दीक्षा

दीक्षा के नाम पर बहुत शोर मचा है लेकिन कोई भी दीक्षा को परिभाषित नहीं करता है। दीक्षा के नाम पर केवल दूसरों का दोहन ही होता है। शिक्षा व दीक्षा दो शब्द हैं। शिक्षा की प्रक्रिया लम्बी व धीमी होती है। जबकि दीक्षा की प्रक्रिया सूक्ष्म व सटीक होती है। यह एक विशेष ज्ञान होता है जिसका तीव्र असर होता है। किसी भी विषय का विस्तृत अध्ययन शिक्षा है। लेकिन किसी विषय का विशेष ज्ञान दीक्षा है। अर्थात जैसे कोई मेडिकल का छात्र वर्षों अध्ययन व अभ्यास के बाद चिकत्सक बन जाता है और कुछ विशेष ज्ञान या अनुभव प्राप्त कर लेता है। और फिर यह ज्ञान या अनुभव अगले किसी चिकत्सक को देता है, जोकि सूक्ष्म व तीव्र प्रभावी होगा। यही दीक्षा है। आध्यात्म में भी दीक्षा दी जाती है जो कि क्रमिक होती है अर्थात एक के बाद एक क्रम से कई दीक्षा होती है। जब साधना की पोस्ट लिखूंगा तब इसकी व्याख्या की जाएगी तथा साधना व दीक्षा का संबंध भी बताया जाएगा।

आध्यात्मिक यात्रा में गुरु का महत्त्व

जीवन में जब भी आध्यात्मिक यात्रा आरंभ होगी तो सबसे पहली और मूलभूत आवश्यकता होगी गुरु की। गुरु ही वह माध्यम होगा जिस से आध्यात्मिक ज्ञान व क्रिया प्राप्त होगी क्योंकि आध्यात्म में पूरा ज्ञान कोडेड है अर्थात गुप्त है, ज्ञान तो है लेकिन क्रियान्वित कैसे किया जाएगा यह गुप्त है। और सारा आध्यात्मिक ज्ञान कोडेड है, गुप्त है, इस ज्ञान को डिकोड करने के लिए गुरु की आवश्यकता होती है।

संस्कृत साहित्य और भी क्लिष्ट हो जाता है क्योंकि सारी जानकारी संदर्भों (references) में होती है अर्थात पूर्ववर्ती ज्ञान की भी जानकारी होनी चाहिए। इसीलिए जीवन में आध्यात्मिक प्रगति के लिए गुरु परम आवश्यक है। गुरु केवल जानकारी एवं ज्ञान ही नहीं डिकोड करता बल्कि और भी बहुत सी क्रियाएँ नियंत्रित करता है। एक उच्चकोटि का गुरु क्या क्या कर सकता है इसका और अधिक वर्णन अगली पोस्ट्स में किया जाएगा।  

मनुष्य शरीर और आत्मा का जोड़ है

मनुष्य शरीर और आत्मा का जोड़ है।  शरीर के लिए बहुत जरूरी है भौतिक सुख-समृद्धि की ऊंचाइयों पर होना।  पर आत्मा के लिए बहुत जरूरी है भीतर से परम शांति, परम आनंद की अवस्था को उपलब्ध करना।  आत्मा को भूखा नहीं रखा जा सकता, आत्मा भूखी रह गयी तो जीवन नरक हो जायेगा और चाहे जितनी धन सम्पदा आपके पास हो और सिर्फ आत्मा को स्वस्थ करने में लगे रहे, शरीर और भौतिक दिशाओं में ध्यान नहीं दिया तो दीनता, दरिद्रता, अपंगता की स्थिति को उपलब्ध हो जाएंगे।  भौतिक जीवन और भीतर की शांति और आनंद को उपलब्ध करने वाला आध्यात्मिक जीवन कैसे मिले इसीलिए मैंने गीता, क़ुरान, बाइबिल, धम्मपद और दुनिया के जीतने संबुद्ध पुरुषों ने अपनी खोज, अपनी तलाश के द्वारा अभिव्यक्तियाँ दी थी सबको गहरे में तलाशा, गहरे में खोजा तो जिस निष्कर्ष पर निकला उसे मैंने साइन्स डिवाइन के तीन महामंत्रों के माध्यम से दुनिया को अर्पित करने की चेष्ठा की।  अगर ये तीन महामंत्र आपके प्राणों में उतार जायें तो गीता, क़ुरान, बाइबिल से लेकर पृथ्वी पर अब तक जो भी धर्म, आध्यात्म, और मनोविज्ञान के क्षेत्र में भौतिक और आध्यात्मिक दिशा में प्रगति करने के लिये आवश्यक है सब समाहित हो जाता है, सब प्रकट हो जाता है।  तो कहीं से आप शुरू कर सकते हैं, पहुंचेंगे वहीं।  पर तीनों महामंत्र आपके प्राणों में आत्मसात हो जायें इसके लिये सिर्फ तीन महामंत्रों की समझ ही पर्याप्त है।  अगर आपको इनकी समझ आ गयी तो इनकी समझ का परिणाम होता है की धीरे-धीरे आपके भीतर का रसायन बदलने लगता है और आपके इस जीवन में जो होने लायक है वो होना शुरू हो जाता है, जो छूटने लायक है वो छूटता चला जाता है।

