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गुरु पूर्णिमा महोत्सव

गुरु पूर्णिमा महोत्सव २०१४

गुरु पूर्णिमा महोत्सव २०१४

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भावनाएं और आकर्षण की शक्ति

भावनाएं आपकी आकर्षण की शक्ति को बढ़ाने में मदद करती हैं। अपने आपको इच्छित वस्तु प्राप्त करते हुए विजुवलाइज़ करते समय उस आनंद, प्रसन्नता और उत्साह को अनुभव कीजिये, जो आप आप उसे वास्तविकता में पाकर करते। जितनी शक्तिशाली आपकी भावनाएं होंगी उतनी ही शीघ्रता से आप अपने उन विचारों को वास्तविकता में बदल सकेंगे जिन्हें आप ब्रह्माण्ड से प्राप्त करना चाहते हैं। इसके लिए, उस वस्तु की वर्तमान में उपलब्धता को महसूस करने का अभ्यास करना होगा। अपने सपनों के घर के मालिक होने का और उसका आनंद लेने की कल्पना अभी तुरंत कीजिये, भविष्य में नहीं।

अपनी रचनात्मक कल्पना के भीतर की भावना को बढ़ाने का एक और उपाय है, आप जो प्राप्त करना चाहते हैं उसे प्राप्त करने के बाद दूसरों को भी जैसे पति/पत्नी, बच्चे, समाज और मित्र; को भी लाभान्वित होते हुए देखना। जितने अधिक लोग होंगे उतना ही अच्छा होगा। दूसरों के चेहरों पर मुस्कान विजुवलाइज़ करना और ज़्यादा सकारात्मक भावना को ले आता है। यह प्राप्ति की प्रक्रिया को और अधिक सुगम और तीव्र करता है।

इच्छा स्पष्ट रखें और यह पूर्ण होगी

यह जानना आवश्यक है कि आप विशेष रूप से प्राप्त क्या करना चाहते हैं इसलिए आपको अपनी मांगों में पूरी तरह स्पष्ट होना होगा।  डॉन मारकुईस (अमेरिकी व्यंगकार एवं पत्रकार) के अनुसार, हमारी एक ऐसी दुनिया है जहां लोग यह जानते ही नहीं कि वे चाहते क्या हैं लेकिन उसे पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं।  इसलिए, निश्चित स्पष्ट इच्छा और प्राप्त करने के लिए लक्ष्य का होना महत्त्वपूर्ण है।

यह सर्वथा उचित होगा कि आप बैठ जायें और आप जो प्राप्त करना चाहते हैं उसी ठीक वैसा ही लिखें।  यदि आप अपनी इच्छा के प्रति स्पष्ट और निश्चित नहीं हैं तो अस्तित्व की शक्तियाँ आपको वह उपलब्ध नहीं करवा पाएँगी।  यदि आप मिश्रित फ्रिक्वेन्सी भेजेंगे तो आपको परिणाम भी मिश्रित ही प्राप्त होंगे।

अब, शायद, जीवन में पहली बार आप यह जानने और लिखने जा रहे हैं कि आप चाहते क्या हैं, आपकी इच्छाएं क्या हैं।  विश्वास रखें, आप हर वह चीज प्राप्त कर सकते हैं जो आप चाहते हैं, वह बन सकते हैं या हर वह काम कर सकते हैं जो आप चाहते हैं।  आपको बस विशेष और स्पष्ट रूप से चुनना है।  यदि आपकी मांग स्पष्ट और आपकी इच्छाओं के केन्द्रित है, तो अपने अस्तित्व से मांगने की तरफ आपने पहला कदम बढ़ा दिया है।

