आलोचना मत कीजिये
भौतिक समृद्धि, आध्यात्मिक प्रगति के शिखर पर पहुँचने की पहली सीढ़ी है। मैं प्रार्थना करता हूँ कि तुम्हारे जीवन में शांति और आनंद तो बढ़े ही, उसके साथ-साथ आपकी भौतिक समृद्धि भी हो। कुछ ऐसे सूत्र हैं, जिन्हें तुम व्यव्हार में अगर ले आओ तो तुम्हारा व्यक्तित्व आकर्षक बनेगा। तुम्हारे भीतर बोलने की ह्रदय-ग्राही क्षमता आ जायेगी। तुम अपने कार्य में, उद्यम में व व्यापर में और सफलता प्राप्त कर सकोगे और तुम जो भी करोगे वह दूसरों को भी आकर्षित करेगी।
तुम्हारे भीतर अनंत ऊर्जा है, अनंत शक्ति के स्रोत हो तुम। लेकिन सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि तुम्हारी 90% शक्तियां सोयी रहती हैं। सद्गुरु का काम है – तुम्हारी सोयी हुई शक्तियों को जगाना। तुम्हारी बहुत सी शक्तियां नित्य-प्रति तुम्हारी जीवन-शैली की कमजोरियों के कारण नष्ट हो जाती हैं। तुम्हारे भीतर शांति, शक्ति और आनंद नहीं पैदा हो पाता । झरने जैसी शक्ति तुम्हारे भीतर है, लेकिन तुम जीवन ऐसा जीते हो कि वह शक्तियां विभिन्न स्रोतों से इधर-उधर बह जाती हैं। सही दिशा में नहीं चल पाती हैं। ऊर्जा का संचय नहीं हो पाता है। अगर तुम सद्गुरु के शब्दों के प्रति जागरूक हो सको तो क्रांति हो सकती है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि तुम जिस क्षेत्र में भी काम करते हो उस क्षेत्र में तुम्हारी सफलता का 75% कारण होता है – तुम्हारा व्यक्तित्व और दूसरे लोगों से काम लेने की तुम्हारी योग्यता। तुम्हें 25% सफलता मिलती है उस काम के बारे में, तुम्हारे व्यावसायिक व तकनीकी ज्ञान के कारण । यानि 75% भूमिका है तुम्हारे व्यक्तित्व की । तुम कैसे हो? तुम कैसे बोलते हो? कैसे उठते – बैठते हो? लोगों से व्यव्हार कैसा है? दूसरों को तुम किस प्रकार प्रभावित करते हो? दूसरे व्यक्तियों से कितना काम ले सकते हो और किस प्रकार काम करा सकते हो? यह सब तुम्हारे व्यक्तित्व की क्षमता पर निर्भर करता है। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा व्यक्तित्व समृद्ध और आकर्षक हो। इसी सम्बन्ध में मैं कुछ चर्चा करना चाहता हूँ। तो पहला सूत्र है – दूसरों की आलोचना मत कीजिये। यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण सूत्र है। एक पाश्चात्य विद्वान् ने एक बात कही थी कि जितनी मक्खी एक बूँद शहद से पकड़ सकते हो उतनी चार गैलन सिरके से नहीं। दुनिया में कोई व्यक्ति अपने को दोषी ठहराना नहीं चाहता है। यदि कोई आपकी आलोचना करे तो आप तुरंत अपने को निर्दोष सिद्ध करने लगोगे। कोई व्यक्ति अपने दोषों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। हर व्यक्ति का मनोवैज्ञानिक स्वाभाव है कि जैसे ही उसकी बुराई कहीं की जाती है, वैसे ही अपने को निर्दोष सिद्ध करने लगता है और जब कोई तुम्हारी आलोचना करता है तो उसका प्रभाव यह पड़ता है कि तुम्हारे अहंकार को चोट लगने लगती है, तुम्हारे आत्म सम्मान को पीड़ा पहुँचती है। आलोचना कितनी भी ठीक हो, लेकिन बहुत गहराई से ह्रदय में चुभती है। ऐसे ही जब तुम किसी की आलोचना करते हो तो तुम्हारे शब्द तीर की तरह चुभते हैं। उसके भीतर ऐसा प्रबल क्रोध पैदा होता है कि वह तुम्हारा शत्रु बनने के लिए विवश हो जाता है। आप तो सोचते हैं कि इसने गलती की है तो इसे कहने में कोई हर्ज नहीं है। यह सुधर जायेगा, मैं तो सच्ची बात कह रहा हूँ। तुम्हारी आलोचना के शब्द उसी क्षण तुम्हारा शत्रु पैदा कर देते हैं। शत्रु कितना भी कमजोर हो, वह तुम्हारी ऊर्जा का क्षरण करने लगता है। तुम मित्र को तो भूल जाते हो लेकिन शत्रु को कभी नहीं भूल पाते हो। सोने जाते हो तो तुम्हारा शत्रु तुम्हारे साथ सोता है। सुबह सोकर उठते हो तो मित्र की याद नहीं आती, शत्रु की तुरंत याद आती है। तुम्हारे साथ ही वह भी सुबह उठ जाता है, और तुम सोचते हो कि वह न जाने क्या-क्या चाल चल रहा होगा, आज कौन सा षड्यंत्र रचेगा? आज मैं घर से निकलूंगा तो हो सकता है कि उसने रास्ते में गुण्डे लगा रखे हों; यानि तुमने आलोचना करके ऐसा शत्रु पैदा कर लिया जो चौबीस घंटे उठते – बैठते, खाते – पीते, सोते – जागते तुम्हारे साथ लग जाता है और उसकी काट करने में ही तुम्हारी सारी ऊर्जा नष्ट हो जाती है। ऐसे में कोई पूजा नहीं हो पाती है। शत्रु पैदा मत करो। जिससे तुम्हारी ऊर्जा का क्षरण रूक सके और तुम्हारे भीतर की शांति भंग न हो। तुमने आलोचना की बस, शत्रु पैदा हुआ और तुम्हारे भीतर अशांति पैदा होनी शुरू हो जाती है। अशांत चित्त से तुम मंदिर, मस्जिद जाओगे तो वहां परमात्मा नहीं दिखाई पड़ेगा। इसीलिए मैं कहता हूँ कि चित्त में शांति पैदा करो और शांति को पैदा करने का सबसे बड़ा सूत्र है – दूसरों की आलोचना मत कीजिये। शत्रुता में जीना ही नरक है।
पिंगबैक: आलोचना | साइंस ऑफ़ डिवाइन लिविंग