तुम कर क्या सकते हो?

सद्गुरु सिर्फ राह ही नहीं दिखाता है, रास्ता ही नहीं दिखाता है; राह और रास्ते तो किताबें भी बता सकती हैं, लेकिन सद्गुरु की भूमिका होती है कुछ और।  राह तो आपको भी पता है।  संत अगस्तीन बड़ी ही प्रीतिकर बात कहता है कि जिंदगी में क्या-क्या करना चाहिये ये मुझे भली भांति पता है लेकिन मैं हमेशा वही करता हूँ को मुझे नहीं करना चाहिये।  क्या-क्या मुझे नहीं करना चाहिये यह भी मुझे पता है लेकिन मैं हमेशा वही करता हूँ जो मुझे नहीं करना चाहिये।

रास्ता बताने की जरूरत नहीं है, रास्ता तो आपको भी पता है कि क्या करना चाहिये, और न भी पता हो तो जान सकते हो इधर-उधर से पूछ-पाछ कर।  लेकिन सद्गुरु की असली भूमिका है कि अगर उनका हाथ आपने पकड़ लिया तो वह आपको सही रास्ते पर चलने के लिए मजबूर कर देता है, सही रास्ते पर चलने के लिए विवश कर देता है।  कृष्ण ने अर्जुन को सिर्फ सही राह ही नहीं दिखायी, खींच खींच कर उस रास्ते पर लाये, बार बार अर्जुन ने भागने की चेष्ठा की लेकिन बार बार अर्जुन को उन्होने समझाया, खींचा, बार बार गड्ढों से निकाला और रास्ते पर ले गए, तब तक धक्के दे देकर चलाते रहे जब तक मंजिल पर पहुँच नहीं गया, यही गुरु की असली भूमिका है।

तुम कर क्या सकते हो, सिर्फ एक काम कर सकते हो।  तुम सद्गुरु को यथासंभव, अधिक से अधिक उपलब्ध रहो, जब भी मौका लगे, जितना अधिक से अधिक हो सके, उसके सान्निध्य में, उसके सामीप्य में होने का प्रयास करो।  यही इतना तुम कर सकते हो, बाक़ी सारा काम सद्गुरु का है, शेष काम वह स्वयं करता चला जाता है, करता चला जाता है, करता चला जाता है।

असीमित सफलता प्राप्ति के लिये आकर्षण के नियम का उपयोग

प्रत्येक सफलता और उपलब्धि के लिए स्वयं की प्राप्त करने की क्षमता पर सीमाओं का अधिरोपण ही सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है।  वैज्ञानिकों के प्रयोगों के अनुसार, एक व्यक्ति के मसतिष्क में रोज औसतन ६०,००० विचार आते हैं।  अधिक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि उनमें से लगभग ९५% विचार वही होते हैं जो आपके भीतर एक दिन पहले भी थे।  इस तरह से हर व्यक्ति एक सीमित विचार स्वरूप को विकसित करता है और इसी सीमित विचार स्वरूप के ढांचे में जीवन जीने की ओर अग्रसर हो जाता है।

