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Category Archives: प्रवचन

असीमित सफलता प्राप्ति के लिये आकर्षण के नियम का उपयोग

प्रत्येक सफलता और उपलब्धि के लिए स्वयं की प्राप्त करने की क्षमता पर सीमाओं का अधिरोपण ही सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है।  वैज्ञानिकों के प्रयोगों के अनुसार, एक व्यक्ति के मसतिष्क में रोज औसतन ६०,००० विचार आते हैं।  अधिक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि उनमें से लगभग ९५% विचार वही होते हैं जो आपके भीतर एक दिन पहले भी थे।  इस तरह से हर व्यक्ति एक सीमित विचार स्वरूप को विकसित करता है और इसी सीमित विचार स्वरूप के ढांचे में जीवन जीने की ओर अग्रसर हो जाता है।

कभी-कभी आपको हैरानी होती होगी कि आपकी आय सीमित क्यों है।  आपकी वर्तमान आय सीमित इसलिए है क्योंकि अपने अपने आप को इसी आय को अर्जित करने के लिए सीमित कर लिया है।  आप बहुत आसानी से इसका ५, १०, या २० गुणा कमा सकते थे यदि आपने अपने सीमित विचारों से, जो कि आज भी कायम है, अपने आप को बांध नहीं रखा होता।  निश्चित रूप से, नहीं, आप ऐसे लोगों को अवश्य जानते होंगे जो आपसे अधिक कमाते हैं, जबकि वे आप जैसी शिक्षा, गुण और बुद्धिमत्ता के स्वामी नहीं हैं।   इसीलिए, सीमित विचार स्वरूप को असीमित विचार स्वरूप की आदत से अवश्य बदल दिया जाना चाहिये।

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आकर्षण का नियम 2

हर विचार एक कारण है और हर कार्य या उत्पन्न परिस्थिति उसका परिणाम मात्र है। इस विश्व में विचार ही सबसे महत्त्वपूर्ण, रहस्यपूर्ण और अदृश्य, जीवित मौजूद शक्ति है। विचार बिलकुल जीवित वस्तुओं की तरह हैं। बाहरी सफलता भीतर की सफलता से ही प्रारम्भ होती है और यदि वास्तव में गंभीरतापूर्वक अपने वाह्य जीवन की गुणवत्ता को सुधारना चाहते है, तो आपको पहले अपने आंतरिक जीवन को सुधारना होगा। मस्तिष्क में छुपी हुई असीमित क्षमताओं को खोजना सीखने और इसके प्रभावी प्रयोग से, जो आप बनना चाहते हैं वह बनने और जीवन में असाधारण सफलता प्राप्त करने से महत्त्वपूर्ण कुछ भी नहीं है।
आकर्षण का नियम, ब्रह्माण्ड का प्रकृतिक नियम है। इसके अनुसार, “लाइक अट्रैक्ट्स लाइक” यानि जब आप किसी विशेष विचार पर ध्यान केन्द्रित करते हैं तो आप उसी तरह के अन्य दूसरे विचारों को अपनी ओर आकर्षित करना प्रारम्भ कर लेते हैं। विचारों में चुम्बकीय शक्ति है और वे अपनी विशेष आवृत्ति (फ्रिक्वेन्सी) पर काम करते हैं। अतएव, वे उस फ्रिक्वेन्सी पर कार्य कर रहे अन्य सभी समान विचारों आकर्षित करना और आपको सर्वथा प्रभावित करना प्रारम्भ कर देते हैं। आप ब्रह्माण्ड के सबसे शक्तिशाली संचरण मीनार (ट्रांसमिसन टावर) हैं। यह आप पर निर्भर करता है कि आप नियति को क्या संदेश देना और उससे क्या प्राप्त करना चाहते हैं।

परमात्मा-कौन, कहाँ?

