आलोचना मत कीजिये
अब्राहम लिंकन जब युवक था तो उसे हमेशा किसी को पकड़ लेना और किसी की आलोचना करने का बड़ा शौक था। युवा अवस्था में लोग ज्यादा विवादी हुआ करते हैं। ऐसे ही किसी की एक दिन उसने आलोचना की और उसको चिट्ठी लिखी। उसकी कई प्रतियाँ बन गयीं जो कई लोगों को मिल गयीं। वह व्यक्ति इतना आहत अनुभव करने लगा कि वह अस्त्र – शस्त्र लेकर अब्राहम लिंकन के पास आ गया। उसने कहा – मुझे तो अब आपसे द्वंद – युद्ध करना है। मध्य युग की यह बहुत बड़ी परंपरा थी की अगर किसी से किसी बात का विवाद हो जाता था तो लोगों को द्वंद युद्ध करना पड़ता था। अतः उसे द्वंद युद्ध के लिए आना पड़ा यानि जान को भी खतरे में डालना पड़ा। युद्ध शुरू हुआ। अब्राहम लिंकन की उस व्यक्ति से लगभग आधे घंटे लड़ाई चली थी। उस बीच कोई एक दूसरा व्यक्ति आ गया जिसकी मध्यस्थता के कारण वह युद्ध रुका। अब्राहम लिंकन ने लिखा है कि उस घटना के बाद उसने अपने जीवन में कभी किसी की आलोचना नहीं की। उसने यह भी लिखा है कि वह मेरा संकल्प ही मुझे अमेरिका जैसे महान देश के राष्ट्रपति के महान पद की ओर ले गया। उसके बाद मैं जहाँ भी जाता था, लोगों को एक बात की नसीहत जरूर देता था कि कभी किसी की आलोचना मत कीजिये, जिससे कोई दूसरा व्यक्ति भी तुम्हारी आलोचना न कर सके। यह कला आपको आ गयी तो आपके चाहने वालों की संख्या बहुत बढ़ जाएगी। आपके जीवन में शांति और आनंद पैदा होगा। अब्राहम लिंकन ने दूसरी बात यह भी कही थी कि तुम जिनकी आलोचना करते हो, अपने को एक बार उनकी अवस्थाओं में रख कर देखो। 99% सम्भावना है कि तुम भी वही करोगे। इसीलिए किसी की आलोचना करने को मन ललचाये तो अपने को उसकी स्थिति में महसूस करो। ऐसा सोचो कि जैसे उसकी जगह पर तुम्हीं हो। यदि आपने 10 बार, 15 बार, 20 बार ऐसा प्रयोग किया यानि अपने को दूसरे की जगह रखने की चेष्ठा की तो आपके भीतर क्रोध आना और दूसरे की आलोचना करने का भाव पैदा होना असंभव हो जाएगा।
बेंजामिन फ्रैंकलिन फ़्रांस में अमेरिका के राजदूत हुआ करते थे। बहुत साधारण से जीवन से उठकर इतने बड़े राजनैतिक पद पर पहुंचे थे। उनकी बहुत कुशल और दक्ष व्यक्तित्व के रूप में गणना की जाती है। एक बार उनसे कुछ लोगों ने पूछा कि राजकार्यों में सफलता का राज क्या है? तो उन्होंने कहा था – मैंने अपने जीवन के प्रारंभ में एक महत्त्वपूर्ण संकल्प लिया था कि मैं किसी को बुरा नहीं कहूँगा। हर व्यक्ति जिसको मैं जानता हूँ, उसकी कोई न कोई अच्छी बात को याद कर लूँगा और जब भी जरूरत पड़ेगी, मैं उस व्यक्ति की अच्छी बात को जरूर उजागर करूंगा। इस संकल्प का पालन मैंने जीवन में भी किया। इसका परिणाम यह रहा कि पूरे राज्य में मुझको चाहने वाले, मेरी सराहना व प्रशंशा करने वाले और मेरे लिए सब कुछ दांव पर लगा देने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढती ही चली गयी। तुम भी ऐसा कर सकते हो।
मूर्ख व्यक्ति तो हमेशा आलोचनाएँ और सिर्फ दोषारोपण करते रहते हैं। लोग पूछते हैं – मूर्ख व्यक्ति कौन है? मेरी समझ में तो मूर्ख व्यक्ति की एक ही परिभाषा है – जो हमेशा दूसरों की आलोचना करते हैं। दूसरों पर दोषारोपण करते हैं और जो हमेशा किसी न किसी की शिकायत करते रहते हैं। मैं उसी को मूर्ख समझता हूँ जो हर मनुष्य में कोई न कोई बुराई का बिंदु ढूंढ ही लेता है। समझदार व्यक्ति वही है जो गधे को भी मनुष्य का सम्मान देता है।
आप दूसरों की आलोचना क्यों करते हैं? ऋषियों मनीषियों ने कहा की परमात्मा भी मनुष्य की चौबीस घंटे आलोचना में नहीं लगा रहता है। आप जो कुछ काम करते हो उसका मूल्यांकन भी नहीं करता है। धर्म-ग्रंथों ने कहा है – परमात्मा आपको छूट देता है, जैसा चाहो वैसा करो। वह रोज – रोज आपको नहीं टोकता है। आप कहते हैं मरने के बाद पूरा-पूरा लेखा-जोखा लेता है। जब वह ईश्वर ही इतनी दया करता है कि वह आपको टोका नहीं करता। आपकी आलोचना-प्रत्यालोचना नहीं करता। आपको पैदा कर दिया। आपको सुपुर्द कर दिया। जैसा चाहो वैसा करो। हाँ, मरने के बाद एक बार बिठाकर हिसाब किताब कर लेता है, यह दूसरी बात है। लेकिन आप तो रोजाना और हर पल दूसरों से हिसाब किताब करते हो।
मैं एक जादुई बात बताना चाहता हूँ, जिससे आपका व्यक्तित्व अत्यंत हृदयग्राही, आकर्षक एवं सर्वप्रिय बन सकता है। अगर आप दुनिया के किसी व्यक्ति से कोई काम कराना चाहते हैं तो दुसरे मनुष्य को उस काम को करने की आवश्यकता का अनुभव करा दीजिये अर्थात कुछ ऐसा करिये, जिससे दूसरा आदमी यह अनुभव करने लगे कि यह काम करना उसके स्वयं के लिए जरूरी है, लाभकारी और उपयुक्त है। आप किसी के लिये ऐसा मत कहिये कि आप ऐसा करने में मेरा सहयोग करें। आप कुछ ऐसा ढंग पैदा करें कि वह आदमी यह अनुभव करे कि उस काम को करने से उसको भी प्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से कुछ लाभ होगा। अगर आप उस कार्य को करने के लिए उसकी उपयोगिता सिद्ध कर देते हैं तो वह व्यक्ति आपके इशारे मात्र से उस काम को करने में तत्पर हो जायेगा।
पिंगबैक: आलोचना | साइंस ऑफ़ डिवाइन लिविंग