कभी-कभी आपको हैरानी होती होगी कि आपकी आय सीमित क्यों है।  आपकी वर्तमान आय सीमित इसलिए है क्योंकि अपने अपने आप को इसी आय को अर्जित करने के लिए सीमित कर लिया है।  आप बहुत आसानी से इसका ५, १०, या २० गुणा कमा सकते थे यदि आपने अपने सीमित विचारों से, जो कि आज भी कायम है, अपने आप को बांध नहीं रखा होता।  निश्चित रूप से, नहीं, आप ऐसे लोगों को अवश्य जानते होंगे जो आपसे अधिक कमाते हैं, जबकि वे आप जैसी शिक्षा, गुण और बुद्धिमत्ता के स्वामी नहीं हैं।   इसीलिए, सीमित विचार स्वरूप को असीमित विचार स्वरूप की आदत से अवश्य बदल दिया जाना चाहिये।

आकर्षण का नियम 2

हर विचार एक कारण है और हर कार्य या उत्पन्न परिस्थिति उसका परिणाम मात्र है। इस विश्व में विचार ही सबसे महत्त्वपूर्ण, रहस्यपूर्ण और अदृश्य, जीवित मौजूद शक्ति है। विचार बिलकुल जीवित वस्तुओं की तरह हैं। बाहरी सफलता भीतर की सफलता से ही प्रारम्भ होती है और यदि वास्तव में गंभीरतापूर्वक अपने वाह्य जीवन की गुणवत्ता को सुधारना चाहते है, तो आपको पहले अपने आंतरिक जीवन को सुधारना होगा। मस्तिष्क में छुपी हुई असीमित क्षमताओं को खोजना सीखने और इसके प्रभावी प्रयोग से, जो आप बनना चाहते हैं वह बनने और जीवन में असाधारण सफलता प्राप्त करने से महत्त्वपूर्ण कुछ भी नहीं है।
आकर्षण का नियम, ब्रह्माण्ड का प्रकृतिक नियम है। इसके अनुसार, “लाइक अट्रैक्ट्स लाइक” यानि जब आप किसी विशेष विचार पर ध्यान केन्द्रित करते हैं तो आप उसी तरह के अन्य दूसरे विचारों को अपनी ओर आकर्षित करना प्रारम्भ कर लेते हैं। विचारों में चुम्बकीय शक्ति है और वे अपनी विशेष आवृत्ति (फ्रिक्वेन्सी) पर काम करते हैं। अतएव, वे उस फ्रिक्वेन्सी पर कार्य कर रहे अन्य सभी समान विचारों आकर्षित करना और आपको सर्वथा प्रभावित करना प्रारम्भ कर देते हैं। आप ब्रह्माण्ड के सबसे शक्तिशाली संचरण मीनार (ट्रांसमिसन टावर) हैं। यह आप पर निर्भर करता है कि आप नियति को क्या संदेश देना और उससे क्या प्राप्त करना चाहते हैं।

धर्म समझ की क्रांति है

जो अस्तित्व तुम्हें दे रहा है उसे स्वीकार करो, दुख आये उसे स्वीकार करो, यदि तुम उसे स्वीकार कर लेते हो, उससे संघर्ष नहीं करते हो तो दुख भी सुख में बदल जाता है।  अन्यथा तुम्हें क्या पता कि सुख क्या है दुःख क्या है।  जिसे चाहते हैं उसे पाने के लिए दौड़ते रहते हैं दिन और रात पर वह नहीं मिलता।  और जिसे सुख समझकर पकड़ते हो, मालूम चलता है कि वो सुख है ही नहीं।  जैसे मछली दौड़ती है मछुए की कटिया के पीछे, चारा समझकर उस पर झपटती है, पर बाद में पता चलता है कि वह तो कांटा था।  तुम्हारे सारे सुख इसी तरह हैं।  मिलते ही पता चलता है कि इसमें तो कांटे छिपे हैं।  तुम हमेशा भ्रम में जीते हो।  और इसी आशा में जीये चले जा रहे कि जो तुम्हें चाहिए वो आज नहीं तो कल मिल जाएगा।  ऐसे ही भागे जा रहे हो, जैसे आसमान और जमीन, जहां मिलते हैं दूर से देखने पर ऐसा लगता है, जैसे पकड़ लोगे।  लेकिन पास में जाने पर मालूम पड़ता है कि अभी उतनी ही दूरी है।  ऐसे ही निरंतर तुम भागे जा रहे हो। तुम्हें मिलता हुआ लगता है, पर मिलता नहीं हैं।  तुम्हें प्रतीति हो जाये, यह एहसास हो जाये कि यह सुख नहीं है।  इसी का तुम्हें विज्ञान बताना चाहता हूँ।  जिसे समझने में तुम सौ साल लगा दोगे तो भी नहीं समझ पाओगे।  तुम्हें निचोड़ बता रहा हूं, तुममे समझ पैदा करना चाहता हूं कि धर्म समझ की क्रांति है।

