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असीमित सफलता प्राप्ति के लिये आकर्षण के नियम का उपयोग

जीवन में असीमित उपलब्धियों की सुनिश्चिति के लिये आपको अपने विचारों के स्वरूप में दो अति महत्त्वपूर्ण आयाम जोड़ने चाहिए।

  • बड़ा सोचें और बड़े सपने देखें

नेपोलियन हिल का सबसे प्रसिद्ध कथन पूर्णरूपेण स्थापित है कि “मनुष्य का मस्तिष्क जो विचार और विश्वास कर सकता है उसे प्राप्त भी कर सकता है”।  वास्तव में, मेरा अनुभव कहता है कि हम जीवन में उसी सीमा तक प्राप्त कर सकते हैं जो हम बनाते हैं और अपने ऊपर लागू करते हैं।  यही वह चीज है जो ‘चोटी का प्रदर्शन’ और ‘कमजोर प्रदर्शन’ में एक बहुत बड़ा अंतर पैदा करती है।  यह अंतर सिर्फ सीमित विचार स्वरूप और असीमित विचार स्वरूप का है।

उस व्यक्ति की कोई सीमायेँ नहीं नहीं होतीं जो सीमाओं को स्वीकार नहीं करता।  यहाँ तक कि सत्तर साल के वृद्ध पुरुषों ने मैराथनों में दौड़ लगाई है और पर्वतों पर चढ़ाइयाँ की हैं।  हमेशा ध्यान रखें, असफल लोगों के सपने छोटे जबकि सफल लोगों के सपने हमेशा बड़े होते हैं।  महत्त्वपूर्ण है बड़ी सोच और बड़े सपने देखने का साहस।  इसीलिए आपने बहुत सारे सीमित विचार स्वरूप वाले सामान्य ऐसे लोगों को देखा होगा जिन्होंने २४ वर्ष की आयु में अपना छोटा सा व्यवसाय प्रारम्भ किया और ६४ साल की उम्र में उसी छोटे से व्यवसाय से ही अवकाश ग्रहण कर लिया।  उन्होने अपना पूरा जीवन उसी छोटे से व्यवसाय में बिता दिया और कभी भी उससे बड़ा करने के बारे में सोचा तक नहीं।  लेकिन, ऐसे असीमित विचार स्वरूप वाले ऐसे दूसरे लोग भी हैं जिनहोने छोटे से स्टोर से शुरुआत की और बहुत ही कम समय में अपना व्यवसाय बढ़ा कर स्टोर्स की पूरी श्रृंखला खोल ली और अपने व्यवसाय को विविध प्रकार के व्यवसायों में बादल दिया।  मैक डोनाल्ड और पिज्जा हट आदि बहुत सारे उदाहरण आपके समक्ष हैं।  वे सिर्फ इसलिए बढ़ पाये क्योंकि उन्होने बड़ा सोचने और बड़े सपने देखने का साहस किया।

यदि आपके सपने और आपका लक्ष्य वास्तव में बड़े और आकाश की तरह ऊंचे हैं, तो आपके प्रयास भी निश्चित तौर पर ऊंचे ही होंगे।  यदि अपने लक्ष्य निर्धारण ही छोटा किया है, इतना छोटा जितना कि आपके घर की छत है, तो यह निश्चित है कि आप उस स्तर से थोड़ा सा नीचे तक ही पहुँच पाएंगे।

प्रत्येक सफलता और उपलब्धि के लिए स्वयं की प्राप्त करने की क्षमता पर सीमाओं का अधिरोपण ही सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है।  वैज्ञानिकों के प्रयोगों के अनुसार, एक व्यक्ति के मसतिष्क में रोज औसतन ६०,००० विचार आते हैं।  अधिक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि उनमें से लगभग ९५% विचार वही होते हैं जो आपके भीतर एक दिन पहले भी थे।  इस तरह से हर व्यक्ति एक सीमित विचार स्वरूप को विकसित करता है और इसी सीमित विचार स्वरूप के ढांचे में जीवन जीने की ओर अग्रसर हो जाता है।

कभी-कभी आपको हैरानी होती होगी कि आपकी आय सीमित क्यों है।  आपकी वर्तमान आय सीमित इसलिए है क्योंकि अपने अपने आप को इसी आय को अर्जित करने के लिए सीमित कर लिया है।  आप बहुत आसानी से इसका ५, १०, या २० गुणा कमा सकते थे यदि आपने अपने सीमित विचारों से, जो कि आज भी कायम है, अपने आप को बांध नहीं रखा होता।  निश्चित रूप से, नहीं, आप ऐसे लोगों को अवश्य जानते होंगे जो आपसे अधिक कमाते हैं, जबकि वे आप जैसी शिक्षा, गुण और बुद्धिमत्ता के स्वामी नहीं हैं।   इसीलिए, सीमित विचार स्वरूप को असीमित विचार स्वरूप की आदत से अवश्य बदल दिया जाना चाहिये।