उस व्यक्ति की कोई सीमाएं नहीं होतीं जो सीमाओं को स्वीकार नहीं करता।  यहाँ तक कि सत्तर साल के वृद्ध पुरुषों ने मैराथनों में दौड़ लगाई है और पर्वतों पर चढ़ाइयाँ की हैं।  हमेशा ध्यान रखें, असफल लोगों के सपने छोटे जबकि सफल लोगों के सपने हमेशा बड़े होते हैं।  महत्त्वपूर्ण है बड़ी सोच और बड़े सपने देखने का साहस।  इसीलिए आपने बहुत सारे सीमित विचार स्वरूप वाले सामान्य ऐसे लोगों को देखा होगा जिन्होंने २४ वर्ष की आयु में अपना छोटा सा व्यवसाय प्रारम्भ किया और ६४ साल की उम्र में उसी छोटे से व्यवसाय से ही अवकाश ग्रहण कर लिया।  उन्होने अपना पूरा जीवन उसी छोटे से व्यवसाय में बिता दिया और कभी भी उससे बड़ा करने के बारे में सोचा तक नहीं।  लेकिन, असीमित विचार स्वरूप वाले ऐसे दूसरे लोग भी हैं जिन्होने  छोटे से स्टोर से शुरुआत की और बहुत ही कम समय में अपना व्यवसाय बढ़ा कर स्टोर्स की पूरी श्रृंखला खोल ली और अपने व्यवसाय को विविध प्रकार के व्यवसायों में बदल दिया।  मैक डोनाल्ड और पिज्जा हट आदि बहुत सारे उदाहरण आपके समक्ष हैं।  वे सिर्फ इसलिए बढ़ पाये क्योंकि उन्होने बड़ा सोचने और बड़े सपने देखने का साहस किया।

यदि आपके सपने और आपका लक्ष्य वास्तव में बड़े और आकाश की तरह ऊंचे हैं, तो आपके प्रयास भी निश्चित तौर पर ऊंचे ही होंगे।  यदि आपने लक्ष्य निर्धारण ही छोटा किया है, इतना छोटा जितना कि आपके घर की छत है, तो यह निश्चित है कि आप उस स्तर से थोड़ा सा नीचे तक ही पहुँच पाएंगे।

सौजन्य: यू कैन टॉप पुस्तक

प्रेम प्रकृति प्रदत्त दान है

आपने कभी सोचने की चेष्ठा की कि परमात्मा के दिये हुए इस अद्भुत व बहुमूल्य जीवन को आपने नरक कैसे बना लिया है?  क्यों बना लिया है?  इसका बुनियादी कारण क्या है? अगर मनुष्य को परमात्मा के निकट लाना है, तो आप परमात्मा की बात करना बंद कर दो।  केवल मनुष्य को प्रेम के निकट लाइये। आपने जीवन में प्रेम का भाव भरिये।  अगर आपके जीवन में प्रेम की तरंगों का आगमन हो जाता है, तो परमात्मा नाचता हुआ आपके आँगन में प्रकट हो सकता है।

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आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का रसायन

प्रेम के तीन तल होते हैं।  तीन अर्थों में मैं आपको समझाना चाहता हूँ।  पहला तल – शरीर का तल है जहाँ आप गिरते हो।  वासना के वशीभूत होकर परस्पर प्रेम करना वास्तव में प्रेम है ही नहीं।  वह तो स्वार्थ है, छलावा है।  एक-दूसरे की आवश्यकता की पूर्ति मात्र है।  दूसरा तल है – मन का तल, जब बात शरीर से ऊपर उठकर मन तक आ जाती है।  मन से चाहने लगते हो।  तीसरा तल है – आत्मा का तल।  सूक्ष्मतम अस्तित्व आत्मा, जब वह प्रेम एक दूसरे की आत्मा से जुड़ जाता है यानि एक दूसरे की आत्मा में बस जाते हो तब आप दो नहीं रहते एक हो जाते हो।  आत्मसात हो जाते हो परस्पर।  ऐसा निःस्वार्थ प्रेम वासना रहित होता है।  तो मेरा आपसे निवेदन है कि आप सब लोग ऐसा प्रेम करो, ऐसा प्रेम ही परमात्मा से आपका साक्षात्कार करा देगा।