एक वृक्ष अपने लिए नहीं जिया करता है, वह दूसरों के लिए जीता है।  वह अपनी छाया से भी लाभ देता है।  वह अपनी गहन छाया में सबको बैठाता है, उसके पत्तों और फल से भी लाभ होता है। जीना उसी आदमी का श्रेष्ठ है, जो दूसरों के लिए जीये, अपने लिये जिया तो क्या जिया।

वह धर्म क्या है जिसमें खुशी न हो।  वह धर्म क्या जिसमें आनंद न हो, वो धर्म क्या है जिसमें आत्मा प्रफुल्लित होकर रोम रोम न खड़े हो जायें।  वह मायूस धर्म किस काम का है, जिससे चेहरे पर उदासी बनी रहे और रात-दिन चिंता बनी रहे।  धर्म वही है जो आनंदित हो, प्रफुल्लित हो, खुशी देता हो।

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समझ ही समाधान है

आज सारा संसार एक गाँव की तरह हो गया है आज यहाँ बात करो सारी दुनिया में पहुँचती है।  आज आपके पास अणु शस्त्र है अगर आप मिटकर रहोगे, विभाजित रहोगे तो लड़ोगे और लड़ोगे तो निश्चित रूप से युद्ध संभव होगा।  अब अगर युद्ध होगा तो केवल एक देश नहीं मिटेगा, फिर सारी दुनिया मिट जायेगी; इसलिए मैं कहता हूँ कि अब तीसरा विश्व युद्ध असंभव हो गया है तीसरा विश्व युद्ध हो ही नहीं सकता।  अब सिर्फ आतंकवाद ही पनपेगा, बढेगा।  अगर इसको जड़ से मिटाने की कोशिश नहीं की गयी तो पहले समझ पैदा करनी है, जगह-जगह अभियान छेड़ने हैं।  समझ पैदा करने का अभियान सारी सरकारों को मनुष्यता में फैलाना होगा कि हम देशों में राष्ट्रों को अलग-अलग बांटकर नहीं रह सकते, अब हमें एक पृथ्वी, एक देश, एक मनुष्यता की बात सोचनी होगी।  अब हमें लड़ने की बात नहीं सोचनी।  जब अलग-अलग देश कि बात सोचेंगे तो मिट जायेंगे।  मनुष्यता ही मिट जायेगी और दूसरी बात मैं कहना चाहता हूँ कि अब वक्त आ गया है सारी दुनिया को सामूहिक निर्णय लेना पड़ेगा कि हम आतंकवाद के खिलाफ हैं और आतंकवाद के खिलाफ रहेंगे और सारी दुनिया को ये संकल्प लेने की जरूरत है कि आतंकवाद किसी भी धरती पर पैदा होगा तो आतंकवादी गतिविधियों को हम प्रोत्साहन नहीं देंगे।  हम सफाया करेंगे उनका, हम मिटायेंगे उनको; हर देश, हर राष्ट्र सबको सामूहिक रूप से संकल्प लेना पड़ेगा।  यह समझ पैदा करनी है कि वो आतंकवादी गतिविधि चाहे जिस देश के खिलाफ हो यदि हमारी धरती पर उसका प्रशिक्षण दिया जा रहा है, उसकी गतिविधियाँ चलायी जा रही हैं तो हम उसको ख़त्म करेंगे वो आतंकवाद भले ही हमारे दुश्मन देश के खिलाफ क्यों न हो ये समझ पैदा करनी है।  इसका आन्दोलन चलाना पड़ेगा, क्यों?  क्योंकि आदमी यदि समझदार होगा तो अपने आप आतंकवादी गतिविधियों को हतोत्साहित करेगा, मिटायेगा, नष्ट करेगा।  समझदार आदमी होगा तो वो समझेगा कि आतंकवाद का जिसने जहाँ भी प्रशिक्षण लिया या पोषण दिया आतंकवाद ने उसी को डस लिया, उसी को खा लिया है सारा इतिहास इस बात का साक्षी है कि अमेरिका और यूरोपियन देश जगह-जगह पर आतंकवाद को परिष्कृत कर रहे थे लेकिन ११ सितम्बर २००० कि घटना जो अमेरिका में घटी उसने अमेरिका और यूरोप की आँख खोल दी जिन सांपो को उन्होंने पाला-पोसा था उन्होंने उन्हें ही डस लिया, उनको ही डसने लगे।  अगर वे समझे कि आतंकवाद को अगर हम प्रोत्साहन देते हैं तो आतंकवाद एक दिन निश्चित रूप से हमें ही डस लेगा।  ये समझ पैदा करने की जरूरत है और मैं कहता हूँ कि धर्म और कुछ नहीं है सिर्फ समझ की क्रांति है अगर तुम्हारे भीतर समझ आ जाये, अगर मनुष्य के भीतर समझ आ जाये तो उसकी समस्याओं का समाधान निश्चित है – समझ ही समाधान है।  समझ के अतिरिक्त कोई समाधान नहीं है।  कोई भी चीज पाने के लिए डिज़ायर होनी चाहिए, बर्निंग डिज़ायर होनी चाहिए वैसे ही आतंकवाद को मिटाने की एक बर्निंग डिज़ायर होनी चाहिए।  मनुष्य के दिल में मनुष्य के ह्रदय में वो डिज़ायर सद्गुरु पैदा करेगा।  हम आवाज देंगे, पुकारेंगे, मेरा दावा है अगर मेरे भीतर बर्निंग डिज़ायर है कि मैं आवाज दे-दे कर दुनिया से आतंकवाद को ख़त्म कर दूंगा तो आतंकवाद मिट कर रहेगा। आतंकवाद पनप नहीं सकता है समझ पैदा होगी तो क्योंकि मनुष्य अब इतना नासमझ नहीं रह गया कि अपने पैर पर खुद कुल्हाड़ी मारेगा और मैं यही कहना चाहता हूँ कि पाकिस्तान जैसे देश भी जो आतंकवादी गतिविधियों को प्रोत्साहन देते हैं यह समझदारी बहुत जल्दी पैदा करनी पड़ेगी  कि अगर  उन्होंने इसको प्रोत्साहन देना बंद नहीं किया तो ये आतंकवादी ही पाकिस्तान के आत्मघात का कारण बन जायेंगे।  पाकिस्तान को ये खुद ही मिटा देंगे किसी दुसरे को मिटाने कि जरूरत नहीं है ये साक्षात् इतिहास प्रमाण है इस बात का।

