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प्रेम – विवाह और हमारी धार्मिकता

मेरा कहने का अभिप्राय केवल इतना है की हमें तरह-तरह के धर्म, नये धर्म, पुराने धर्म कुछ नहीं चाहिए, हमें केवल सच्ची धार्मिकता चाहिए।  धर्म कोई अलग-अलग वस्तु नहीं है, धर्म कई नहीं हैं, धर्म तो एक ही होता है।  जब परमात्मा एक होता है, तो धर्म भी एक ही होगा और उस एक धर्म के अंतर्गत हम अगर मनुष्य की परिभाषा कर सकते हैं, तभी मनुष्यता और धार्मिकता दोनों का ताल-मेल बैठ सकता है और हम दुनिया में हिंसा से मुक्त हो सकते हैं।  युद्धों से मुक्त हो सकते हैं।  सांप्रदायिक दंगों से मुक्त हो सकते हैं और तभी आप सच्चे अर्थों में धार्मिक बन सकते हैं और तभी जो शोषण की प्रवृत्ति पैदा हो गयी है समाज में, वह प्रवृत्ति भी तभी शांत हो सकती है।

मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि पंडित-पुरोहित, मुल्ला-मौलवी ये अज्ञानी हैं, या मूर्ख हैं।  मैं तो कहना चाह रहा हूँ कि ये अज्ञानी बिलकुल नहीं हैं, अज्ञानी होते तो इनसे कोई खतरा नहीं था, ये बहुत होशियार हैं, इसीलिए खतरा बढ़ गया है।  इसीलिए धर्म के नाम पर, मंदिर और मस्जिद के नाम पर सम्पूर्ण मनुष्य जाति का शोषण हो रहा है और साम्प्रदायिकता के नाम पर इस तरह का वातावरण और इस तरह का माहौल चौबीस घंटे समाज में खड़ा रखते हैं कि धरती पर धार्मिकता आ ही नहीं पा रही है।  धरती पर भावुकता आ ही नहीं पा रही है।  हम तो छोटी-छोटी धार्मिक संकीर्णताओं से भरे हुए हैं।

एक छोटी सी कहानी आपको बताऊँ।  एक सम्राट के दरबार में एक अजनबी यात्री घूमता हुआ पहुंचा।  उसने सुन्दर सी पगड़ी बांध रखी थी और एक खूबसूरत पगड़ी हाथ में लिए हुए था।  और देखने में वह युवक काफी खूबसूरत और आकर्षक व्यक्तित्व का लग रहा था।  उस पगड़ी को देखते ही राजा ने कहा कि ऐसी पगड़ी तो बहुत मुश्किल से दिखाई पड़ती है, ये सुन्दर पगड़ी आपको कहाँ से मिली?  तो उस अजनबी ने कहा कि मैं तो इस पगड़ी को बेचने के लिए ही इस राजदरबार में आया हूँ।  मैं कई राजदरबारों से वापस आ चुका हूँ, इस पगड़ी को कोई बादशाह खरीद ही नहीं पाया।  मुझे बताया गया कि आप ही इस पगड़ी को खरीद सकते हैं।  बादशाह ने पूछा कि तुम्हारी इस पगड़ी की क्या कीमत है?  उस युवक ने कहा कि इस पगड़ी की कीमत एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ हैं।  वजीर ने राजा के कान में फुसफुसाते हुए कहा कि महाराज ये तो ठगने का काम कर रहा है।  ये साधारण सी पगड़ी बीस-पच्चीस रूपये से ज्यादा की नहीं है, यह तो लूट रहा है।  यह बात तो वजीर ने कान में ही कही, लेकिन वह युवक होशियार था।  उसने अंदाजा लगा लिया कि वजीर ने राजा से क्या कहा होगा?  वहीँ खड़े-खड़े उसने बादशाह से कहा कि हुजूर इसका मतलब मैं ये समझूं कि यह पगड़ी आप नहीं खरीद पाएंगे।  बादशाह ने वजीर को बुलाया और कहा, वजीर! इस युवक को दो हजार स्वर्ण मुद्राएँ दे दी जाएँ और इस पगड़ी को खरीद लिया जाय।