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प्रेम मांगो नहीं लुटाओ

जो प्रेम की मांग करता है, आज तक उसने इस दुनिया में प्रेम नहीं पाया है।  प्रेम पाने का एक ही उपाय है – प्रेम लुटाओ।  आप किसी दूसरे व्यक्ति की आँखों में प्रेम की भावना से झांकोगे, तो दूसरी ओर से घृणा नहीं, प्रेम की सरिता बहेगी।  अगर आप ह्रदय की गहराई से किसी का हाथ पकड़ोगे तो दूसरे के हाथ से भी प्रेम की ऊष्मा आएगी जिसका आपके हाथों के द्वारा अनुभव भी होगा।  लेकिन आपके प्रेम में कांटे ही कांटे हैं, फूल नहीं।  क्योंकि अपने अहंकार का विसर्जन नहीं किया है।  फिर भी मैं कहता हूँ कि यदि प्रेम में कांटे भी हों, तो प्रेम गुलाब के फूल जैसा है। काँटों में ही फूलों का मजा होता है।  जब प्रेम का भाव जागता है तो आप थोड़ा शुभ की ओर कदम बढ़ाते हो, थोड़ा सौन्दर्य कि ओर कदम बढ़ाते हो, थोड़ा सजते हो, श्रृंगार करते हो और आपके भीतर भी थोड़ी दिव्यता का भाव आने लगता है।

वर्तमान में जीवन जीने का विज्ञान

इस संसार में बहुत कुछ है जो तुम्हें भी उलझाये रहता है। वही आने वाला कल और वही बीता हुआ कल।  भूतकाल और भविष्यकाल। पूरा संसार मानो बाजार है जिसमें तुम उलझे पड़े हो।  अगर तुम्हें साक्षी की तरह जीना आ जाये, घटनाओं को सिर्फ देखते हुए जीना आ जाये, तुम निर्णय मत दो, तुम उलझो नहीं, जो कुछ हो रहा है उसके दृष्टा बन जाओ, उसके साक्षी बन जाओ, तो साक्षी बनते ही तुम वर्तमान में जीने लगते हो और वर्तमान में जीना जैसे ही शुरू होता है वैसे ही भीतर का आनंद फूट पड़ता है।  भीतर आनंद के झरने फूट पड़ते हैं, ये साक्षी भाव की साधना है, इसी को हम कहते हैं ध्यान।  और संजीवनी क्रिया के माध्यम से, महामेधा क्रिया के माध्यम से हम आपको साक्षी की अवस्था में ले जाते हैं  और यह साधना – मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों के चक्कर काटने से नहीं अपने जीवन को साधने से होती है।  वर्तमान में रहने का अभ्यास करने से यह सिद्ध होता है।  तो पहला उपाय वर्तमान में जीने का साक्षी होकर जीना, दृष्टा होकर जीना, तटस्थ होकर जीना, चीजों को देखते रहना, ये समझना कि मैं कर्ता नहीं हूँ, मैं तो सिर्फ दृष्टा हूँ, जो कुछ भी हो रहा है मैं सिर्फ उसका देखने वाला हूँ करने वाला हूँ।  जब कर्ता भाव का विसर्जन हो जाता है, तब  आपके भीतर यह भाव भर जाता है कि सबकुछ तो इस अस्तित्व में हो रहा है, रोज-रोज कहता हूँ – रोटी खाते हो खून बन जाती है, गाय भूसा खाती है भूसा दूध बन जाता है।  इस संसार में जाड़ा-गर्मी-बरसात, दिन-रात, अंधकार-प्रकाश, सब-कुछ अपने हिसाब से आ रहा है – जा रहा है, आपकी कोई भूमिका नहीं है।  आपकी साँसें आ रही हैं, जा रही हैं, प्रकृति सन्देश दे रही है कि सबकुछ अस्तित्व में, अस्तित्व कि ऊर्जा से संचालित हो रहा है।  करोणों-अरबों ग्रह-नक्षत्र, सूर्य, चाँद, तारे इस ब्रम्हांड में अपनी धुरी पर घूम रहे हैं, कोई एक-दूसरे से टकराता नहीं है, एक नियम में यह अस्तित्व सबको नियंत्रित किये हुए है, सबको समाहित किये हुए है, सबकुछ स्वतः हो रहा है।  अगर तुम्हारे भीतर से यह भाव हट जाये कि तुम करने वाले हो तो जब तुम कर्ता नहीं रह जाते हो तो तुम साक्षी बन जाते हो।  तो हमेशा ये अभ्यास करो कि तुम कर्ता नहीं हो, साक्षी हो, दृष्टा हो।  खाना खा रहे हो तो उस समय देखो कि ये शरीर खाना खा रहा है।  तुम शरीर नहीं हो, शरीर को खाना खाते हुये देखना अपने शरीर के बाहर खड़े होकर, ये साक्षी का अभ्यास है।  तुम मुझे सुन रहे हो, अपने शरीर के बाहर खड़े हो जाओ और देखो कि गुरुदेव बोल रहे हैं और तुम्हारा शरीर सुन रहा है और तुम दोनों को देख रहे हो, गुरुदेव को भी देख रहे हो।  जो भी – जितने भी कृत्य तुम करते हो उन सारे कृत्यों के प्रति तुम साक्षी हो जाओ तो साक्षी होते-होते, साक्षी का अभ्यास करते-करते तुम वर्तमान में जीने लगोगे।  तुम्हारे भीतर समर्पण घटित होगा।

