वर्तमान में जीवन जीने का विज्ञान

करने वाला वही, कराने वाला वही, उसके हाथ हजार; तुम तो उसके हाथ भर हो।  तुम तो बांस की पोली पोंगली हो, जो सुर निकल रहा है, जो संगीत निकल रहा है वो उसी का है। तब तुम साक्षी बन गये और तुम्हारे साक्षी बनते ही, जब तुम समर्पण कर देते हो, अस्तित्व के प्रति समर्पण करते ही तुम वर्तमान में आ जाते हो।  क्यों, तुम्हारी चिंता तो यही है कि कल पता नहीं क्या होगा और जब तुमने समर्पण कर दिया तो कल कि चिंता ख़त्म हो जायेगी, कल का तनाव ख़त्म हो जायेगा कि मैंने तो सद्गुरु के माध्यम से अस्तित्व के प्रति समर्पण कर दिया, जो करेंगे गुरु महाराज करेंगे।  इस परिसर में आने का सबसे बड़ा लाभ यही है कि तुम्हें समर्पण का अभ्यास हो जाये सद्गुरु के माध्यम से।  सद्गुरु तो इस अस्तित्व की, परमात्मा की खूँटी है जिसमें तुम प्राण की प्रतिष्ठा कर देते हो।  सद्गुरु में भगवान की, सद्गुरु में परमात्मा की प्रतिष्ठा करते ही सद्गुरु के प्रति समर्पण घटित होता है और जब समर्पण घटित होता है तो तुम कल की चिंता से मुक्त होते हो।  सद्गुरु वही है जो कल की चिंता से मुक्त कर देता है और कहता है कि तुम निर्भय होकर वर्तमान में जियो, तुम्हें कल की चिंता करने की जरूरत नहीं, मैं तुम्हारे तन-मन-धन का जिम्मा लेता हूँ, तुम्हें खंरोच नहीं लगने दूंगा।  यही स्वामी सुदार्शनाचार्य जी ने मुझसे कहा था, यही मैं तुमसे कह रहा हूँ।  यही मेरे पहले भी सम्बुद्ध सदगुरुओं ने कहा था।  यही जीसस ने कहा था, यही बुद्ध ने कहा था, यही कृष्ण ने कहा था, यही क्राइस्ट ने कहा था, यही मैं कह रहा हूँ, यही मेरे बाद भी कहा जाता रहेगा।  अगर तुम हिम्मत करके मेरे ऊपर छोड़ सको तो भारी से भाति बीमारी तुम्हें पकड़े होगी लेकिन तुमने समर्पण कर दिया कि सद्गुरु महाराज ने वचन दिया है अब ये बीमारी नहीं रहेगी।  मैं वचन देता हूँ फिर बीमारी नहीं रहेगी, नहीं रहेगी, नहीं रहेगी।  तुम तो साक्षी हो गये, तुम तो कर्ता न रहे, तुम दृष्टा हो गये, तुम्हारे अन्दर भरोसा आ गया, ये भरोसा अद्भुत चीज है।  अगर तुम्हें भरोसा आ जाये, तो असंभव चीज पर भी अगर तुम्हें भरोसा आ जाये तो असंभव भी संभव हो जाता है।  यह ब्रम्हांड का नियम है, यह अध्यात्म का नियम है, ये मेरा अनुभव किया हुआ वैज्ञानिक सत्य है मैं अपने सद्गुरु को व्यक्ति नहीं सद्गुरु भगवान के रूप में देखा और सद्गुरु का हाथ मेरे लिये परमात्मा का हाथ बन गया। सद्गुरु का वचन, मेरे लिये परमात्मा का वचन बन गया।

ये तो आध्यात्म की साधना पद्धति है, इस साधना से तुम सिद्धि को प्राप्त कर सकते हो, बस तुम्हारे भीतर भरोसा पैदा हो जाना चाहिये।  मुरारीलाल मेरे प्रिय शिष्य हैं जिनके बारे में अक्सर कोई न कोई घटना आपसे कहता हूँ।  एक बार वे किसी क्लब में अपनी पत्नी को लेकर के पार्टी अटेंड करने गये और उस क्लब में तमाम अंग्रेज लोग आये थे तो उसमें हास्य ब्यंग्य का कार्यक्रम रखा गया था तो एक अंग्रेज उसमें खड़े होकर घंटे भर चुटकुला सुनाता रहा।  मुरारीलाल की पत्नी अंग्रेजी जानती नहीं थी और वो एक घंटे बेचैन होती रही, सुनती रही।  सब लोग हँसते रहे लेकिन उसने देखा कि मुरारीलाल तो जोक जैसे ही ख़त्म होता था वैसे ही सबसे पहले ठहाका मारकर हंसने लगते थे।  एक घंटा बीता, कार्यक्रम ख़त्म हुआ, मुरारीलाल की पत्नी ने कहा – मुझे तो बड़ी हैरानी हुई, मुझे तो पता ही नहीं था कि तुम्हारी समझ में इतनी अंग्रेजी आती है, तुमने तो कभी अंग्रेजी पढ़ी नहीं।  मुरारीलाल ने कहा मैंने तो अंग्रेजी कभी नहीं पढ़ी।  उसने कहा, लेकिन तुम जैसे ही जोक ख़त्म होता था, इतना प्राणों से कैसे ठहाका मारकर हँसते थे?  मुरारीलाल ने कहा, मुझे भरोसा था कि जोक निश्चित रूप से शानदार होगा, मजेदार होगा, उस भरोसे के कारण मैं हँसता था।

