आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का रसायन

प्रेम के तीन तल होते हैं।  तीन अर्थों में मैं आपको समझाना चाहता हूँ।  पहला तल – शरीर का तल है जहाँ आप गिरते हो।  वासना के वशीभूत होकर परस्पर प्रेम करना वास्तव में प्रेम है ही नहीं।  वह तो स्वार्थ है, छलावा है।  एक-दूसरे की आवश्यकता की पूर्ति मात्र है।  दूसरा तल है – मन का तल, जब बात शरीर से ऊपर उठकर मन तक आ जाती है।  मन से चाहने लगते हो।  तीसरा तल है – आत्मा का तल।  सूक्ष्मतम अस्तित्व आत्मा, जब वह प्रेम एक दूसरे की आत्मा से जुड़ जाता है यानि एक दूसरे की आत्मा में बस जाते हो तब आप दो नहीं रहते एक हो जाते हो।  आत्मसात हो जाते हो परस्पर।  ऐसा निःस्वार्थ प्रेम वासना रहित होता है।  तो मेरा आपसे निवेदन है कि आप सब लोग ऐसा प्रेम करो, ऐसा प्रेम ही परमात्मा से आपका साक्षात्कार करा देगा।

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About Ajay Pratap Singh

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Posted on फ़रवरी 16, 2014, in उद्धरण. Bookmark the permalink. टिप्पणी करे.

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