मुद्राएं भेंट करने के बाद राजा ने कहा, “मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ, बस तुम इतना बताओ कि जो काम बड़े-बड़े विद्वान् नहीं कर पाये वो तुमने कैसे कर दिखाया।

“मालिक ! मैं तो एक साधारण सा किसान हूँ, मैं ज्ञान की ज्यादा बातें नहीं जानता, मैंने तो बस वो डाल काट दी जिसपर बैठने का बाज आदी हो चुका था, और जब वो डाल
ही नहीं रही तो वो भी अपने साथी के साथ ऊपर उड़ने लगा।”

दोस्तों, हम सभी ऊँचा उड़ने के लिए ही बने हैं। लेकिन कई बार हम जो कर रहे होते है उसके इतने आदी हो जाते हैं कि अपनी ऊँची उड़ान भरने की, कुछ बड़ा करने की काबिलियत को भूल जाते हैं।  यदि आप भी सालों से किसी ऐसे ही काम में लगे हैं जो आपके सही क्षमता के मुताबिक नहीं है तो एक बार ज़रूर सोचिये कि कहीं आपको भी उस डाल को काटने की ज़रुरत तो नहीं जिसपर आप बैठे हैं ?

हीलिंग सेशन से पहले

हीलिंग सेशन का सबसे अच्छा तरीका है कि आपको प्रसन्नचित्त मुद्रा में पूर्वाग्रह मुक्त होकर बैठना है।  यह काम करता है कि नहीं  या काम करेगा या नहीं इस सम्बन्ध में पहले से ही कोई धारणा बनाकर न रखें।  इसका निर्णय आप परिणाम पर छोड़ दें।  इससे आप इस सेशन का अधिकतम लाभ उठा सकेंगे।  आपको उन  सभी लाभों की पूरी सूक्ष्मता से कल्पना करनी होगी जिसके लिये इस हीलिंग सेशन में भाग ले रहे हैं।  यह कोई जादू नहीं है बल्कि आप कह सकते हैं कि एक प्रकार की वैकल्पिक चिकित्सा है जो आपको ठीक होने में या आपका मनचाहा प्राप्त करने में मदद करती है।   यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आप चाहते क्या हैं और हीलिंग किस प्रकार की और किस स्तर की ले रहे हैं।  यह अति महत्त्वपूर्ण है कि आप अपने लाइट वर्कर के निर्देशों का पालन करें।  

यदि आप किसी भी प्रकार का हीलिंग सेशन अटेंड कर रहे हैं, यानी यदि आप की हीलिंग की जा रही है तो निम्न बातें आपको ध्यान रखनी चाहिए जिससे कि आपको अधिकतम लाभ हो सके:

  • इस सेशन के एक दिन पहले से ही किसी भी प्रकार के गरिष्ठ भोजन, कैफ़ीन युक्त पेयों एवं मद्यपान से बचें।  
  • जब तक आपकी हीलिंग चल रही हो आप बिना हिले डुले एक ही स्थिति में बैठे रहें।  ऊर्जा एक विशेष दशा और दिशा में गति करती है और आपका हिलना डुलना इस गति में अवरोध उत्पन्न कर सकता है। 
  • आप सुविधानुसार पूरी तरह से आरामदायक स्थिति में बैठें एवं आपका प्रयास होना चाहिए कि आप के शरीर के अंग कहीं पर एक दूसरे से गुणा का चिन्ह न बना रहे हों। 
  • अपनी जिह्वा की नोक को अपने तालु से लगा कर रखें जैसा कि ल अक्षर बोलने पर होता है। 
  • आप किसी भी साधारण ध्यान की स्थिति में हों।  मन बहुत ही चंचल होता है।  जैसे ही आप किसी भी ध्यान की स्थिति में बैठेंगे यह तुरंत आपको भ्रमित करने का प्रयास करेगा।  आपको ऐसा लगेगा जैसे आपकी नाक पर खुजली हो रही है, आपको शरीर पर कहीं चुनचुनाहट का आभास होगा, कहीं पर सुई चुभने जैसा लगेगा।  आपको यह सब अनदेखा करके बिलकुल शांत रहकर बिना हिले डुले ऐसे ही बैठे रहना है। 
  • यदि आपको अपनी स्थिति बदलनी ही पड़े तो धीरे धीरे बदलें और ऐसा करते समय आप का पूरा ध्यान उसी अंग पर हो जिसकी स्थिति आप बदल रहे हैं। 
  • आपके मन में जो भी विचार चल रहे हों उन्हें चलने दें।  यदि आपके मन में किसी भी प्रकार के नकारात्मक विचार चल रहे हों तो, उससे बचने का उपाय करें।  इसके लिए आप अलग से संपर्क कर सकते हैं। 
  • हीलिंग सेशन के समय यदि आपको नींद आ जाती है तो इसमें कोई समस्या नहीं है लेकिन जानबूझकर नहीं सोना है। 
  • हीलिंग सेशन पूरा होने के बाद अपनी सुविधानुसार सामान्य तापमान का जल ग्रहण कर लें। 