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भावनाएं और आकर्षण की शक्ति

भावनाएं आपकी आकर्षण की शक्ति को बढ़ाने में मदद करती हैं। अपने आपको इच्छित वस्तु प्राप्त करते हुए विजुवलाइज़ करते समय उस आनंद, प्रसन्नता और उत्साह को अनुभव कीजिये, जो आप आप उसे वास्तविकता में पाकर करते। जितनी शक्तिशाली आपकी भावनाएं होंगी उतनी ही शीघ्रता से आप अपने उन विचारों को वास्तविकता में बदल सकेंगे जिन्हें आप ब्रह्माण्ड से प्राप्त करना चाहते हैं। इसके लिए, उस वस्तु की वर्तमान में उपलब्धता को महसूस करने का अभ्यास करना होगा। अपने सपनों के घर के मालिक होने का और उसका आनंद लेने की कल्पना अभी तुरंत कीजिये, भविष्य में नहीं।

अपनी रचनात्मक कल्पना के भीतर की भावना को बढ़ाने का एक और उपाय है, आप जो प्राप्त करना चाहते हैं उसे प्राप्त करने के बाद दूसरों को भी जैसे पति/पत्नी, बच्चे, समाज और मित्र; को भी लाभान्वित होते हुए देखना। जितने अधिक लोग होंगे उतना ही अच्छा होगा। दूसरों के चेहरों पर मुस्कान विजुवलाइज़ करना और ज़्यादा सकारात्मक भावना को ले आता है। यह प्राप्ति की प्रक्रिया को और अधिक सुगम और तीव्र करता है।

इच्छा स्पष्ट रखें और यह पूर्ण होगी

यह जानना आवश्यक है कि आप विशेष रूप से प्राप्त क्या करना चाहते हैं इसलिए आपको अपनी मांगों में पूरी तरह स्पष्ट होना होगा।  डॉन मारकुईस (अमेरिकी व्यंगकार एवं पत्रकार) के अनुसार, हमारी एक ऐसी दुनिया है जहां लोग यह जानते ही नहीं कि वे चाहते क्या हैं लेकिन उसे पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं।  इसलिए, निश्चित स्पष्ट इच्छा और प्राप्त करने के लिए लक्ष्य का होना महत्त्वपूर्ण है।

यह सर्वथा उचित होगा कि आप बैठ जायें और आप जो प्राप्त करना चाहते हैं उसी ठीक वैसा ही लिखें।  यदि आप अपनी इच्छा के प्रति स्पष्ट और निश्चित नहीं हैं तो अस्तित्व की शक्तियाँ आपको वह उपलब्ध नहीं करवा पाएँगी।  यदि आप मिश्रित फ्रिक्वेन्सी भेजेंगे तो आपको परिणाम भी मिश्रित ही प्राप्त होंगे।