भरोसा चमत्कार करता है, भरोसा जादू करता है।  ये मूर्तियों की रचना आध्यात्म के वैज्ञानिकों ने क्यों की?  ताकि मूर्ति में तुम परमात्मा की प्रतिष्ठा करके मूर्ति के माध्यम से ही तुम उस परिणाम को प्राप्त कर सको जो समर्पण के माध्यम से प्राप्त होता है।  समर्पण ही सभी धर्मों का सार है।  मैं तो सारी दुनिया को सन्देश देता हूँ कि समर्पण ही धर्म है।  और समर्पण का अगर अभ्यास अगर आपको हो जाय तो समर्पण के चमत्कारिक परिणाम हो सकते हैं।  समर्पण घटते ही जो दूसरी महत्त्वपूर्ण घटना घटती है वह है अहंकार का विसर्जन।  तुम सब कुछ छोड़ देते हो कि करने वाला मैं नहीं हूँ, करने वाले गुरुदेव हैं, करने वाले प्रभु हैं, परमात्मा हैं, तब अहंकार धीरे-धीरे विसर्जित होने लगता है और अहंकार ही तो सब दुखों का मूल है।  अहंकार के दो पैर हैं।  अहंकार का पहला पैर है – मैंने जो किया, मैं जो था, मैंने जो बनाया – यानि ‘भूतकाल’ और अहंकार का दूसरा पैर है – मैं कल क्या कर सकता हूँ, मैं कल क्या करूंगा, मैं कल क्या बनूँगा, मैं कल क्या हो जाऊँगा – यानि ‘भविष्यकाल’।  इन दोनों पैरों पर अहंकार खड़ा होता है।  अगर इस भूतकाल और भविष्यकाल की चिंता हट जाय तो अहंकार गिर जाता है, यानि अगर तुम वर्तमान में आ जाओ तो इसके दोनों पैर गिर गए।  अगर तुम वर्तमान में जीने लगे तो अहंकार विसर्जित हो जाता है और इसका उल्टा भी सही है कि अगर तुम अहंकार को विसर्जित कर दो, अहंकार को छोड़ने का अभ्यास कर लो सद्गुरु के प्रति समर्पण के माध्यम से तो निश्चित रूप से तुम वर्तमान में जीने लगोगे।  भूत की चिंता ख़त्म हो जायेगी, भविष्य की चिंता ख़त्म हो जायेगी – इसके ख़त्म होते ही तुम वर्तमान में आ जाओगे और वर्तमान में आ जाना ही परमानन्द को प्राप्त कर लेना है।  वैज्ञानिक तल पर अगर मैं आपसे बात कहूं तो इस जगत में वैज्ञानिक कहते हैं कि सिर्फ ऊर्जा है।  ऊर्जा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, तुम्हारा शरीर भी कुछ नहीं है, तुम सिर्फ ऊर्जा के पुंज हो।  पदार्थ भी ऊर्जा का सघन रूप है और आध्यात्म के वैज्ञानिकों ने कहा कि ऊर्जा भी तुम्हारी चेतना का सघन रूप है।  जब तुम संजीवनी क्रिया के माध्यम से, महामेधा क्रिया के माध्यम से ध्यान की गहनता में उतरते हो तो तुम्हें एक चीज का बोध होता है कि तुम्हारा तार एक अस्तित्व की ऊर्जा से जुड़ गया है।  एक ही ऊर्जा है तुम्हारे भीतर।  अगर यही जीवन ऊर्जा बाहर की तरफ बहती है तो धन इकठ्ठा करती है, पद इकठ्ठा करती है, प्रतिष्ठा इकठ्ठा करती है और यही जीवन ऊर्जा अगर भीतर की ओर प्रवाहित होने लगती है तो आत्मा में परम आनंद को पैदा कर देती है।  अगर तुम्हारी ऊर्जा बाहर बहती रहती है तो इस संसार की बहुत सारी चीजें तुम इकठ्ठा कर सकते हो – धन, पद, प्रतिष्ठा।  अम्बार लगा सकते हो।  लेकिन सारा संसार भी तुम्हें मिल जाय और उसमें तुम स्वयं खो जाओ – तुम क्या हो ये मिट जाय, ये मिले ही नहीं तुहें तो सब कुछ यहीं धरा रह जायेगा जब लाद बंजारा, सब, सारे आपके कोम्प्लेक्सेज, मल्टी कोम्प्लेक्सेज,  सारी बिल्डिंग, सारी सम्पदा यहीं की यहीं पड़ी रह जायेगी।  तुम्हें अपना ही बोध नहीं , तुम मरने के साथ मिट गये।

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