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झूठे धर्मों को विदा करो

मध्य युग में ईसाइयत में एक बड़ा खेल हुआ – मध्य युग में ईसाईयों ने स्त्रियों को चौराहों पर जिन्दा जला दिया।  किस अपराध में, किस अभियोग में, उनके ऊपर अभियोग था कि ये औरतें शैतान से काम संबंध बनाती हैं और शैतान ईश्वर का विरोधी होता है, खिलाफत करता है।  जो स्त्री शैतान के साथ काम सम्बन्ध बनाती है उसको जिन्दा रहने का अधिकार नहीं है और बड़ी विचित्र बात है कि उस समय के चर्च ने पोप से स्पष्ट कर दिया कि जिस स्त्री के खिलाफ शिकायत मिलती है उस स्त्री को कोर्ट में विशेष ट्रायल किया जायेगा।  मात्र इतना ही काफी न था पोप के कोर्ट में ये शिकायत भेज दी जाती कि अमुख स्त्री शैतान से काम सम्बन्ध बनाती है और इतनी शिकायत हो जाती तो उस स्त्री को तुरंत कैद कर लिया जाता था।  उसे कैद कर उससे पूछा क्या तुम शैतान से काम सम्बन्ध रखती हो स्त्री मना करती थी मैं शैतान को नहीं जानती।  शैतान को मैंने कभी देखा ही नहीं, कभी मिली नहीं और जब वह इंकार करती थी उसको तरह-तरह कि यातनाएं दी जाती थी इतनी कठोर, इतनी भयानक, इतनी पीड़ा रुपी यातनाएं जैसे आजकल पुलिस वाले जुर्म क़ुबूल कराना हो तो ‘थर्ड डिग्री मेथड’ इस्तेमाल करते हैं।  इतनी यातनाएं देते हैं जो आदमी जुल्म नहीं करता वह भी मार के डर से कह देता है कि मैंने जुर्म किया है।  औरतें उस भयावह पीड़ा के, भय के, यातना के भय से कह देती थी कि प्रभु क्षमा कर दो।  मुझसे गलती हुई, मैंने काम सम्बन्ध बनाया और इतना स्वीकार कर लिया।  उससे यातना कि पीड़ा के भय से इतना पर्याप्त था।  पोप का हुक्म हो जाता था कि इस औरत को चौराहे पर जिन्दा जला दो और ऐसी हजारों औरतों को धर्म के नाम पर जिन्दा जला दिया जाता था।  इतनी सारी नासमझियां चल रही थी और बड़ा दुर्भाग्य है कि आज २१ वीं सदी में तुम जैसे लोग हैं, पृथ्वी भरी पड़ी है ऐसे नासमझों से इस नासमझी को दूर करने का अभियान चलाया जाना जरूरी है।

जो धर्म गुरु साधू-महात्मा दुनिया में भरे पड़े हैं मैं उनका आवाहन करता हूँ कि धर्म के नाम पर जितनी बेवकूफियां, मूढ़ताएँ, जितनी नासमझियां पृथ्वी पर फैली हैं उनके खिलाफ एकजुट होकर अभियान चलायें।  एक वैज्ञानिक सोच पैदा करें।  इन झूठे निरर्थक शब्दों पर, जेहाद के नाम पर, स्वर्ग के नाम पर तुम कब तक ठगे जाते रहोगे, कब तक तुम अपने शोषण के प्रति विवश होते रहोगे, सोचने कि जरूरत है, समझ पैदा करने की जरूरत है।

