आलोचना मत कीजिये

आपके ऋषि-मनीषी बड़े समझदार थे।  उनहोंने आपसे यह नहीं कहा कि आप दूसरों की हत्या न करो, क्योंकि किसी की जान चली जाएगी।  उन्होंने यह नहीं कहा कि आप चोरी मत करों क्योंकि दूसरा परेशान होगा।  ऋषियों-मनीषियों ने, आपके ग्रंथकारों ने, जिन्होंने समाज की व्यवस्था बनाई कहा कि इन सबसे तुम्हें नरक मिलेगा।  अगर चोरी, डकैती, हत्या, हिंसा करोगे तो पीड़ा होगी यह बात तो सदा सिद्ध है लेकिन ऋषियों मनीषियों ने नरक का इतना भयावह चित्र प्रस्तुत किया कि तुम नरक के डर के मारे कोई बुरा काम नहीं करते हो।  जिस आदमी से जो करना चाहते हो वह उस काम को करने को तभी तत्पर होगा जब वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आत्म उपयोगिता समझेगा।

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि कोई भी कार्य ऐसा नहीं है जिसको कराने में आप दूसरे का लाभ सिद्ध नहीं कर सकते हो।  यह शत प्रतिशत सिद्ध तथ्य है।  हर कार्य को आप दूसरे से कराने में उसके लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपनी बात पैदा कर सकते हैं यानि दूसरों के हित-अहित की बात को सोच लेना पहली आवश्यकता है।  किसी को यदि आप आकर्षित करना चाहते हो, तो उसकी रुचि, उसके हित और उसकी अभिरुचि के बारे में पता लगाइये ।  तब वह ईमानदारी से आपका काम अपने आप करेगा।  आपको उसके लिये किसी प्रकार का कोई प्राणायाम नहीं करना पड़ेगा।  इसीलिए कहते हैं की दूसरे आदमी से उसी वस्तु के सम्बन्ध में बात करें, जिसकी उसे आवश्यकता है। आदमी अपनी आवश्यकता की बात सुनना चाहता है।  आप उस व्यक्ति की पूर्ती उस कार्य से कैसे कर रहे हैं?  अपनी परेशानी का ब्यौरा दूसरे आदमी को देने की जरूरत नहीं है।  चाहे आप व्यापारी, उद्योगपति हैं या आप किसी संस्था में काम करते हैं, चाहे जिस प्रकार का आपका उद्योग है, किसी भी कार्य में लोगों का सर्वप्रिय बनने और लोगों से अपना सारा काम कराने की योग्यता इस सूत्र में ही निहित है।

किसी भी व्यक्ति से काम लेने का एक ही उपाय है – जो चीज वह व्यक्ति चाहता है उसे वह मिल जाये।  मनोवैज्ञानिकों के अनुसार दुनिया में एक ही चीज है जिसको हर व्यक्ति चाहता है। वह चीज तुम देने में बड़ी कंजूसी करते हो। दुनिया के हर व्यक्ति की एक कामना सबसे प्रबल होती है लोगों की निगाहों में महत्त्वपूर्ण दिखने की लालसा।  आत्म सम्मान और आत्म-महत्त्व की धारणा कभी तृप्त नहीं होती है।  किसी न किसी रूप में आप जीवन जीते हैं, चाहे पति के रूप में, चाहे पत्नी के रूप में, चाहे शिक्षक के रूप में।  लेकिन आपकी एक लालसा अवश्य रहती है कि आप महत्त्वपूर्ण हैं और आपकी यह इच्छा पूर्ति पूरे जीवन भर नहीं हो पाती है।  जो व्यक्ति मनुष्य के ह्रदय की लालसा को ईमानदारी से शांत कर देता है, वह आसानी से दूसरों को मुट्ठी में कर लेता है।  और वह लोकप्रिय भी बन जाता है तो इस बात का ध्यान रखिये की जो भी व्यक्ति आपके संपर्क में आता है, आप उसके महत्त्वपूर्ण होने का अहसास अवश्य कराएँ।  वह व्यक्ति आपके लिए और सबके लिए महत्त्वपूर्ण है अगर यह महत्त्वपूर्ण होने की लालसा न रही होती तो अमेरिका का धनी कुबेर राजतिलक चीन के अस्पतालों में अरबों रूपये का दान न भेजता।  वह इसलिए भेजता था कि दुनिया के अख़बारों में निकले कि यह व्यक्ति चीन में लोगों की सहायता के लिए अस्पताल खुलवा रहा है और दवाइयां बँटवा रहा है।