परिवर्तन

जब आपके जीवन में कोई बड़ा परिवर्तन आता है तो यह आपको दिशा परिवर्तन के लिए मजबूर करता है।  सम्भव है नया रास्ता कभी कभी आपको आसान न लगे लेकिन आप पूरी तरह निश्चिंत हो सकते हैं कि इस पथ पर आपके लिए वैभव है।  आप पूरी तरह निश्चिंत हो सकते हैं कि इस पथ पर जो भी कुछ भी प्राप्तियाँ हैं वह किसी और प्रकार से आपको अनुभव न होतीं।

जब हम भूतकाल की किसी नकारात्मक घटना की ओर देखते हैं तो हम पाते हैं कि इसने किस प्रकार हमारे जीवन को प्रभावित किया।  हम यह पाते हैं कि उस घटना ने हमें जीवन में वह दिशा दी जिसे हम किसी भी प्रकार से बदल नहीं सकते थे।

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वर्तमान में जीवन जीने का विज्ञान

भरोसा चमत्कार करता है, भरोसा जादू करता है।  ये मूर्तियों की रचना आध्यात्म के वैज्ञानिकों ने क्यों की?  ताकि मूर्ति में तुम परमात्मा की प्रतिष्ठा करके मूर्ति के माध्यम से ही तुम उस परिणाम को प्राप्त कर सको जो समर्पण के माध्यम से प्राप्त होता है।  समर्पण ही सभी धर्मों का सार है।  मैं तो सारी दुनिया को सन्देश देता हूँ कि समर्पण ही धर्म है।  और समर्पण का अगर अभ्यास अगर आपको हो जाय तो समर्पण के चमत्कारिक परिणाम हो सकते हैं।  समर्पण घटते ही जो दूसरी महत्त्वपूर्ण घटना घटती है वह है अहंकार का विसर्जन।  तुम सब कुछ छोड़ देते हो कि करने वाला मैं नहीं हूँ, करने वाले गुरुदेव हैं, करने वाले प्रभु हैं, परमात्मा हैं, तब अहंकार धीरे-धीरे विसर्जित होने लगता है और अहंकार ही तो सब दुखों का मूल है।  अहंकार के दो पैर हैं।  अहंकार का पहला पैर है – मैंने जो किया, मैं जो था, मैंने जो बनाया – यानि ‘भूतकाल’ और अहंकार का दूसरा पैर है – मैं कल क्या कर सकता हूँ, मैं कल क्या करूंगा, मैं कल क्या बनूँगा, मैं कल क्या हो जाऊँगा – यानि ‘भविष्यकाल’।  इन दोनों पैरों पर अहंकार खड़ा होता है।  अगर इस भूतकाल और भविष्यकाल की चिंता हट जाय तो अहंकार गिर जाता है, यानि अगर तुम वर्तमान में आ जाओ तो इसके दोनों पैर गिर गए।  अगर तुम वर्तमान में जीने लगे तो अहंकार विसर्जित हो जाता है और इसका उल्टा भी सही है कि अगर तुम अहंकार को विसर्जित कर दो, अहंकार को छोड़ने का अभ्यास कर लो सद्गुरु के प्रति समर्पण के माध्यम से तो निश्चित रूप से तुम वर्तमान में जीने लगोगे।  भूत की चिंता ख़त्म हो जायेगी, भविष्य की चिंता ख़त्म हो जायेगी – इसके ख़त्म होते ही तुम वर्तमान में आ जाओगे और वर्तमान में आ जाना ही परमानन्द को प्राप्त कर लेना है।

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