‘अनस्टोपेबल’ नामक पुस्तक जिसमें कि स्यंथिक केरसे ने जॉर्ज डांटजिग की जो कहानी कहानी लिखी है वह हृदय को छू लेने वाली और याद रखने के योग्य है।   कॉलेज के एक क्षात्र की भांति जॉर्ज बहुत कठिन परिश्रम करते थे और रातों में देर तक जागते थे और एक दिन उन्होने इतनी देर तक पढ़ाई की कि वे अतिनिद्रा में चले गये और अगले दिन कक्षा में २० मिनट देर से पहुंचे।  जब वे कक्षा में पहुंचे तो उन्होने बोर्ड पर दो गणितीय सवाल लिखे देखे और उन्हें प्रोफेसर द्वारा दिया गया गृहकार्य समझकर अपनी नोटबुक में लिख लिया।  घर वापस पहुँचकर उन्होने उन सवालों को हल करने की कोशिश की।  वे बहुत कठिन सवाल थे जिसे उन्हें हल करने में कई घंटे लग गये।  लेकिन आखिरकार वे उन सवालों को हल करने में अगले दिन प्रोफेसर के पास जमा करने में सफल रहे।  चूंकि जॉर्ज पिछली क्लास में देर से पहुंचे थे इसलिए उन्हें यह नहीं पता था की वे दोनों सवाल असल में दो ऐसी गणितीय पहेलियाँ थीं जिनका हल खुद आइंस्टीन भी नहीं ढूंढ पाये थे।  लेकिन जॉर्ज जिन्होने प्रोफेसर की इस बात को नहीं सुना था वे इस सवाल को हल कर पाये, सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होने इस कार्य को बिना किसी सीमा के बारे में सोचे हुए पूरे उत्साह के साथ प्रारम्भ किया था।  यह सत्य है कि हम सब के भीतर बहुत अधिक ऊर्जा भरी हुई है।  हमें आवश्यकता है बस उस ऊर्जा का विस्फोट कराने की, जो सभव है बड़ा सोचने और और अपने समक्ष बड़ी चुनौतियाँ रखकर।  जैसे ही हम अपने सामने बड़ी चुनौती रखते हैं वैसे ही उस चुनौती को हल करने के लिए हमारी गुप्त ऊर्जा विमुक्त होने लगती है।  जितनी बड़ी चुनौती होगी उतना ही बड़ा ऊर्जा का विस्फोट होगा।  उदाहरणतया, यदि कोई आपको अपनी पूरी गति से ५०० मीटर दौड़ने के लिए कहे तो आप सिर्फ उतनी ही गति से दौड़ेंगे जितनी आपकी शारीरिक शक्ति है।  लेकिन यदि आपको किसी दूसरे व्यक्ति के साथ प्रतियोगिता करनी हो और यदि जीतने वाले को ५०,००० का नकद और एक स्वर्ण पदक का इनाम मिलना हो तो आप निश्चित तौर पर और तेज दौड़ेंगे क्योंकि आपके सामने चुनौती अब पहले से और बड़ी है।  अब आप एक ऐसी कल्पना कीजिये जिसमें एक गुंडा आपको मार डालने के लिए कटार लेकर आपके पीछे खड़ा है।  तो आप किसी की आज्ञा की प्रतीक्षा नहीं करेंगे बल्कि किसी ओलिम्पिक धावक से भी तेज दौड़ेंगे।  यह कैसे संभव हुआ?  इसलिए, क्योंकि आपके सामने जीवन और मृत्यु की बड़ी चुनौती थी जिससे निबटने के लिए आपके भीतर मौजूद पूरी ऊर्जा का विस्फोट हुआ।

 