आज मैं आपसे सबसे महत्त्वपूर्ण बात बताकर अपनी बात समाप्त करना चाहता हूँ अब आपके नाचने गाने और भीतर के आनंद को प्रकट करने का अवसर है लेकिन भीतर के आनंद को प्रकट करने का अवसर है लेकिन आपका आनंद एक घंटे, दो घंटे का न हो आपका आनंद शाश्वत कैसे हो, शास्वत आनंद हो तो आतंकवाद मिट जायेगा।   हँसता हुआ आदमी कभी किसी दूसरे आदमी की छाती में छुरा नहीं घोंप सकता, तुम उदास हो निराश हो इसलिए पृथ्वी पर आतंक फैला रहे हो।  आतंकवाद के मूल को अगर पैदा होने पर विचार करें तो मैं आपसे कहना चाहूँगा आतंकवाद मनुष्य के मूल में समाया हुआ है।  उसके लिए मनुष्य के मनोविज्ञान को समझने की जरूरत है जिस तरह से मनुष्य जिया है।  अब तक पृथ्वी पर उसका इतिहास साक्षी है कि मनुष्य को हर १०-१५ साल के अंतराल पर एक युद्ध कि जरूरत पड़ी है।  पिछले पांच हजार सालों में पंद्रह हजार युद्ध होना इस बात का प्रमाण है कि आदमी दस-पंद्रह साल में एक युद्ध चाहता है क्यों चाहता है क्योंकि तुम्हारे भीतर इतना आक्रोश भरा हुआ है इतना तनाव, इतनी अशांति, इतनी बेचैनी, इतना उपद्रव भरा हुआ है कि वो निकासी चाहता है हर दस-पंद्रह सालों में युद्ध हो जाता है। आप ने देखा होगा जब दो देशों में युद्ध छिड़ता है सबसे पहले सुबह उठकर आपको यहाँ चटपटा लगता है कि देखूं आज किस पर बम गिरा, किस बनकर से हजार-पांच सौ मरे कि नहीं मरे।  अगर कोई नहीं मरता तो आप बड़े निराश होते हो कि आज तो कुछ हुआ ही नहीं।  आज ईराक और अमेरिका में घमासान लड़ाई चल रही है, रोज सवेरे देखते थे कि सद्दाम हुसैन ने कुछ गिराया, मारा, मिटाया।  ये आपके भीतर कि मनोवृत्ति है आप जाते हो सड़क पर दो आदमी लड़ रहे हैं, भीड़ इकठ्ठा हो जाती है।  एक दूसरों को मारता है, दूसरा पहले को मारता है आप देखते हो ये तो बड़ी हल्की-फुल्की मारपीट हो रही है, जोर से मारे तो मजा आये।  अगर सिपाही किसी रिक्शे वाले को डंडे मारता है यदि हलके से मारता है तो आपको मजा नहीं आता है, तीन-चार तड़ा-तड मारता तो आपको भी मजा आता।  आपके भीतर जो तनाव, हिंसा, आक्रोश जो दबाये बैठे हो वो निकलना चाहता है वो निरहार होना चाहता है इसलिए युद्ध की जरूरत है और मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि ये जो दस-पंद्रह साल का अंतराल होता है यह विश्राम का काल होता है।  उस दस-पंद्रह साल में आप तैयारी करते हो युद्ध की फिर दस-पंद्रह साल में युद्ध हो जाता है।  दूसरी बात आपसे कहना चाहता हूँ आपके मनोविज्ञान के बारे में – मनुष्य मूल रूप से शिकारी रहा है, जब से वो पैदा हुआ है, जब से उसका विकास हुआ है वो शिकारी के रूप में इस पृथ्वी पर आया है वो प्रकृति से शाकाहारी नहीं है।  मैंने इतिहास पढ़ा मनुष्यता का तो मैंने देखा कि पहले मनुष्य कबीलों में रहा करता था तो एक कबीले कि दूसरे कबीले से लड़ाई रहा करती थी।  उस दूसरे कबीले का आदमी अगर पकड़ में आ जाता था तो उसको पकड़ लेना और उसको मारना और उसका मांस खाना ये नीति-संगत बात मानी जाती थी, कबीलों में इसका जश्न मनाते थे, कबीलों में इसको उत्सव के रूप में मनाते थे।  ये दूसरे कबीले का आदमीं पकड़ में आया, आज हम उसका आहार करेंगे, आज हम उसका भोजन करेंगे।  तो मारने और काटने की वृत्ति आपके भीतर दबी हुई पड़ी है।  इस मनोविज्ञान को समझना पड़ेगा।  वृत्ति आपकी पैदा होती है।  अगर युद्ध हो जाए, लड़ाई हो जाए तो निकासी हो जाती है उसकी, सब निकल जाता है।  इसलिए शब्द दे दिया जाता है धर्म युद्ध के नाम पर, स्वर्ग के नाम पर, अच्छे-अच्छे, सुन्दर-सुन्दर शब्दों के नाम पर तुम मरने-मिटने को तैयार हो जाते हो जबकि तुम सोचने की कोशिश भी नहीं करते हो कि आखिर ये सही भी है कि नहीं।  शैतान है भी कि नहीं।  ये किसी ईसाई ने नहीं सोचा कि पहले इसको तय कर लिया जाये कि शैतान है भी कि नहीं।  लेकिन उसके नाम पर स्त्रियों को जिन्दा जलाने का काम जारी रखा।  फिर मैं कहना चाहता हूँ दूसरा विश्व युद्ध हुआ १९४५ में उसके बाद १९५५ से १९६० तक में तीसरा विश्व युद्ध होने की आवश्यकता थी मनुष्यता को लेकिन वह नहीं हो सकता जैसे मैंने बताया ऐसा इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि अब देश डर गए हैं कि अब युद्ध हो गया, विराट युद्ध हो गया तो आणविक शस्त्रों का प्रयोग होगा, अगर अमेरिका ने अणु शक्ति का प्रयोग किया तो ऐसा नहीं कि शेष देश मिट जायेंगे अमेरिका जिन्दा रहेगा।  अमेरिका को भी मिटना पड़ेगा।  ये किसी ईसाई ने नहीं सोचा कि पहले इसको तय कर लिया जाये कि शैतान है भी कि नहीं।  लेकिन उसके नाम पर स्त्रियों को जिन्दा जलाने का काम जारी रखा।  फिर मैं कहना चाहता हूँ दूसरा विश्व युद्ध हुआ १९४५ में उसके बाद १९५५ से १९६० तक में तीसरा विश्व युद्ध होने की आवश्यकता थी मनुष्यता को लेकिन वह नहीं हो सकता जैसे मैंने बताया ऐसा इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि अब देश डर गए हैं कि अब युद्ध हो गया, विराट युद्ध हो गया तो आणविक शस्त्रों का प्रयोग होगा, अगर अमेरिका ने अणु शक्ति का प्रयोग किया तो ऐसा नहीं कि शेष देश मिट जायेंगे अमेरिका जिन्दा रहेगा।  अमेरिका को भी मिटना पड़ेगा।

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  1. सर्वोत्तम साइड के लिए साधुवाद
    जय जय

  1. पिंगबैक: समझ ही समाधान है | साइंस ऑफ़ डिवाइन लिविंग

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