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बुद्धिमत्ता का महानतम स्रोत

ध्यान न सिर्फ आध्यात्मिक अपितु विज्ञान के क्षेत्र में भी असाधारण उपलब्धियों का स्रोत रहा है।  विज्ञान की नज़रों में ध्यान की कला अचेतन क्रिया है।  विज्ञान में ध्यान के क्षण मात्र घटनात्मक हैं, लेकिन सभी बड़ी सफलताएँ सहज ज्ञान से हुई हैं जब मन स्थिर अवस्था में था।  वे मस्तिष्क से नहीं आए थे बल्कि मस्तिष्क के बाहर से आए थे।
यह सभी महान वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया है, यद्यपि वे इस बात से हैरान हैं कि जो वास्तविक योगदान वे कर सके हैं वे वास्तव में उनके नहीं थे।  वे किसी ऐसी जगह से आते हैं जिसे वे नहीं जानते हैं।  वे सिर्फ वाहक हैं और ज़्यादा से ज़्यादा माध्यम।  इस तरह से विज्ञान में ध्यान घटनात्मक (अपने आप होने वाला) है जबकि धर्म में यह इच्छित (जान बूझकर किया हुआ) है।

ध्यान का मतलब है मस्तिष्क को एक तरफ रख देना जिससे कि आप वास्तविकता को बिना मस्तिष्क की मध्यस्थता के सीधे देख सकें।  यदि आप मस्तिष्क के माध्यम से देखेंगे तो मस्तिष्क हमेशा आपको विकृत करेगा। मस्तिष्क के माध्यम से आप वास्तविकता को कभी नहीं देख सकेंगे।  जिस समय मस्तिष्क सक्रिय नहीं है उस समय आप वास्तविकता को जैसी है वैसी ही देखते हैं।  और “वह जो है”, उसे जानने के लिये, आपको विचारशून्यता की स्थिति में पूरी तरह शांत होना होगा।

ध्यान वह विज्ञान है जो हमारे आंतरिक जीवन को परिवर्तित करता है।  जैसे बिजली का बल्ब हमारे वाह्य जगत को प्रकाशित करता है, ध्यान हमारे आंतरिक जगत को प्रकाशित करता है। मैंने ध्यान को आसान, सामान्य और प्राकृतिक एवं सम सामयिक जीवनशैली का एक आवश्यक अवयव बनाने का प्रयास किया है।

ध्यान तत्व रूप में सचेत रहने की एक कला है, सचेत उसके लिए जो आपके भीतर और आपके आस-पास हो रहा है।  और सचेत रहने के लिये हमें, हम जैसे भी हैं उसे स्वीकार करके शांत होना होगा।  इसलिए, जब आप शारीरिक और मानसिक रूप से कुछ भी न कर रहे हों, जब सारी सक्रियता गायब हो जाय और जब आपका सिर्फ अस्तित्व रह जाय, तब यह कुछ न करने की स्थिति ध्यान में होने की स्थिति होती है।  एक क्षण के लिये भी जब आप कुछ नहीं कर रहे हैं और आप सिर्फ अपने केंद्र पर केन्द्रित हैं, सर्वथा आराम की स्थिति में हैं – यह ध्यान है।  और एक बार आपको इसमें कुशलता मिल गयी तो आप इस स्थिति में जब तक चाहें रह सकते हैं, यहाँ तक कि दिन में 24 घंटे भी।  इसलिये, जब भी आपको सिर्फ अस्तित्व होने के लिये समय मिले, कुछ भी करने की स्थिति को छोड़ दीजिये।  सोचना, एकाग्रता और चिंतन-मनन भी कुछ करना ही है।

दूसरे शब्दों में, आप कर्ता नहीं रह जाते है, आप सिर्फ दृष्टा या देखने वाले बन जाते हैं।  आप सिर्फ साक्षी बन जाएं यह ध्यान की महानतम अवस्था है।  कार्य करना अपने स्तर पर चलता रहता है, सिर्फ एक बात की अनुमति नहीं है कि आपका ध्यान नहीं छूटना चाहिये।  सामान्य जीवन में आप अपने बाहर की किसी घटना या व्यक्ति को देखते हैं, ध्यान में आप इस देखने वाले को देखते हैं।  यह दृष्टा है कौन? ध्यान, तत्व रूप में, भीतर के दृष्टा को देखना है।

या तो हम बाहर की और केन्द्रित हो सकते हैं या फिर अपनी आँखें बंद बंद कर सकते हैं और अपनी पूरी चेतना को अपने भीतर की ओर केन्द्रित होने दे सकते हैं।  आपकी जागरूकता 1001 चीजों में उलझी हुई है।  अपनी जागरूकता को हर जगह से वापस निकालिए और अपने भीतर प्रवेश कीजिये और आप ऐसी स्थिति में पहुंचेंगे जहां आप ध्यान द्वारा उत्कृष्ट-चेतना (सुपर कॉनसियसनेस) की स्थिति का अनुभव करेंगे।

ध्यान का अर्थ है जागरूकता।  आप जागरूक होकर जो भी करते हैं वह ध्यान है।  खेल खेलना ध्यान है, संगीत सुनना ध्यान है।  ये क्रियाएँ जिस समय किसी भी तरह के मानसिक विकर्षण (डिस्ट्रैक्शन) से मुक्त हैं, ये प्रभावी ध्यान बन जाती हैं।