यदि आपने कभी कोई हीलिंग सेशन अटेंड किया हो तो अपना अनुभव हमसे अवश्य साझा करें।  इस सम्बन्ध में और अधिक जानकारी के लिए आप अलग से संपर्क कर सकते हैं।  

मनुष्य शरीर और आत्मा का जोड़ है

मनुष्य शरीर और आत्मा का जोड़ है।  शरीर के लिए बहुत जरूरी है भौतिक सुख-समृद्धि की ऊंचाइयों पर होना।  पर आत्मा के लिए बहुत जरूरी है भीतर से परम शांति, परम आनंद की अवस्था को उपलब्ध करना।  आत्मा को भूखा नहीं रखा जा सकता, आत्मा भूखी रह गयी तो जीवन नरक हो जायेगा और चाहे जितनी धन सम्पदा आपके पास हो और सिर्फ आत्मा को स्वस्थ करने में लगे रहे, शरीर और भौतिक दिशाओं में ध्यान नहीं दिया तो दीनता, दरिद्रता, अपंगता की स्थिति को उपलब्ध हो जाएंगे।  भौतिक जीवन और भीतर की शांति और आनंद को उपलब्ध करने वाला आध्यात्मिक जीवन कैसे मिले इसीलिए मैंने गीता, क़ुरान, बाइबिल, धम्मपद और दुनिया के जीतने संबुद्ध पुरुषों ने अपनी खोज, अपनी तलाश के द्वारा अभिव्यक्तियाँ दी थी सबको गहरे में तलाशा, गहरे में खोजा तो जिस निष्कर्ष पर निकला उसे मैंने साइन्स डिवाइन के तीन महामंत्रों के माध्यम से दुनिया को अर्पित करने की चेष्ठा की।  अगर ये तीन महामंत्र आपके प्राणों में उतार जायें तो गीता, क़ुरान, बाइबिल से लेकर पृथ्वी पर अब तक जो भी धर्म, आध्यात्म, और मनोविज्ञान के क्षेत्र में भौतिक और आध्यात्मिक दिशा में प्रगति करने के लिये आवश्यक है सब समाहित हो जाता है, सब प्रकट हो जाता है।  तो कहीं से आप शुरू कर सकते हैं, पहुंचेंगे वहीं।  पर तीनों महामंत्र आपके प्राणों में आत्मसात हो जायें इसके लिये सिर्फ तीन महामंत्रों की समझ ही पर्याप्त है।  अगर आपको इनकी समझ आ गयी तो इनकी समझ का परिणाम होता है की धीरे-धीरे आपके भीतर का रसायन बदलने लगता है और आपके इस जीवन में जो होने लायक है वो होना शुरू हो जाता है, जो छूटने लायक है वो छूटता चला जाता है।

तुम कर क्या सकते हो?

सद्गुरु सिर्फ राह ही नहीं दिखाता है, रास्ता ही नहीं दिखाता है; राह और रास्ते तो किताबें भी बता सकती हैं, लेकिन सद्गुरु की भूमिका होती है कुछ और।  राह तो आपको भी पता है।  संत अगस्तीन बड़ी ही प्रीतिकर बात कहता है कि जिंदगी में क्या-क्या करना चाहिये ये मुझे भली भांति पता है लेकिन मैं हमेशा वही करता हूँ को मुझे नहीं करना चाहिये।  क्या-क्या मुझे नहीं करना चाहिये यह भी मुझे पता है लेकिन मैं हमेशा वही करता हूँ जो मुझे नहीं करना चाहिये।

रास्ता बताने की जरूरत नहीं है, रास्ता तो आपको भी पता है कि क्या करना चाहिये, और न भी पता हो तो जान सकते हो इधर-उधर से पूछ-पाछ कर।  लेकिन सद्गुरु की असली भूमिका है कि अगर उनका हाथ आपने पकड़ लिया तो वह आपको सही रास्ते पर चलने के लिए मजबूर कर देता है, सही रास्ते पर चलने के लिए विवश कर देता है।  कृष्ण ने अर्जुन को सिर्फ सही राह ही नहीं दिखायी, खींच खींच कर उस रास्ते पर लाये, बार बार अर्जुन ने भागने की चेष्ठा की लेकिन बार बार अर्जुन को उन्होने समझाया, खींचा, बार बार गड्ढों से निकाला और रास्ते पर ले गए, तब तक धक्के दे देकर चलाते रहे जब तक मंजिल पर पहुँच नहीं गया, यही गुरु की असली भूमिका है।

तुम कर क्या सकते हो, सिर्फ एक काम कर सकते हो।  तुम सद्गुरु को यथासंभव, अधिक से अधिक उपलब्ध रहो, जब भी मौका लगे, जितना अधिक से अधिक हो सके, उसके सान्निध्य में, उसके सामीप्य में होने का प्रयास करो।  यही इतना तुम कर सकते हो, बाक़ी सारा काम सद्गुरु का है, शेष काम वह स्वयं करता चला जाता है, करता चला जाता है, करता चला जाता है।