अब, शायद, जीवन में पहली बार आप यह जानने और लिखने जा रहे हैं कि आप चाहते क्या हैं, आपकी इच्छाएं क्या हैं।  विश्वास रखें, आप हर वह चीज प्राप्त कर सकते हैं जो आप चाहते हैं, वह बन सकते हैं या हर वह काम कर सकते हैं जो आप चाहते हैं।  आपको बस विशेष और स्पष्ट रूप से चुनना है।  यदि आपकी मांग स्पष्ट और आपकी इच्छाओं के केन्द्रित है, तो अपने अस्तित्व से मांगने की तरफ आपने पहला कदम बढ़ा दिया है।

उस व्यक्ति की कोई सीमाएं नहीं होतीं जो सीमाओं को स्वीकार नहीं करता।  यहाँ तक कि सत्तर साल के वृद्ध पुरुषों ने मैराथनों में दौड़ लगाई है और पर्वतों पर चढ़ाइयाँ की हैं।  हमेशा ध्यान रखें, असफल लोगों के सपने छोटे जबकि सफल लोगों के सपने हमेशा बड़े होते हैं।  महत्त्वपूर्ण है बड़ी सोच और बड़े सपने देखने का साहस।  इसीलिए आपने बहुत सारे सीमित विचार स्वरूप वाले सामान्य ऐसे लोगों को देखा होगा जिन्होंने २४ वर्ष की आयु में अपना छोटा सा व्यवसाय प्रारम्भ किया और ६४ साल की उम्र में उसी छोटे से व्यवसाय से ही अवकाश ग्रहण कर लिया।  उन्होने अपना पूरा जीवन उसी छोटे से व्यवसाय में बिता दिया और कभी भी उससे बड़ा करने के बारे में सोचा तक नहीं।  लेकिन, असीमित विचार स्वरूप वाले ऐसे दूसरे लोग भी हैं जिन्होने  छोटे से स्टोर से शुरुआत की और बहुत ही कम समय में अपना व्यवसाय बढ़ा कर स्टोर्स की पूरी श्रृंखला खोल ली और अपने व्यवसाय को विविध प्रकार के व्यवसायों में बदल दिया।  मैक डोनाल्ड और पिज्जा हट आदि बहुत सारे उदाहरण आपके समक्ष हैं।  वे सिर्फ इसलिए बढ़ पाये क्योंकि उन्होने बड़ा सोचने और बड़े सपने देखने का साहस किया।

यदि आपके सपने और आपका लक्ष्य वास्तव में बड़े और आकाश की तरह ऊंचे हैं, तो आपके प्रयास भी निश्चित तौर पर ऊंचे ही होंगे।  यदि आपने लक्ष्य निर्धारण ही छोटा किया है, इतना छोटा जितना कि आपके घर की छत है, तो यह निश्चित है कि आप उस स्तर से थोड़ा सा नीचे तक ही पहुँच पाएंगे।

सौजन्य: यू कैन टॉप पुस्तक

प्रेम प्रकृति प्रदत्त दान है

आपने कभी सोचने की चेष्ठा की कि परमात्मा के दिये हुए इस अद्भुत व बहुमूल्य जीवन को आपने नरक कैसे बना लिया है?  क्यों बना लिया है?  इसका बुनियादी कारण क्या है? अगर मनुष्य को परमात्मा के निकट लाना है, तो आप परमात्मा की बात करना बंद कर दो।  केवल मनुष्य को प्रेम के निकट लाइये। आपने जीवन में प्रेम का भाव भरिये।  अगर आपके जीवन में प्रेम की तरंगों का आगमन हो जाता है, तो परमात्मा नाचता हुआ आपके आँगन में प्रकट हो सकता है।

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प्रेम मांगो नहीं लुटाओ

जो प्रेम की मांग करता है, आज तक उसने इस दुनिया में प्रेम नहीं पाया है।  प्रेम पाने का एक ही उपाय है – प्रेम लुटाओ।  आप किसी दूसरे व्यक्ति की आँखों में प्रेम की भावना से झांकोगे, तो दूसरी ओर से घृणा नहीं, प्रेम की सरिता बहेगी।  अगर आप ह्रदय की गहराई से किसी का हाथ पकड़ोगे तो दूसरे के हाथ से भी प्रेम की ऊष्मा आएगी जिसका आपके हाथों के द्वारा अनुभव भी होगा।  लेकिन आपके प्रेम में कांटे ही कांटे हैं, फूल नहीं।  क्योंकि अपने अहंकार का विसर्जन नहीं किया है।  फिर भी मैं कहता हूँ कि यदि प्रेम में कांटे भी हों, तो प्रेम गुलाब के फूल जैसा है। काँटों में ही फूलों का मजा होता है।  जब प्रेम का भाव जागता है तो आप थोड़ा शुभ की ओर कदम बढ़ाते हो, थोड़ा सौन्दर्य कि ओर कदम बढ़ाते हो, थोड़ा सजते हो, श्रृंगार करते हो और आपके भीतर भी थोड़ी दिव्यता का भाव आने लगता है।

