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हृदय खोलो, गुरु को जानो

वैसे ही जब तुम सद्गुरु के सान्निध्य में बैठोगे, उसके चरणों में बैठोगे तो तुम्हारी सबसे बड़ी आध्यात्मिक साधना होगी।  इसीलिए ऋषियों मनीषियों ने उस साधना का नाम दिया – उपनिषद। उपनिषद से जुयादा ज्ञान दुनिया के किसी धर्म ग्रंथ में नहीं है।  उपनिषद क्या है?  गुरु के चरणों में बैठकर शिष्यत्व प्राप्त करने की कला प्राप्त होती है।  जब गुरु के सान्निध्य में बैठने की ललक हो जाय, प्यास हो जाय, अभ्यास आ जाय, कला आ जाय, उसके बिना रहा न जाय, तब समझो परमात्मा तुम्हारे भीतर आने लगा है।  फिर समझो कि शांति व आनंद दूर नहीं है।  अब उसके झरने फूटने लगे हैं।

संसार दुखी है।  “नानक दुखिया सब संसार” कबीरदास ने कहा ऐसे लोग संसार में दुखी रहते हैं और जन्म मरण के बंधन से मुक्त नहीं हो पाते जो अपने सद्गुरु में परमात्मा के दर्शन नहीं कर पाते।  जो लोग अपने गुरु में परमात्मा का अनुभव नहीं कर पाते हैं वे जन्म मरण के बंधन से मुक्त नहीं हो पाते हैं।  क्योंकि इनके भीतर श्रद्धा पैदा नहीं हुई है और श्रद्धा के बिना आनंद प्राप्त नहीं होता है।  तुम्हारे भीतर श्रद्दा पैदा हो जाय तो आनंद व शांति के झरने अपने आप झरने लगेंगे।  एक क्षण की भी देर नहीं लगेगी।  सारे आध्यात्म का प्राण है – तुम्हारे भीतर श्रद्दा का बिन्दु प्रकट हो जाना।  तुम गुरु में परमात्मा की झलक का बोध नहीं कर पाते हो तो तुम पत्थर की मूर्ति में परमात्मा की झलक का बोध कभी नहीं पा सकते हो।  अगर तुम्हें अपने सद्गुरु के चरणों में परमात्मा की झलक नहीं मिली, अगर उसके प्रति तुम्हारे भीतर श्रद्धा पैदा नहीं हुई तो पत्थर की मूर्ति में भी कभी श्रद्धा पैदा नहीं हो सकती है।  सारा मनोविज्ञान कहता है, सारे ऋषि कहते हैं।

लेकिन तुम मूर्ति के सामने खड़े हो जाते हो, और भगवान की रत्न शुरू कर देते हो – हे भगवान, हे भगवान, जय भगवान।  मूर्ति के सामने तो भगवान रात लेते हो लेकिन गुरु को भगवान कहने में बहुत कठिनाई है, बड़ी मुश्किल है।  कभी भूले भटके कह भी दिया कि गुरुजी, आप तो मेरे लिए साक्षात भगवान हो, तो भले ही मुँह के कहते हो लेकिन भीतर से आता नहीं है।  मुँह से कहना भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि मुँह से कहते कहते ही अंदर से होने लगता है।  कितनी कठिनाई है तुम्हारे लिए जीवंत गुरु को परमात्मा कह पाना।  कहते भी हो ऐसे समय जब देख लेते हो कि आस पड़ोस का आदमी तो नहीं।  कोई और अधिकारी, कर्मचारी तो नहीं सुन रहा है।  दूसरा आदमी यह नहीं सोचेगा कि मैं इस गुरु को भगवान कह रहा हूँ।  कोई दूसरा आदमी सुनेगा तो क्या कहेगा।  कितनी मुश्किल से आप जीवंत गुरु को भगवान कह पाते हो।  महावीर की मूर्ति के सामने खड़े होकर तुम उनकी पूजा करते हो।  बुद्ध की मूर्ति के सामने खड़े होकर तुम साष्टांग दंडवत करते हो, प्रार्थना करते हो।

जबकि महात्मा बुद्ध ने कभी नहीं चाहा था कि उनकी मूर्ति को पूजा जाय।  उनका सारा बुद्ध धर्म ही मूर्ति पूजा के विरुद्ध आध्यात्मिक संचेतना के रूप में शुरू हुआ था।  बुद्ध का जीवन दर्शन ही मूर्ति पूजा के खिलाफ था।  लेकिन बुद्ध की मूर्ति के सामने खड़े होकर भगवान बुद्ध कहकर पुकारते हो।  लेकिन जब भगवान बुद्ध जिंदा रहते हैं, तब तुम उन्हें बुद्ध भगवान कहकर नहीं पूज पाते हो।

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