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हृदय खोलो, गुरु को जानो

मेरे प्रेमियों, जब भी मैं इस व्यास पीठ पर बैठता हूँ तो मेरे हृदय पर, प्राणों पर, मेरी आत्मा पर और मेरे शरीर पर सद्गुरु देव स्वामी सुदर्शनाचार्य की अद्भुत कृपा बरसने लगती है।  और मैं कहूँ कि उस समय “मैं” होता ही नहीं हूँ।  उनकी कृपा, उनका आशीष, और साक्षात उनकी आत्मा मेरे अंदर भर जाती है।  मेरी आँखों से प्रेम के, आनंद के आँसू झरने लगते हैं।  मेरा कंठ अवरूद्ध हो जाता है।  बोलने की चेष्ठा, बोलने का साहस करने मे बड़ा परिश्रम करना पड़ता है।  यानि जब तुम भाव से भर जाते हो, जब तुम्हारा हृदय काँप जाता है तो वाणी निकलने को तैयार नहीं होती है।  यह अद्भुत राज है, गुरु-शिष्य के बीच के सम्बन्धों का।  इसे कोई तर्क से, बुद्धि से नहीं समझ सकता है।  लेकिन तुममे से कुछ लोग इसे समझते हैं।  तुम जब कभी मेरे पास आकर अपनी निगाहों से मुझे देखते हो तो आपकी निगाहें मेरी निगाहों पर पड़ती हैं, किन्तु तुमसे बोला कुछ नहीं जाता।  तुम्हारे आँसू झरने लगते हैं।  तुम्हारे कुछ कहे बिना ही तुम्हारे प्रेम के, आनंद के, आँसू सारी बातें कह देते हैं।  तुम्हारी सारी पीड़ा को व्यक्त कर जाते हैं। ऐसा कुछ मुझे अक्सर देखने को मिलता है।  जिस क्षण मैं स्वामी सुदर्शनाचार्य का स्मरण भर कर लेता हूँ तो कुछ अद्भुत घटना घटने लगती है।  मैं तुम्हें हृदय से बताना चाहता हूँ कि जो कुछ इस स्थल पर घटित हो रहा है, वह स्वामी सुदर्शनाचार्य के आशीष का ही प्रतिफल है।  उनके चरणों मेन बैठने का मेरा एक ही अनुभव है कि सद्गुरु का आशीष अनंत आनंद की वर्षा करता है।

यह आध्यात्मिक स्थल सद्गुरु स्वामी सुदर्शनाचार्य के प्राणों से, उनकी आत्मा से और उनके कर कमलों से स्थापित किया हुआ बीज है।  मैं आपको बताना चाहता हूँ एक अद्भुत तथ्य।  जब इस बीज का आरोपण 13 दिसंबर 1999 को स्वामी सुदर्शनाचार्य ने किया था, आप में से बहुत से लोगों को मालूम है कि उस समय आपके आध्यात्मिक घर का आकार कितना बड़ा था, जितनी लंबाई चौड़ाई का यह मंच बना है, इतने बड़े कमरे में ही आपके श्री सिद्ध सुदर्शन धाम का आरोपण हुआ था।  लेकिन बीज का आरोपण करने के क्षण प्रातः वंदनीय परम पूज्य गुरुदेव ने एक महत्त्वपूर्ण बात कही थी कि यह बीज इतना विशाल वट वृक्ष बनेगा, जिसकी शीतल छाया में दुनिया के लाखों, करोणों और असंख्य लोग शांति और आनंद रूपी परमात्मा की सुवास लेंगे तथा उसे प्राप्त कर सकेंगे।

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