ब. सकारात्मक सोच  

यह अनुभव किया गया है कि किसी भी व्यवसाय में पूंजी और मशीनों से अधिक मानव धन मूल्यवान है।  अध्ययनों से यह सिद्ध हुआ है कि यदि किसी संस्थान में लोगों की मानसिकता यदि सकारात्मक है तो वे संस्था की उन्नति में सबसे अच्छे भागीदार सिद्ध होंगे।  हारवर्ड विश्वविद्यालय द्वारा एक शोध में पता चला है कि ८५% मामलों में व्यक्ति सिर्फ अपनी मानसिकता की वजह से नौकरी पाता है और सिर्फ १५% मामलों में नौकरी या पदोन्नति अपनी बुद्धिमत्ता, योग्यता और ज्ञान की वजह से पता है।  यह सकारात्मक है या नकारात्मक?  यह ब्रह्मांड आपका मित्र है और आपको भावनाओं और अनुभवों की मदद से रास्ता दिखाता है।  सकारात्मक अनुभूति का मतलब है कि आप किसी अच्छी तरफ जा रहे हैं।  नकारात्मक अनुभूति का मतलब है कि आप किसी गलत दिशा में जा रहे हैं जो कि तुरंत बदल दी जानी चाहिए।  इसलिए, आपकी भावनाएं आपकी आत्मा का पथ प्रदर्शक है।  उनकी तरफ ध्यान दीजिये और अपने नकारात्मक विचारों को तुरंत बदलने का प्रयास कीजिये।

अब, सकारात्मक मानसिकता को बढ़ाएँ कैसे?  इसे जानते सभी हैं परंतु बहुत कम लोग सकारात्मक मानसिकता को प्राप्त करने के लिए प्रयास करते हैं।  यह विश्वास करना अच्छा लगता है कि हमारे मस्तिष्क में जो भी विचार आता है उसपर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है, और उतना ही कठिन होता जाता है नकारात्मक विचारों से बचना।  यहाँ एक युवक की कहानी बताना प्रासंगिक होगा जिसके जीवन में बहुत सारी कठिनाईयां थी,  वह एक आध्यात्मिक गुरु के पास ऐसा कोई मंत्र जानने गया जो उसकी सारी समस्याओं को हल कर दे।  गुरु ने बताया कि ऐसा कोई मंत्र नहीं है लेकिन उस युवक के लगातार जिद करने पर उन्होने उसे एक मंत्र दिया जिसका आधी रात के बाद पाँच बार जप करना था।  लेकिन उन्होने कहा कि ध्यान रखना मंत्र जाप के समय बंदर के बारे में बिलकुल मत सोचना।  युवक खुशी से अभिभूत था, उसने सोचा यह तो बहुत आसान है वह किसी बंदर के बारे में कभी नहीं सोचेगा।  लेकिन वह अपने मस्तिष्क से बंदर का विचार निकाल ही नहीं पाया, यहाँ तक कि उस ५ मिनट भी जब वह मंत्र का जाप कर रहा था।

लेकिन इन विचारों को मन से निकाल फेंकने का एक वैज्ञानिक तरीका भी है।  तरीका है उस नापसंद विचार को किसी ऐसे विचार से बदल देना जो आपको प्रेरणा देता हो एवं आपको ऊर्जा देता हो और यह आपके सपनों को आशा और उत्साह से भर देगा।  यह सदियों पुराना सिद्धान्त आधारित है पश्चिम के उस तथ्य पर जिसके अनुसार किसी भी एक निश्चित समय पर मस्तिष्क केवल एक विचार ही धरण कर सकता है।  यह आप के ऊपर है कि आप प्रीतिकर विचार धारण करते हैं या अप्रीतिकर विचार।

उदाहरणतया, अगर कोई आप से कहता है, “केलों के बारे में मत सोचना,” आपकी चेतना के ठीक मध्य में तुरंत ही केले का चित्र उभरेगा।  लेकिन यदि आप केले के बारे में नहीं सोचना चाहते हैं तो वैलेंटाइन हृदय के विषय में सोचिए तो आप तुरंत ही स्वतः इसकी सुंदरता की कल्पना करने एवं प्रेम की भावना का अनुभव करने लेगेंगे और केला आपके मस्तिष्क से निकल जाएगा।  इसको कहते हैं निर्गम तकनीक (क्राउडिंग आउट टैक्नीक)।

थोड़े से समय और अभ्यास से, नकारात्मक विचार सकारात्मक विचारों के बीच थोड़े और विरल ही रह जाएंगे क्योंकि प्रकृति का महान नियम कहता है कि सकारात्मकता सदैव नकारात्मकता से श्रेष्ठ होती है।