90% लोग इसलिए पागल हो जाते हैं कि उनके जीवन की जो अद्भुत, महत्त्वपूर्ण और उपयोगी लालसा है या उनका जो सम्मानपूर्ण अस्तित्व है, उसकी क्षुधा की कभी पूर्ती नहीं हो सकी।  लोग इसी के लिए पागल हैं।  जैसे एक महिला के कभी बच्चे पैदा नहीं हो पा रहे थे, इसीलिए उसका पति उसके साथ दुर्व्यवहार करता था।  वह औरत निरंतर हीनता के भाव से ग्रसित हो गई और पागल हो गई।  उसने अपने सपनों से संसार में अपनी शादी बहुत बड़े घराने के रईस से कर ली और वह अपने को उस सामंत की पत्नी कहा करती थी।  जब मनोचिकित्सक के पास उसको ले जाया जाता था तो वह कहती थी डॉक्टर जी!  आज रात में मेरे बेटा हुआ था।  यह लालसा, जिसके कारण उसके अन्दर हीनता की भावना पैदा हो गई थी, उसके कारण वह स्त्री पागल तक हो गई।  90% लोग जो पागल हुए हैं, उसके पीछे उनके मन में हीनता की भावना का आ जाना ही है।  आप लोगों को पता ही नहीं चलता की आप के घरों में कोई न कोई सदस्य किसी न किसी प्रकार की हीनता की भावना से गुजरता है।  आप दूसरों से जब व्यव्हार करें तो उसके अन्दर हीनता की भावना न आने दें, उसको महत्त्व का भाव प्रदान करें।  लेकिन दुनिया में सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि मां – बाप बेटों को, लड़के लड़कियों को दिन भर कोसते हैं, नसीहत देते हैं, उनको ठुकराते हैं, उनको सुधारने के लिए अनाप-शनाप आलोचना, प्रत्यालोचना करते हैं।  इससे उनके अन्दर हीनता का भाव पैदा होता है।  वह आधे विक्षिप्त हो जाते हैं।  बहुत स्वाभाविक तथ्य है कि हिंदुस्तान के 50% बच्चे पागल हो चुके हैं और कुछ धीरे-धीरे पागल होने की दिशा में चल रहे हैं।  क्यों? क्योंकि आप का व्यव्हार उनके प्रति स्वस्थ नहीं है। आप उनकी हीनता की ग्रंथि को चौबीस घंटे उजागर करने में लगे रहते हैं।  आप को अगर छह दिन उपवास करना पड़े तो बहुत पीड़ा होगी।  लेकिन आप अपनी पत्नी को, बच्चों को, न जाने कितने मित्रों को, ऐसे लोगों को 6 दिन नहीं, 6 माह नहीं, 6 साल नहीं, 50 सौ साल तक भूखे छोड़ देते हो।  उनको हार्दिक प्रशंशा से वंचित रखते हो।  आप अपनी पत्नी, बच्चों, मित्रों और जिन लोगों से संपर्क में रोज आते हो, कभी ह्रदय से उनकी प्रशंसा नहीं करते हैं।  उस प्रशंसा के लिए उनके मन में उतनी लालसा रहती है जितनी लालसा आप सब को भोजन के लिए रहती है।  जिनसे मिलें, जिनके पास बाई, जिनके साथ रहें उनको सराहना अवश्य करें।  उनकी प्रशंसा करें।  उनको तुम हमेशा सालों साल भूखा रखते हो।  उनको ह्रदय खोलकर प्रशंसा का भोजन प्रदान कीजिये।  उनकी सराहना करिए, उनकी प्रशंसा करते रहिये।  उनकी सराहना करेंगे, उनकी प्रशंसा करेंगे तो जो आप चाहेंगे वही होगा।  इससे आप के प्राणों में अनंत ऊर्जा इकठ्ठा होगी।  शांति और आनंद आपके जीवन शैली के अंग बनने लगेंगे।  तभी आप आध्यात्मिक हो सकेंगे।  तभी पूजा प्रार्थना के लिए मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे अर्थ पूर्ण हो सकेंगे।

बहुत-बहुत धन्यवाद।  बहुत-बहुत- प्यार।

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s