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Category Archives: प्रेम

प्रेम

जब आपको परिवार में प्रेम नहीं मिलता है, तो आप उसे बहार खोजते हो। उस प्रेम को पाने की ललक ही आपको दूसरे परिवारों की ओर झाँकने को विवश करती है। इसके परिणामस्वरुप समाज में व्यभिचार, तरह-तरह की कुरीतियाँ पैदा हो जाती हैं। यह जो कुछ भी हमारे समाज में पैदा हो रहा है उसके लिये जिम्मेदार हैं – हम और हमारा परिवार क्योंकि हमारे परिवारों में प्रेम नहीं है। तो उसकी तृप्ति के लिये पीछे के रास्ते से दूसरे द्वार निर्मित होते हैं। इसीलिए समाज ने अपने स्वार्थ के लिये घोषित कर दिया कि तुम वेश्या का काम करो। जो अतृप्त आये तुम्हारे पास उसे तुम स्वीकार करो। मनु से लेकर उनके बाद के नीतिकारों ने वेश्या की संस्था को जिन्दा रखा। लेकिन इस व्यवस्था को बनाते समय यह ध्यान नहीं दिया गया कि क्यों न प्रेम के अंकुर को ही परिवारों में उगाया जाए। इसीलिए मैं जिस आध्यात्म की बात करना चाहता हूँ, वह इतना ही है कि आपके परिवार में, आपके ह्रदय में प्रेम के फूल खिलें और आपके चेहरे पर मुस्कान बिखरे।

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प्रेम और प्रार्थना

जब आप प्रेम करोगे तो अद्भुत शांति आपके चित्त में व्याप्त होने लगेगी। बिना प्रेम के चित्त में शांति नहीं आ सकती है, बिना शांति के जीवन तनावमुक्त नहीं हो सकता है, और तनाव मुक्त हुए बिना कोई पूजा प्रार्थना संभव ही नहीं हो सकती है। …

अपनी अंतरात्मा से निकले शब्द ही ईश्वर के प्रति असली प्रार्थना है। …

प्रार्थना जीवन का विज्ञान है, और उस विज्ञान को प्राप्त करने के लिये कला चाहिए। …

प्रार्थना सीखी नहीं जाती, प्रार्थनाएं सीखने की कोई आवश्यकता नहीं है। प्रार्थना तो आप अपने आप सीख जाते हो वैसे ही जैसे प्रेम सिखाया नहीं जाता है, आप प्रेम करना अपने आप सीख जाते हो। वैसे ही आप प्रार्थना सीख जाओगे। …