मुरारी लाल सम्राट के यहाँ का नौकर था।  उसके शयन कक्ष की सफाई करता था।  उसके मन में यह विचार आया कि कितना आरामदायक, सुगंधित, गद्देदार बिस्तर है।  सम्राट का नौकर एक दिन अपने लोभ को न रोक सका। देखा आस पास में कोई नहीं है। उसने सोचा कि सम्राट के बिस्तर पर लेटा जाये।  लोट-पोट होकर सो लेता है।  फिर बादशाह की तरह लेट जाता है और कहते हैं कि थोड़ी ही देर में उसे नींद आ गई। पंद्रह मिनट के बाद उसे झकझोर कर उठा दिया गया और इस महापाप के लिए सम्राट के सामने सभा में बुलाया गया और सज़ा दी कि पचास कोड़े मारे जायें।  जैसे ही पहला कोड़ा लगता है मुरारी लाल जोर से खिलखिला कर हंस पड़ता है।  दूसरा कोड़ा लगता है तो भी मुरारी लाल खिलखिलाकर हँसता रहता है।  लेकिन जब आठ-दस कोड़े लगे तो मुरारीलाल की पीठ लहू-लुहान होने लगती है, फिर भी रोने के बजाय मुरारी लाल हँसता रहता है।  तब सम्राट कहते हैं, ‘रोको, पहले इससे हंसने का कारण पूछो।  मेरे द्वारा दी गई सज़ा का अपमान क्यों कर रहा है यह?’  मुरारी लाल ने कहा, ‘हुज़ूर, मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूं और न ही अपमान कर रहा हूं, मैं तो यह हिसाब लगा रहा हूं कि सिर्फ १५ मिनट पहले आपके बिस्तर पर सोने से इतनी बड़ी सज़ा मिली और आप इस बिस्तर पर पिछले चालीस वर्षों से सो रहे हैं तो आपका कितना बुरा हाल होगा’।  सम्राट की तरह तुम सबको लगता है कि तुम भी सुख में जी रहे हो।  लेकिन तुम जिसको सुख समझ रहे हो, वह एक तरह का कोढ़ है, जिसका तुम्हें पता नहीं चलता।  इसीलिए सद्गुरु ने तुम्हें राह बताने की कोशिश की है कि कैसे तुम्हें दुखों से बचाया जाये, कैसे तुम्हें उससे छुड़ाया जाये।  एक ही तो उद्देश्य है मनुष्य का, एक ही तो लक्ष्य है कि दुखों से कैसे छुटकारा मिले?  और सुखों को कैसे प्राप्त किया जाए?  इसी लक्ष्य को पाने के लिए संतों ने अनेक प्रकार के उपाय बताये, इसी के लिए संतों ने परमात्मा को पैदा किया।  किसी ने कहा कर्म योग मार्ग, किसी ने कहा भक्ति योग मार्ग, किसी ने कहा कि ज्ञान योग मार्ग।  कभी-कभी मुझसे पूछा जाता है ‘गुरुजी! आप का कौन सा मार्ग है?  आप कर्म योगी हो, ज्ञान योगी हो अथवा भक्ति योगी हो?’  आज मैं आपसे अपने जीवन के अनुभव का सार बताना चाहता हूं।  जीवन के चार आयाम हैं।  सबसे पहले जो आयाम परिधि पर है, बिल्कुल बाहर-बाहर वह कर्म का क्षेत्र है।  वहाँ पर मनुष्य कर्म को ही जीवन मान लेता है।  जीवन भर कर्म करता रहता है।  सबसे बाहर कर्मों का जगत है और थोड़ा भीतर आओ तो उसके बाद आते हैं विचार।  विचार करने के भी पहले आता है एक और जगत उसे कहते हैं भाव जगत।  प्रेम, स्नेह, श्रद्धा, करुणा ये भाव पीछे रहते हैं और अत्यंत भीतर बिलकुल केंद्र की ओर आओ तो एक यह भाव आता है कि एक चेतना है, यह चेतना ही मनुष्य के जीवन का केंद्र है, चेतना ही आत्मा का तल है जो इन सब चीजों से अछूता है, साक्षी है, वो ही सिर्फ देख रहा है, तुम्हारा मूल स्वरूप, आत्मस्वरूप, सिर्फ साक्षी।  इसके इर्द-गिर्द तीन जगत व भाव जगत में प्रेम है, घृणा है, स्नेह है, दूसरा जगत विचार का जगत है और सबसे बाहर है कर्म का जगत।  और चौथी मंजिल है तुम्हारा आत्म स्वरूप, तुम्हारी चेतना।  तीन तो है मार्ग और चौथी है मंजिल।  यानि तुम्हें मूल स्वरूप साक्षी मिल जाए, तुम अपने मूल स्वरूप में आ जाओ।  मेरे जीवन का यही उद्देश्य है कि तुम्हारी परमात्मा से प्रतीति हो जाये।