दूसरा, ‘पाँच मिनट से अधिक कभी नहीं तकनीक’ का १० दिन का अभ्यास और प्रयोग।  इस तकनीक के अनुसार, सिर्फ १० दिनों तक प्रतिदिन कम से कम पाँच मिनट तक अपने नकारात्मक विचारों को सकारात्मक विचारों से बदलकर कोई नकारात्मक विचार अपने मन में न आने देने की एक मानसिक चुनौती अपने सामने रखें।  यदि कोई नकारात्मक विचार पाँच मिनट से अधिक आपके मस्तिष्क में रह जाता है तो आपको अगली सुबह तक प्रतीक्षा करनी चाहिए और और १० दिनों का यह अभ्यास पुनः प्रारम्भ करना चाहिए।  यहाँ लक्ष्य है किसी एक नकारात्मक विचार पर रुके न रहकर इस तकनीक का १० दिनों तक का लगातार प्रयोग।  इस तकनीक की शक्ति अद्भुत है।  यह नयी आदतों और स्तरों का निर्माण करेगा जो प्रतिदिन अधिक से अधिक विकास करने एवं जीवन का आनंद लेने में आपकी सहायता करेगा।

 

आपकी इच्छाओं की प्राप्ति के चार आवश्यक कदम:

 

कदम १ – इच्छा स्पष्ट रखें और यह पूर्ण होगी

यह जानना आवश्यक है कि आप विशेष रूप से क्या प्राप्त करना चाहते हैं इसलिए आपको अपनी मांगों में पूरी तरह स्पष्ट होना होगा।  डॉन मारकुईस (अमेरिकी व्यंगकार एवं पत्रकार) के अनुसार, हमारी एक ऐसी दुनिया है जहां लोग यह जानते ही नहीं कि वे चाहते क्या हैं लेकिन उसे पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं।  इसलिए, निश्चित स्पष्ट इच्छा और प्राप्त करने के लिए लक्ष्य का होना महत्त्वपूर्ण है।

यह सर्वथा उचित होगा कि आप बैठ जायें और जो आप प्राप्त करना चाहते हैं उसी ठीक वैसा ही लिखें।  यदि आप अपनी इच्छा के प्रति स्पष्ट और निश्चित नहीं हैं तो अस्तित्व की शक्तियाँ आपको वह उपलब्ध नहीं करवा पाएँगी।  यदि आप मिश्रित फ्रिक्वेन्सी भेजेंगे तो आपको परिणाम भी मिश्रित ही प्राप्त होंगे।

अब, शायद, जीवन में पहली बार आप यह जानने और लिखने जा रहे हैं कि आप चाहते क्या हैं, आपकी इच्छाएं क्या हैं।  विश्वास रखें, आप हर वह चीज प्राप्त कर सकते हैं जो आप चाहते हैं, वह बन सकते हैं या हर वह काम कर सकते हैं जो आप चाहते हैं।  आपको बस विशेष और स्पष्ट रूप से चुनना है।  यदि आपकी मांग स्पष्ट और आपकी इच्छाओं के केन्द्रित है, तो अपने अस्तित्व से मांगने की तरफ आपने पहला कदम बढ़ा दिया है।

 

कदम २ – अपनी मांगों में श्रद्धा  

श्रद्धा मस्तिष्क का प्रधान रसायनज्ञ है।  आपके विचार जब किसी विशेष चीज की तरफ निर्देशित हों तो ब्रह्मांडीय ऊर्जा की शक्तियाँ वह वस्तु आपकी ओर ले आएंगी।    लेकिन इसका विपरीत भी हो सकता है।  यदि आप चिंता करेंगे और कुछ प्राप्त करने में व्याकुलता अनुभव करेंगे या दूसरे शब्दों में, यदि आप जो चाहते हैं उसके न होने का विचार प्रबल है, तो परिणाम स्वरूप यह उसको आपसे दूर करने का प्रभाव उत्पन्न करेगा।  यदि आप सोचते हैं कि आप उस वस्तु को अब तक प्राप्त नहीं कर पाये हैं, तो आप उसे ‘न प्राप्त करने’ को आकर्षित कर रहे हैं।

इसीलिए ‘श्रद्धा’ का इतना महत्त्व है, यदि आपको विश्वास नहीं है कि आप कुछ प्राप्त कर सकते हैं, तो ब्रह्मांड का आकर्षण का नियम वह वस्तु आपकी तरफ कभी आकर्षित नहीं कर पाएगा।

इसीलिए, किसी ने सत्य ही कहा है, “जो व्यक्ति मैं बनना चाहता हूँ, यदि मुझे विश्वास है कि मैं बन सकता हूँ, मैं बन जाऊंगा”।