वर्तमान में जीवन जीने का विज्ञान

इस संसार में बहुत कुछ है जो तुम्हें भी उलझाये रहता है। वही आने वाला कल और वही बीता हुआ कल।  भूतकाल और भविष्यकाल। पूरा संसार मानो बाजार है जिसमें तुम उलझे पड़े हो।  अगर तुम्हें साक्षी की तरह जीना आ जाये, घटनाओं को सिर्फ देखते हुए जीना आ जाये, तुम निर्णय मत दो, तुम उलझो नहीं, जो कुछ हो रहा है उसके दृष्टा बन जाओ, उसके साक्षी बन जाओ, तो साक्षी बनते ही तुम वर्तमान में जीने लगते हो और वर्तमान में जीना जैसे ही शुरू होता है वैसे ही भीतर का आनंद फूट पड़ता है।  भीतर आनंद के झरने फूट पड़ते हैं, ये साक्षी भाव की साधना है, इसी को हम कहते हैं ध्यान।  और संजीवनी क्रिया के माध्यम से, महामेधा क्रिया के माध्यम से हम आपको साक्षी की अवस्था में ले जाते हैं  और यह साधना – मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों के चक्कर काटने से नहीं अपने जीवन को साधने से होती है।  वर्तमान में रहने का अभ्यास करने से यह सिद्ध होता है।  तो पहला उपाय वर्तमान में जीने का साक्षी होकर जीना, दृष्टा होकर जीना, तटस्थ होकर जीना, चीजों को देखते रहना, ये समझना कि मैं कर्ता नहीं हूँ, मैं तो सिर्फ दृष्टा हूँ, जो कुछ भी हो रहा है मैं सिर्फ उसका देखने वाला हूँ करने वाला हूँ।  जब कर्ता भाव का विसर्जन हो जाता है, तब  आपके भीतर यह भाव भर जाता है कि सबकुछ तो इस अस्तित्व में हो रहा है, रोज-रोज कहता हूँ – रोटी खाते हो खून बन जाती है, गाय भूसा खाती है भूसा दूध बन जाता है।  इस संसार में जाड़ा-गर्मी-बरसात, दिन-रात, अंधकार-प्रकाश, सब-कुछ अपने हिसाब से आ रहा है – जा रहा है, आपकी कोई भूमिका नहीं है।  आपकी साँसें आ रही हैं, जा रही हैं, प्रकृति सन्देश दे रही है कि सबकुछ अस्तित्व में, अस्तित्व कि ऊर्जा से संचालित हो रहा है।  करोणों-अरबों ग्रह-नक्षत्र, सूर्य, चाँद, तारे इस ब्रम्हांड में अपनी धुरी पर घूम रहे हैं, कोई एक-दूसरे से टकराता नहीं है, एक नियम में यह अस्तित्व सबको नियंत्रित किये हुए है, सबको समाहित किये हुए है, सबकुछ स्वतः हो रहा है।  अगर तुम्हारे भीतर से यह भाव हट जाये कि तुम करने वाले हो तो जब तुम कर्ता नहीं रह जाते हो तो तुम साक्षी बन जाते हो।  तो हमेशा ये अभ्यास करो कि तुम कर्ता नहीं हो, साक्षी हो, दृष्टा हो।  खाना खा रहे हो तो उस समय देखो कि ये शरीर खाना खा रहा है।  तुम शरीर नहीं हो, शरीर को खाना खाते हुये देखना अपने शरीर के बाहर खड़े होकर, ये साक्षी का अभ्यास है।  तुम मुझे सुन रहे हो, अपने शरीर के बाहर खड़े हो जाओ और देखो कि गुरुदेव बोल रहे हैं और तुम्हारा शरीर सुन रहा है और तुम दोनों को देख रहे हो, गुरुदेव को भी देख रहे हो।  जो भी – जितने भी कृत्य तुम करते हो उन सारे कृत्यों के प्रति तुम साक्षी हो जाओ तो साक्षी होते-होते, साक्षी का अभ्यास करते-करते तुम वर्तमान में जीने लगोगे।  तुम्हारे भीतर समर्पण घटित होगा।