परमात्मा-कौन, कहाँ?

एक वृक्ष अपने लिए नहीं जिया करता है, वह दूसरों के लिए जीता है।  वह अपनी छाया से भी लाभ देता है।  वह अपनी गहन छाया में सबको बैठाता है, उसके पत्तों और फल से भी लाभ होता है। जीना उसी आदमी का श्रेष्ठ है, जो दूसरों के लिए जीये, अपने लिये जिया तो क्या जिया।

वह धर्म क्या है जिसमें खुशी न हो।  वह धर्म क्या जिसमें आनंद न हो, वो धर्म क्या है जिसमें आत्मा प्रफुल्लित होकर रोम रोम न खड़े हो जायें।  वह मायूस धर्म किस काम का है, जिससे चेहरे पर उदासी बनी रहे और रात-दिन चिंता बनी रहे।  धर्म वही है जो आनंदित हो, प्रफुल्लित हो, खुशी देता हो।

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आकर्षण का नियम

आकर्षण का नियम, ब्रह्माण्ड का प्राकृतिक नियम है। इसके अनुसार, “लाइक अट्रैक्ट्स लाइक” यानि जब आप किसी विशेष विचार पर ध्यान केन्द्रित करते हैं तो आप उसी तरह के अन्य दूसरे विचारों को अपनी ओर आकर्षित करना प्रारम्भ कर लेते हैं। विचारों में चुम्बकीय शक्ति है और वे अपनी विशेष आवृत्ति (फ्रिक्वेन्सी) पर काम करते हैं। अतएव, वे उस फ्रिक्वेन्सी पर कार्य कर रहे अन्य सभी समान विचारों आकर्षित करना और आपको सर्वथा प्रभावित करना प्रारम्भ कर देते हैं। आप ब्रह्माण्ड के सबसे शक्तिशाली संचरण मीनार (ट्रांसमिसन टावर) हैं। यह आप पर निर्भर करता है कि आप नियति को क्या संदेश देना और उससे क्या प्राप्त करना चाहते हैं।

आपका वर्तमान जीवन आपके बीते हुए कल में आप द्वारा की गयी इच्छाओं और विचारों का परिणाम है और, जैसे आपके विचार आज हैं उससे आपका भविष्य निर्मित होगा। “विचार शक्ति का विज्ञान” का सार है कि आप जिस विषय में विचार करते हैं या ध्यान केन्द्रित करते हैं आपको वही प्राप्त होता है, चाहे आप चाहें या न चाहें। एक दूसरे से मिलते जुलते सारे विचार एक ही दिशा में पंक्तिबद्ध होकर वस्तु रूप लेने लगते हैं। निराकार साकार रूप लेने लगता है।

