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गुरु और शिष्य का संबंध बनता है – श्रद्धा व समर्पण से

ज्ञान के आकर्षण के कारण गुरु के प्रति तुम्हारे हृदय में आदर का भाव बनता है।  महीने, दो महीने बाद संभव है, तुम्हें पता चले कि तुम्हारा गुरु तो इतना ज्ञानी सचमुच में नहीं है, जितना तुम समझते थे, तो तुम्हारा आदर कम हो जाएगा, आदर क्षीण हो जायेगा।  अगर तुमने देखा कि तुम्हारा गुरु बड़ा तपस्वी है, योग करता है, प्राणायाम करता है और इसीलिए तुम्हारे चित्त में गुरु के प्रति आकर्षण पैदा हो गया तो तुम समझोगे कि तुम्हारा गुरु बड़ा ज्ञानी है।  लेकिन महीने दो महीने बाद तुम्हें पता चले कि कोई खास तपस्या नहीं, कोई खास साधना नहीं है, गुरु शीर्षाशन करना ही नहीं जानता है।  जिस योग और साधना के कारण गुरु के प्रति आदर था तुम्हारे चित्त में, वह आदर का भाव तुम्हारे भीतर से चला जायेगा।

इस तरह छोटे-मोटे जो आदर के भाव होते हैं उससे गुरु पैदा नहीं होता है तुम्हारे जीवन में।  गुरु पैदा होता है – श्रद्धा से।  श्रद्धा किसी कारण से पैदा नहीं होती है।  जब हृदय का हृदय से मेल होता है तभी किसी के प्रति श्रद्धा अकारण पैदा होती है।

जब हृदय का संबंध गुरु से बन जाता है, जब आत्मा का संबंध गुरु से हो जाता है तब गुरु और शिष्य का संबंध शुरू हो जाता है।  वह गुरु और शिष्य के बीच का संबंध होता है।  शेष सारे संबंध कितने ही गहरे क्यों न हों, वे मन के और शरीर के होते हैं।  बाप-बेटे का संबंध शरीर से ज्यादा गहरा संबंध नहीं है।  तुम्हारे अस्तित्व के तीन तल हैं – शरीर का तल, मन का तल, और सबसे सूक्ष्म आत्मा का तल।  ये संबंध तीन तल पर होते हैं।

दुनिया में सारे संबंध जैसे – बाप बेटे का संबंध, पति पत्नी का संबंध या भाई बहन का संबंध हो, शरीर से बनने वाले संबंध हैं।  लेकिन तुम्हारे और गुरु के बीच का संबंध शरीर के तल का नहीं है, मन के तल का संबंध नहीं है।  ये तो आत्मा का आत्मा से, हृदय का हृदय से उत्पन्न होने वाला संबंध है।  तभी तो सबको छोड़कर उनके चरणों में समर्पण कर देते हो।

जो तुम बेटे के लिये नहीं कर सकते, भाई बहन के लिये नहीं कर सकते, वह सब तुम गुरु के लिये कर सकते हो।  मैं उससे भी अद्भुत बात बताता हूँ कि जो माँ-बाप बेटे के लिये नहीं कर सकता है जो भाई बहन एक दूसरे के लिये नहीं कर सकते हैं, उससे भी कई गुणा अधिक, अनंत गुणा ज्यादा, क्षण-प्रतिक्षण गुरु शिष्य के प्रति करने के लिये तत्पर रहता है।  गुरु चाहता है कि मेरे प्रिय शिष्य को सारी सम्पदा मिल जाय।  वह बांटने के लिये, झोली भरने के लिये सदा तैयार रहता है।  गुरु तो एड़ी चोटी एक कर देता है, पसीना बहा देता है कि मेरी सारी सम्पदा मेरे प्रिय शिष्य को मिल जाय।  मेरे प्राण, मेरी आत्मा, मेरे शिष्य को मिल जाय।

यही गुरु कि करुणा है, यही गुरु का गुरुत्व है और यही गुरु कि महिमा है।  वह अपना सब कुछ चौबीस घण्टे अपने प्रिय शिष्य में उलेड़ने को तत्पर रहता है।  इसलिए तुम्हें ठोकता पीटता है, संभालता है, सब कुछ करता है कि कैसे अपने को तुम्हारे भीतर उलेड़ दे?  गुरु देता है तो छोटी-मोटी चीज नहीं देता है कि-

“गुरु समान दाता नहीं, याचक शिष्य समान,

तीन लोक की सम्पदा, सो दे दीन्ही दान।”

गुरु के समान देने वाला है ही नहीं।  ब्रम्हा, विष्णु, महेश भगवान भी नहीं दे सकते है।  कोई नहीं दे सकता।  केवल स्वामी सुदर्शनाचार्य दे सकते हैं।  आत्मा दे दी, अपने प्राण दे दिये, और कहा – बेटे अपना शरीर भी तुम्हें दे देता हूँ।  अब और देने को क्या बचता है? वे तो साक्षात परमात्मा हैं।  यह मत सोचना कि गुरु तुम्हारे जैसा है, क्योंकि उसे भी पसीना है, उसे भी बुखार आता है, उसे भी सर्दी-जुकाम होता है और उसे भी भूख-प्यास लगती है।  फिर तुम्हारे भीतर कहीं न कहीं बात आ ही जाती है कि गुरु को ब्रम्हा, विष्णु, महेश मानना मूर्खता की बातें हैं।  क्योंकि वह भी तुम्हारे जैसा चलता है, तुम्हारे जैसे पहनता है और तुम्हारे जैसा बोलता है।  लेकिन तुम्हारे मन में गुरु को परमात्मा स्वीकार करने का भाव बन गया तो फिर सब कुछ सारा वेद, सारा पुराण, सारी बाइबिल, सारी कुरान सब तुम्हारे भीतर उतार जायेगी।

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About Ajay Pratap Singh

Blogger, ERP Administrator, Certified Information Security Expert, Spiritual Healer, Translator (E2H)

Posted on नवम्बर 21, 2012, in क्रांति सन्देश, गुरु वाणी, प्रवचन, Guru Wani, Kranti Sandesh. Bookmark the permalink. टिप्पणी करे.

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