बादशाह के स्वाभिमान की बात थी।  एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ युवक के द्वारा मांगी जा रही थीं, लेकिन युवक की बातें सुनकर बादशाह का क्षत्रित्व भड़क उठा और उन्होंने कहा कि जब मेरे नाम पर पगड़ी बेचने आया है, तो इसे दो हजार मुद्राएँ देकर पगड़ी को खरीद लिया जाये और पगड़ी खरीद ली गयी।  वह अनजान यात्री वजीर से धीरे से बोला महोदय, आपको पगड़ी की कीमत मालूम होगी, लेकिन मुझे बादशाहों की कमजोरियां भी मालूम हैं।  बादशाहों की कमजोरी उस युवक को मालूम थी, इसीलिए वजीर की सारी सलाह बेकार गयी और पच्चीस रूपये की पगड़ी दो हजार स्वर्ण मुद्राओं में खरीद ली गयी।

तो पादरी, पुरोहित, पंडित, मुल्ला, मौलवी ये ईश्वर को तो नहीं जानते हैं।  अगर ईश्वर से इन लोगों का साक्षात्कार हो गया होता तो आज न जाने कितने लोगों को परमात्मा से मिला चुके होते।  परमात्मा का इनको कोई अनुभव नहीं है, लेकिन ये सब मनुष्य की कमजोरियों को भली-भांति जानते हैं।  मनुष्य सारा जीवन इन्हीं के जाल में फंसा रहता है।  तरह-तरह से धर्म के नाम पर उनका शोषण होता रहता है।  मैं चाहता हूँ की ऐसी चेतना जगे कि आपकी कमजोरियों का शोषण करने वाली संस्थाएं और लोग धीरे-धीरे इस धरती से समाप्त होने लगें।

पांच हजार साल बीत गये इन सब चीजों को करते-करते, लेकिन आज तक कभी परमात्मा की कोई अनुभूति इस धरती पर नहीं हुई है।  आप खुद बताएं, ज्यादा दूर न जाएँ, अपने परिवार को ही देखें।  आपके पूर्वज भी जाने कितनी तरह से उसी में उलझे पड़े रहे लेकिन क्या उन्हें किसी प्रकार का आत्मबोध, किसी प्रकार का आनंद और किसी प्रकार का परमात्मा का साक्षात्कार हो सका? नहीं हुआ।  मुश्किल से कोई गौतमबुद्ध, महावीर, क्राइस्ट और भगवान कृष्ण चार-छः नाम ही ऐसे आते हैं पांच हजार वर्ष के इतिहास में कि जिन्हें परम आनंद का, परमात्मा का साक्षात्कार या अनुभव हो सका।  इसका मतलब कुछ बुनियादी तौर पर गड़बड़ी है।  जिस धर्म की खेती हमारे समाज में हो रही है, उसमें कोई न कोई बुनियादी गड़बड़ी है।  अगर भूले भटके एक महावीर, एक गौतमबुद्ध, एक क्राइस्ट, एक मोहम्मद हो भी गये, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि जो धर्म उन्होंने पकड़ा, जो रास्ता पकड़ा, उसके कारण हो गये।  यह तो कभी-कभी अपवाद भी हो जाया करते हैं।  तो मैं यही कह रहा हूँ कि जिस राह पर आप चल रहे हो, उस राह के बारे में थोड़ा सा चिंतन करो, थोड़ा सा सोचो।  ये जीवन आपका आनंद और परमात्मा के अनुभव से भर सकता है।

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  1. gurudev pranam
    i have some questions in my mind
    first of all research studies show that arrange marriages are more stable then love marriages.i agree with you that in arrange marriages there is a cycle of fighting.but now love marriages has started a new culture of murder too.
    secondly in usa or uk mostly love marriages takes place there more than 40%families are single parent family which was also one of the major reason for decay in their economy but in india condition is reverse.our traditional practices(not all)have saved our economy.
    thirdly i read a column of dr.subramanium swamy i hope you must be knowing him .he claims that hinduism doesn’t mean a religion as you talk of bandhan mukt jeevan hinduism is the same either i can meditate or can go for murti puja no boundation at all even not in any field some are their but they too are on scientific bases and if some body finds a better scientific argument against them no need to follow what are your views on it
    sorry for cross questioning but its my right too

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