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प्रेम मांगो नहीं, लुटाओ

जो प्रेम की मांग करता है, आज तक उसने इस दुनिया में प्रेम नहीं पाया है।  प्रेम पाने का एक ही उपाय है – प्रेम लुटाओ।  आप किसी दूसरे व्यक्ति की आँखों में में प्रेम की भावना से झांकोगे, तो दूसरी ओर से घृणा नहीं, प्रेम की सरिता बहेगी।  अगर आप ह्रदय की गहराई से किसी का हाथ पकड़ोगे तो दूसरे के हाथ से भी प्रेम की ऊष्मा आएगी जिसका आपके हाथों के द्वारा अनुभव भी होगा।  लेकिन आपके प्रेम में कांटे ही कांटे हैं, फूल नहीं।  क्योंकि अपने अहंकार का विसर्जन नहीं किया है।  फिर भी मैं कहता हूँ कि यदि प्रेम में कांटे भी हों, तो प्रेम गुलाब के फूल जैसा है। काँटों में ही फूलों का मजा होता है।  जब प्रेम का भाव जागता है तो आप थोड़ा शुभ कि ओर कदम बढ़ाते हो, थोड़ा सौन्दर्य कि ओर कदम बढ़ाते हो, थोड़ा सजते हो, श्रृंगार करते हो और आपके भीतर भी थोड़ी दिव्यता का भाव आने लगता है।  आप सूक्ष्मता का अनुभव करने लगते हैं।  पुष्प कि सुगंध की तरह भीतर ही भीतर खिलने लगते हैं और घृणा की बातें आपके मन में आती ही नहीं हैं।  प्रेम के छींटें डालना शुरू करो, प्रेम का भाव उड़ेलना शुरू करो, कैसा भी आपका शत्रु होगा आपकी ओर प्रेम के भाव को व्यक्त करने लगेगा।  इसीलिए मैं कहता हूँ कि स्वर्ग और नरक में कोई भौगोलिक अवस्थाएँ नहीं हैं।  यहाँ स्वर्ग है और वहां नरक है।  प्रेम में जीना स्वर्ग और शत्रुता में जीना ही नरक है।  शत्रु आपके जीवन को नरक बना देता है।  आप भीतर ही भीतर पीड़ा से भरे रहते हो। यानि जब शत्रु पैदा किया आपने, शत्रुता का भाव पैदा किया आपने, उसी क्षण आपने अशांति को भी आमंत्रण दे दिया।  इसलिए सबसे बड़ा आध्यात्म मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे में घंटी बजाना नहीं है।  सबसे बड़ा आध्यात्म है – आपने चारों ओर प्रेम का वातावरण पैदा करना।  अपने  चित्त में प्रेम का भाव पैदा करना और अपने चित्त को दूसरों के प्रति शत्रुता के भाव से मुक्त कर देना ही सबसे बड़ा आध्यात्म है ।  अगर इस आध्यात्म को अपना लोगे नित्य प्रति शांति और आनंद रुपी परमात्मा कृष्ण कन्हैया के रूप में, आपके बच्चों के रूप में आपके आँगन में नृत्य करेंगे।

प्रेम में कांटें नहीं हैं, जलन भी नहीं है।  प्रेम जलाता ही नहीं है, प्रेम जन्माता भी है।  प्रेम कि जलन से एक-एक कदम आगे बढ़ो, वह कुछ नया पैदा करता जाएगा, कुछ नए तंतु जगाता जाएगा आपके भीतर।  प्रेम मृत्यु है आपकी, यानि आपके अहंकार की मृत्यु है।  जब तक आप अहंकार का विसर्जन नहीं करोगे आपकी मृत्यु नहीं होगी।  आप एक बार मिट जाओ।  सद्गुरु के चरणों में अपने अहंकार का विसर्जन कर दो तब वहां जीवन का शुभारम्भ होगा।  प्रेम के पदार्पण से यानि अहंकार के विसर्जन के बाद आपके जीवन में प्रेम का पदार्पण होगा और उस मृत्यु से महाजीवन का जन्म होगा।  दुनिया में अगर मनुष्यता को परमात्मा के निकट लाना है, तो मनुष्य को प्रेम के निकट लाने की जरूरत है।  सारी मनुष्यता को प्रेम के निकट लाने की जरूरत नहीं है।  मैं कहता हूँ आप ईश्वर को नहीं खोजो, आप खोज भी नहीं सकते हो।  आप प्रेम को खोजो, आप प्रेम की भागीरथी बहाने की चेष्ठा करो।  आपने जीवन को प्रेम से भरने की कोशिश करो, प्रेम को खोजते-खोजते परमात्मा आपने आप प्रकट हो जायेगा।  आपने दिलों को ही प्रेम का मंदिर बन जाने दो परमात्मा प्रकट हो जायेगा। जितना ज्यादा प्रेम करोगे, उतना ही ज्यादा आप जीवंत हो जाओगे।

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