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प्रेम – विवाह और हमारी धार्मिकता

पिछले कुछ दिनों से मुझे ऐसा आभास होने लगा है कि आप लोगों ने मेरे द्वारा उठाये गए बिन्दुओं पर, उठाये गए विषयों पर चिंतन करना शुरू कर दिया है।  आप लोगों की ओर से मेरे पास बहुत अच्छे – अच्छे प्रश्न आ रहे हैं।  जिनको मैं पढ़ता हूँ तो ह्रदय गद्गद हो जाता है, केवल यह सोचकर कि कुछ प्रश्न मैंने पैदा करने चाहे थे, कुछ चिंतन के लिए आपको मजबूर करना चाहा था और वह चिंतन आपने शुरू कर दिया है।

एक बहुत प्रीतिकर प्रश्न है।  किसी ने पूछा कि मैं २६ साल का युवक हूँ।  मैं जानना चाहता हूँ कि क्या प्रेम-विवाह करना चाहिए या जैसा विवाह घर वाले कर दें वैसा ही मान लेना चाहिए?  इसका जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा?  दूसरा प्रश्न है कि पंडित-पुरोहितों, मुल्ला-मौलवियों पर विश्वास करें या न करें?

सारी आध्यात्मिकता का प्रारंभ ही प्रेम से होता है।  प्रेम के बिना किसी प्रकार की आध्यात्मिकता संभव ही नहीं है।  प्रेम के अनुभव के बिना जीवन में परमात्मा के आने की कोई सम्भावना है ही नहीं।  और परमात्मा आपके जीवन में इसीलिए नहीं आ रहा है, क्योंकि प्रेम का अनुभव आपके जीवन में है ही नहीं।  आप गंभीरता से सोचिये, क्या प्रेम का फूल आपके जीवन में खिलता हुआ अपनी सुगंध बरसा सका है कभी?  मैं कहता हूँ कि प्रेम की भूमि पर ही परमात्मा का बीज अंकुरित हो सकता है।  जिस दिन आपके जीवन में प्रेम का अनुभव उतरने लगेगा, उस दिन मंदिर, मस्जिद और गुरूद्वारे की आवश्यकता न रह जाएगी।  प्रेम के अतिरिक्त कोई भी अन्य प्रार्थनाएं आपको परमात्मा तक नहीं पहुंचा सकती हैं।  जिस पल आपके प्राणों में प्रेम की ज्योति का जन्म हो जाये, उसी पल आपको परमात्मा का साक्षात्कार अनुभव होना शुरू हो जायेगा।

पांच हजार वर्षों से ये जो पूजा-प्रार्थना, मंदिर-मस्जिद और धर्म के नाम पर जितनी भी चीजें हो रही हैं, इनसे जाने कितने लोग माथा टेकते-टेकते थक गए हैं।  कहीं कुछ मिला आज तक किसी को? नहीं।  क्योंकि भूमि तो आपने कभी तैयार ही नहीं की और आप हमेशा बीज डालने की कोशिश करते रहे।  जब तक भूमि तैयार नहीं होगी, बीज पत्थर पर पड़ेंगे तो बीज कभी अंकुरित नहीं हो सकते हैं।  प्रेम की भूमि ही परमात्मा के प्रति सच्ची प्रार्थना को जन्म दे सकती है और दूसरी कोई भी चीज नहीं।

मैं जो सबसे महत्त्वपूर्ण बात इस सन्दर्भ में कहना चाह रहा हूँ, वह यही है कि आपके जीवन का सारा केंद्र है – परिवार।  आप घूमते-फिरते निकलते है परिवार से और घूम-फिर कर लौटते हैं परिवार में।  उस परिवार में क्या हो रहा है? कैसा हो रहा है? क्या घटित हो रहा है?  उसी से आपका पूरा जीवन पूरी तरह प्रभावित होता है।  परिवार आपके लिए सारी ऊर्जा का केंद्र है, सारे जीवन का केंद्र है।  आप निगाह डालें अपने परिवार पर कि आपके परिवार में कितना आनंद है, जहाँ से आपके जीवन की ऊर्जा बन रही है।  विवाह की नींव पर ही हमारा परिवार खड़ा किया गया है।  विवाह से ही तो परिवार बनता है।  लेकिन जो परिवार हमारा छोटे से बड़ा होता गया, उस परिवार को देखें, क्या उस परिवार में प्रेम का अनुभव व्याप्त है।  ज्यादातर परिवारों में मैंने देखा है कि अगर परिवार में दस लोग हैं तो कम से कम चार लोग ऐसे जरूर मिलेंगे जो आपस में बात नहीं करते हैं।  परसों मुझे एक परिवार से मिलने का अवसर मिला, बहुत अद्भुत और विचित्र अनुभव हुआ कि उस परिवार का कोई भी सदस्य एक-दूसरे से बात नहीं करता है।  यहाँ तक कि पति-पत्नी भी एक-दूसरे से बात नहीं करते हैं।  सारा काम इशारों पर चल रहा है।

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  1. gurudev pranam
    i have some questions in my mind
    first of all research studies show that arrange marriages are more stable then love marriages.i agree with you that in arrange marriages there is a cycle of fighting.but now love marriages has started a new culture of murder too.
    secondly in usa or uk mostly love marriages takes place there more than 40%families are single parent family which was also one of the major reason for decay in their economy but in india condition is reverse.our traditional practices(not all)have saved our economy.
    thirdly i read a column of dr.subramanium swamy i hope you must be knowing him .he claims that hinduism doesn’t mean a religion as you talk of bandhan mukt jeevan hinduism is the same either i can meditate or can go for murti puja no boundation at all even not in any field some are their but they too are on scientific bases and if some body finds a better scientific argument against them no need to follow what are your views on it
    sorry for cross questioning but its my right too

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