इसका मतलब सिर्फ इतना है कि आपको इसका पूर्ण विश्वास होना चाहिये कि अपरिहार्य भी संभव है, तो जो आप चाहते है वह अवश्य होगा। आपकी इच्छाओं की पूर्ति होगी यह सुनिश्चित करने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है।  जिस क्षण आपकी कुछ प्राप्त करने का विचार आए उस समय आपको अस्तित्व की शक्तियों पर  विश्वास होना चाहिए जैसे कि वह आपको उसी क्षण प्राप्त हो गया है।  दृढ़ निष्ठा रखें कि जिस भी वस्तु की आपने इच्छा की है या मांग रखी है, वह देर सवेर वास्तविकता में प्रकट होगी ही।  यह ठीक उसी तरह है जैसे कि आप किसी कॉफी-शॉप में जाते हैं, एक कप कॉफी का आदेश देते हैं और यह मान लेते हैं कि कॉफी आपको निरपवाद रूप से मिल ही जाएगी और आपके हुक्म की तामील की जाती है।  जब आप छुट्टियों की यात्रा की, नई कार की, नये घर की बुकिंग करने जाते हैं तो आप बिना संकोच विश्वास कर लेते हैं की जो चीज अपने बुक की है वह आपकी हो ही जाएगी और इसीलिए आप उसकी दुबारा बुकिंग नहीं करवाते हैं। आप, लॉटरी जीतने पर, वसीयत में संपत्ति और धन प्राप्त होने पर कोई संदेह नहीं करते हैं और उनकी वास्तविक प्राप्ति के पहले से ही उनको अपना मानना प्रारम्भ कर देते हैं।  यह किसी वस्तु की आपकी होने के विश्वास की भावना है।

जो आप चाहते हैं, मांगते हैं या जिसकी आपको इच्छा है उसको पाने की तीव्र सकारात्मक उम्मीद ही श्रद्धा है।  उदाहरणतया, अपने अपने किसी मित्र को उधार दिया है और तीन महीनों से लौटाने के लिए कह रहे हैं।  आपको उधार दिया गया धन वापस मिलता नहीं लग रहा है,  आप तनाव महसूस करते हैं और क्रोधित हो जाते हैं।  आप निश्चित तौर पर पैसे को वापस पाना चाहते हैं लेकिन आप तनावग्रस्त और उस पर क्रोधित होते जा रहे हैं, यह दर्शाता है कि आपको पैसे वापस मिलने की उम्मीद नहीं है।  इसलिए, आप आकर्षण के नियम को अपने विरुद्ध कार्य करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

अब, कल्पना कीजिये कि अचानक आपका मित्र आपको फोन करता है और बताता है कि उधार की राशि का चेक उसने भेज दिया है और आपको चेक की एक प्रति और भेजने की रसीद आपको फ़ैक्स कर देता है।  अब आपकी मानसिकता बदली हुई होगी।  आपको दृढ़ विश्वास है कि उधार वापस किया जाएगा और आप चेक की उम्मीद करेंगे क्योंकि यह भेजा जा चुका है।

यदि आपको दृढ़ स्तर की उम्मीद और विश्वास है कि, आपने जो इच्छा की है वह पूरी की जाएगी, और आप निश्चिंत हो जाते हैं तो यह आकर्षण के नियम से आपके प्रति कार्य करवाएगा।  एक समय में अमेरिका के सबसे धनी व्यक्ति, स्व० सैम वाल्टन ने कहा था: “मैं जीतने की उम्मीद करता हूँ। मैं कठिन चुनौतियाँ स्वीकार करता हूँ और विजयी होने की योजना बनाता हूँ। मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि मैं हार सकता हूँ, यह सदा ऐसा ही रहा जैसे कि मुझे जीतने का अधिकार हो।  ऐसा सोचना ऐसा लगता है जैसे यह स्वतः पूरी होने वाली भविष्यवाणी हो”।

श्रद्धा एक अत्यधिक शक्तिशाली उपकरण है।  चिकित्सा विज्ञान सदा “प्लेसेबो इफैक्ट” को मानता आया है।  इसका अर्थ है की यदि आप किसी रोगी को एक प्लेसेबो – एक झूठी दवा – दें कि यह दवा असली है और यह उसका दर्द, खांसी या सर्दी जुकाम को ठीक कर देगी, अधिकतर मामलों में मरीज उस दवा को असली मानने भर से ही ठीक हो जाता है।

लेकिन सबसे आश्चर्यजनक अनुभव अमेरिकी सर्जन जे० ब्रूस मोसेली को १९९४ की गर्मियों में हुआ जब उन्होने प्लेसेबो का प्रयोग किया और पाया कि यह उन गंभीर में भी कार्य करता है जिनमे शल्य-चिकित्सा(सर्जरी) तक करी पड़ी थी।

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