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काम क्रोध पर विजय

ऊर्जा का संचार करने के लिए जरूरी है की अपनी इन्द्रियों से नष्ट होने वाली ऊर्जा के क्षरण को रोको।  महासाक्षी भाव के द्वारा, दृष्टा बन जाओ।  यदि आप अपने काम, क्रोध के आवेगों के प्रति साक्षी होने का प्रयास करने लगे, तो उस ऊर्जा के क्षरण को रोकने से अद्भुत सुख व आनंद मिल सकता है।  उस काम की ऊर्जा का संग्रह आपके भीतर होने लगे तो ध्यान की झलकियों में जो कुण्डलिनी ऊपर की और चलना शुरू करती है और ध्यान में एक-एक क्षण की विचार शून्यता की स्थिति आती है, आपकी ऊर्जा से संग्रह से जो आनंद आपको एक क्षण मिलता है, अनंत सम्भोग की क्रिया भी उस आनंद को प्राप्त नहीं कर सकती।  जो आध्यात्म के आनंद में डूब जाता है, उसे संसार की तुच्छ चीजें क्या आनंद दे पाएंगी?  क्योंकि इससे बड़े आनंद का अनुभव उन्हें हो गया है।  आप अपनी इन वृत्तियों पर ध्यान करो।  बड़ी अनुकम्पा है परमात्मा की कि आपको क्रोध आता है।  आपको काम का ज्वर पकड़ता है।  इसका मतलब है की ऊर्जा तो है, आप जीवंत तो हो।  जिसको क्रोध भी न आये, काम भी न पकड़े, लोभ भी न पकड़े, लालसा पैदा न हो, समझो वह जीवित नहीं है।  आप भाग्यशाली हो कि ये सब आवेग आपको पकड़ते हैं।  उससे भी बड़ा सौभाग्य है कि आपको अपना सद्गुरु मेल गया है, जो आपकी इस ऊर्जा को रूपांतरित करके आनंद रुपी परमात्मा की ऊर्जा में परिवर्तित कर सकता है।

मैं कहना चाहता हूँ की जब क्रोध आये तो धन्यवाद दो उस आदमी को, जिसने गाली देकर आपके अन्दर क्रोध पैदा किया।  और गुरूजी ने कहा था कि जब क्रोध पकड़े तो उस अवसर पर ध्यान दो, देखो कि इनकी गाली देने से मेरा चेहरा लाल हो रहा है, मेरा खून गरम हो रहा है, मेरे ह्रदय की गति भी तेज होती जा रही है, मेरे कान भी लाल होते जा रहे हैं।  देखो, इस ह्रदय की गति अर्थात शरीर को वैसे ही क्रोध पकड़ रहा है जैसे गुरूजी ने बताया था।  साक्षी बन जाओ।  क्रोध का जहर इस शरीर में फैलता जा रहा है। दृष्ट बनकर इस स्थिति को देखो।  आप देखोगे की क्रोध चंद क्षणों में विलीन होने लगेगा।  क्रोध विद्ध्वंस्कारी रूप लेकर प्रकट नहीं हो पायेगा।  आज कल बड़ा शोध चल रहा है कि जब क्रोध पकडे तो आप अपने हांथों को अपने चेहरे पर फेरें और रख को अपने चेहरे की कोशिकाओं में प्रवाहित होने दें।  क्रोध की बिजली आपके सौन्दर्य को और बढ़ाकर चली जायेगी।  निश्चित रूप से अगर किसी व्यक्ति का कोई अंग ख़राब हो रहा हो, जब क्रोध पकडे, काम पकडे उस समय उस अंग पर ऊर्जा को केन्द्रित कर दो, आप देखिये निश्चित रूप से उस अंग के सौष्ठव, सौन्दर्य और शक्ति में वृद्धि हो जायेगी।

आप केवल महासूत्र ‘साक्षी’ का प्रयोग करें, आपकी वृत्तियों का रूपांतरण होने लगेगा।  अगर आप क्रोध की वृत्ति को ध्यान बना लें, तो वह वृत्ति आपकी क्षमा में परिवर्तित हो जायेगी। क्षमा करने की शक्ति आ जायेगी आपके भीतर।  जिनके पास क्षमा करने की शक्ति नहीं है इसका मतलब उनकी ऊर्जा का बड़ा नाश होता चला आ रहा है।  क्षमा करने के लिए बड़ी ऊर्जा की आवश्यकता होती है।  काम के ज्वर को आप ध्यान बना लें तो ब्रम्हचर्य की ऊर्जा आपके भीतर प्रकट हो जायेगी।  जैसे ही आपको लोभ पकड़े आप थोडा होश में आ जाओ।  तब अगर आप जाग जाओगे तो उस जागरण में लोभ ऊर्जा में रूपांतरित हो जायेगा।  यानि आपके अन्दर दान करने की भी शक्ति आ जायेगी।  तो साक्षी सूत्र का अर्थ है, जब भी कोई वृत्ति आपको पकड़े तो आप होश में आ जाओ।  आपका चित्त एक पेंडुलम की तरह चलता है।  जब आप ज्यादा भोजन कर लेते हो तो पेट बहुत भर जाता है।  तब आपको उपवास की जरूरत होती है।  आप क्रोध की जगह शांति को पकड़ो, लोभ की जगह दान को पकड़ो।  आप इन दोनों वृत्तियों से दूर होकर देखना।  आपको कुछ करना नहीं है।  एक वैज्ञानिक जैसे परीक्षण करता है यैसे परीक्षण करो।  जब आपको काम, क्रोध, लोभ का ज्वर पकड़े तो किसी के प्रति एकात्मक मत होओ, केवल दृष्ट बन जाओ।  दूर से निरीक्षण करो।  होश में आ जाओ।  इन वृत्तियों में रस पैदा होता है और कुछ नहीं है।  यदि आप ऊर्जा से नहीं भरोगे तो कोई आपको कितना भी जोश दिलाना चाहे आपको जोश कैसे आएगा?  आप कैसे नाचोगे?  मैं आपको नाचना चाहता हूँ।  बस, ऊर्जा के क्षरण को रोको।  थोड़ा ध्यान करो।  बस इतना ही, आप स्वयं नाचने लगोगे।  जितेन्द्रिय होकर, अर्थात इन्द्रियों पर विजय पाकर ही परमात्मा को प्राप्त कर सकते हो।

जहाँ प्रेम है वहां जीवन है, जहाँ घृणा है वहां विनाश है।

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