आप जिस भी संबंध में विचार कर रहे हैं वह आपके भविष्य की घटनाओं की योजना बनाने जैसा है। जब आप किसी की प्रशंसा कर रहे हैं तब भी आप योजना बना रहे हैं। जब आप किसी विशेष विषय में चिंता कर रहे हैं तब भी आप योजना बना रहे हैं। चिंता करना आपकी कल्पनाशक्ति से कुछ ऐसा करवाती है जैसा आप अपने जीवन में कभी नहीं होने देना चाहेंगे। इस तरह हर विचार विश्व व्यवस्था या ब्रह्माण्ड को एक निमंत्रण है और आपके विचार शक्ति से निमंत्रण के बिना आपके जीवन में कुछ भी घटित नहीं हो सकता है। और, विश्वास रखें, शक्तिशाली आकर्षण के नियम का कोई अपवाद नहीं है।

कल्पनाओं से परिपूर्ण विचार समान चीजों को वास्तविकता की ओर आकर्षित करते हैं। मतलब आपके विचार अपने साथ की कल्पना की शक्ति से और भी शक्तिशाली हो जाते हैं। विचारों को वास्तविकता में बदलने में कल्पनाएं एक शक्तिशाली भूमिका निभाती हैं। यदि आप किसी ऐसे लक्ष्य के बारे में सोचिए जिसके बारे में आपका उत्साह आधा-अधूरा हो। इस लक्ष्य को पाने में आपको अधिक समय लगेगा।   परंतु यदि आप भावनात्मक रूप से पूरी तरह उत्साहित हैं तो आपको लक्ष्य बहुत जल्दी प्राप्त होगा। दूसरे शब्दों में, यदि आपके विचार आपको लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में ले जाने वाले वाहन हैं तो आपकी भावनाएं ईंधन हैं जो इस वाहन को शक्ति देती हैं।

आप अपने जीवन में होने वाली हर घटना के उत्तरदायी हैं। किसी स्तर पर – चेतन या अचेतन, आपने हर आदमी, हर विचार, हर रोग, हर आनंद और दर्द के हर क्षण को अपने जीवन में आकर्षित किया है। आप जो भी विचार करते हैं और जो भी अनुभव करते हैं वह बिना किसी अपवाद के आपके जीवन में घटित हो जाता है। यह होता ही है चाहे भले ही आप ऐसा न चाहते हों।

अपने जीवन को बेहतर तरीके से नियंत्रित करने के लिये, अपनी दिनचर्या को विभागों में विभाजित करने का प्रयास कीजिये। इसका सबसे अच्छा तरीका है की अपनी घरेलू जिंदगी, स्कूल की जिंदगी, निजी जिंदगी, और पारिवारिक जिंदगी को अलग-अलग कर दें। ध्यान रखेँ अपनी प्राथमिकताओं को इनके साथ न उलझाएं।

यह पृथक्करण आपकी कई तरीकों से मदद करेगा। यह आपके तनाव के स्तर को कम करने में, आपकी विचार शक्ति को बढ़ाने में, आपको और प्रभावशाली और उपजाऊ बनने में मदद करेगा। इस अलगाव की सबसे विशेष बात यह है की यह आपको स्वाभाविक रूप से परिपक्क्व बनाएगा।

गुरु पूर्णिमा महोत्सव

गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर, गुरु पूर्णिमा का उत्सव मनाने एवं परम पूज्य साक्षी राम कृपाल जी का आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु आप अपने परिवार, संबंधियों और मित्रों के साथ हृदय से आमंत्रित हैं।

मुख्य कार्यक्रम:
– “हँसता हुआ जीवन जीने का विज्ञान” विषय पर गुरुदेव द्वारा विशेष संदेश।
– सद्गुरु साक्षी श्री की दिव्य वाणी, दिव्य दृष्टि और पवित्र स्पर्श द्वारा सकारात्मक ऊर्जा का हस्तांतरण।
– संगीत एवं नृत्य के माध्यम से दिव्य परमानंद का अनुभव।
– भोजन महाप्रसाद का वितरण (अवश्य ग्रहण करें)।

महत्त्वपूर्ण: कृपया चरम क्षणों की असुविधा से बचने के लिए समय से पूर्व पहुंचें।

संपर्क: 09891178105, 09811847375

Guru Poornima Mahotsav

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