ध्यान कोई तकनीक नहीं है, लेकिन यह जीवन जीने का एक तरीका है।  यह चेतना की स्थिति का निरूपण है, जहां मस्तिष्क बिखरे हुए विचारों और विभिन्न आकारों से मुक्त होता है।   बुद्धिमत्ता ध्यान का एक प्रतिफल (बाइप्रॉडक्ट) है।  यह सीखने से नहीं आता है।  इसके विपरीत यह भूलने से आता है जो कि सिर्फ ध्यान द्वारा ही संभव है। यदि आप अध्ययन को बोझ समझेंगे तो यह कष्टदायी काम लगेगा।  लेकिन यदि अध्ययन आपकी अभिलाषा और आपका प्रेम बन जाता है, तो यह एक खेल, एक सुखद काम बन जाएगा।  और अब खुद अध्ययन एक ध्यान बन जाएगा।  तब, किसी तरह के ध्यान की आवश्यकता नहीं रह जाएगी।  सिर्फ अध्ययन ही काफी है।  यदि आप सतर्क और जागरूक हैं तो सिर्फ अपने मन की बात सुनना ही ध्यान हो सकता है।

ध्यान की सभी तकनीकियों और कार्य प्रणालियों का सार यही है कि ये सभी एकनिष्ठता सिखाती हैं।  इसका अर्थ है अपनी पूरी ऊर्जा से एक समय में सिर्फ एक काम करने में अपना पूरा ध्यान केन्द्रित करना।  इस प्रकार आप ‘ध्यान केन्द्रित करना’ सीखते हैं जो कि आपको बेहतर सोचने, बेहतर एकाग्रता में सक्षम बनाता है और आपकी रचनात्मक योग्यता तो बढ़ाता है।

एक समय में सिर्फ एक काम करना आपके मस्तिष्क को अनावश्यक द्वंद्व और विकर्षण से इस हद तक मुक्त करता है कि मन एवं शरीर किसी और समय की अपेक्षा और अधिक तालमेल से काम करते है।  और यह आपकी स्वाभाविक स्थिति है, यह वही स्थिति है जिसे आपको वाकई प्राप्त और महसूस करना था।

किसी एक चीज़ पर आपके मन एवं एकाग्रता का केन्द्रीकरण आपके मन में कुछ न होने के बराबर है।  विचार अपने अस्तित्व के लिये लगातार गतिविधि पर निर्भर करता है।  उसी प्रकार जैसे गति न रहने पर साईकिल ज़मीन पर गिर जाती है, इसी प्रकार विचारों में गति न होने पर मस्तिष्क अंतर्ध्यान हो जाता है।  यह एक गतिशील प्रक्रिया है।  गतिशील होना विचार का सहज स्वभाव है।  यदि आप विचारों की इस अनवरत प्रक्रिया या गति को रोक देंगे, तो यह करते ही आपका मन स्थिर हो जाएगा।  सिर्फ चेतना रह जाएगी।  और जब आप विचारों की अनुपस्थिति को प्राप्त कर लेंगे तो आप यह जानने लग जाएंगे कि आपका मन वास्तव में क्या है, और मुख्यतः आप स्वयं क्या हैं।  इस स्थिति को कहते हैं “विचार शून्य चेतना”।

बच्चों के लिये ध्यान विश्राम की एक प्रक्रिया है जो उनकी समस्या समाधान की योग्यता को बढ़ाता है।  ध्यान क्रोधी और कुंठित बच्चे को शांत होने और एक विशेष स्थिति की और मुड़ने में भी मदद करता है।  परन्तु ध्यान के लिये उचित तकनीक सीखना अति महत्त्वपूर्ण है।  इस उम्र में आपका मन सर्वदा अस्थिर रहता है इसलिए मन को ध्यानशील बनाने हेतु इसे वश में करने के लिये तकनीक चाहिये।

ध्यान द्वारा आप अत्यधिक बुद्धिमत्ता प्राप्त कर सकते हैं।  बुद्धिमत्ता का मतलब आप अपने आप सोचने लग जाएंगे, आप अपने आस-पास स्वयं देखने लग जाएंगे, आप धर्मग्रंथों या अंधविश्वासों पर विश्वास नहीं करेंगे; आप सिर्फ अपने अनुभवों पर विश्वास करेंगे।

जल्दी सीखने का अभ्यास

क्या आपने कभी ध्यान दिया है, कि आपके आप-पास के सफल लोग कौन सी आदतें धारण करते हैं? जिस प्रकार वे बात करते हैं, चलते हैं, अलग-अलग उम्र के लोगों से कैसे संवाद करते हैं उसकी एक सूची बनाने की कोशिश कीजिये और क्यों न उन्हीं से सलाह लें कि आपको किस तरह से व्यवहार करना चाहिये, काम करना चाहिये, अध्ययन करना चाहिये और जीना चाहिये; वे अपने रहस्यों को आपसे बांटने में प्रसन्न ही होंगे।

कुछ भी जल्दी सीखने का सबसे अच्छा तरीका है कि जो आप सीखना चाहते हैं उसका पूर्वदर्शन कीजिये। फिर यह समझने का प्रयास कीजिये कि उस विषय पर किस प्रकार के प्रश्न पूछे जा सकते हैं,  यह जानने के बाद पाठ्य सामग्री और अपने नोट्स को पढ़ने का प्रयास कीजिये।  अंततः, आपने जो पढ़ा है उसका स्वयं अनुवाचन कीजिये और बीच में आप जो भूल गए हैं उसकी जाँच कीजिये।  इस अंतर को दूर करके आप एक आत्मविश्वासी शिक्षार्थी बन सकते हैं।

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