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अहंकार विसर्जन

प्रातः वन्दनीय परम पूज्य गुरुदेव के चरणों में आप सब प्रेमियों की ओर से ह्रदय से प्रणाम, सत-सत प्रणाम।  आप सब के भीतर के परमात्मा को और आप सब को भी मेरा ह्रदय से प्रणाम।  बहुत सारी कामनाओं को बहुत सारी भावनाओं को अपने ह्रदय में लिए हुए आप अपने आध्यात्मिक घर में पहुंचे हैं।  जाने किस किस बात के लिए आपका ह्रदय प्रार्थना कर रहा है।  अपने सद्गुरु की आँखों में निहारता हुआ आपका ह्रदय जाने क्या क्या मांग रहा है और मैं सत्संग के नाम पर प्रवचन के नाम पर कुछ भी बोलता रहूँ वो तब तक तुम्हारे प्राणों को नहीं छू पायेगा जब तक तुम्हारी कामनाएं, तुम्हारी मांगें, तुम्हारी प्रार्थनाएं जो मांग के नाम पर हो रही हैं वो उठती रहेंगी इसीलिए जो मैं बोलता हूँ उसे तुम सुन भी नहीं पाते हो।  जो मैं कहना चाहता हूँ उसे तुम समझ भी नहीं पाते हो और जो मैं देना चाहता हूँ वो तुम प्राप्त भी नहीं कर पाते हो, पकड़ भी नहीं पाते हो।  क्यों, क्योंकि तुम मांगों से भरे हो, कामनाओं से भरे हो।  कुछ लोग तो केवल इसलिए यहाँ तक पहुँच सके हैं क्योंकि उनको ऐसा सन्देश गया है कि जब मैं गद्दी पर बैठूं उस समय सामने होने पर उनकी कुछ बात सुनी जा सकती है, वो बैठे तो हैं मेरे सामने लेकिन उनकी मांग ही दौड़ रही है उनके भीतर।  सुन नहीं पा रहे हो सुन नहीं पाओगे, कभी नहीं सुन सकोगे मुझे, जब तक तुम खाली होकर नहीं बैठोगे।  जिस कामना, जिस प्रार्थना, जिस मांग के साथ यहाँ आये हो सबसे पहले मैं उसी सम्बन्ध में सद्गुरु से, देव दरबार से प्रार्थना करता हूँ कि जिस भी कामना से, जिस भी प्रार्थना से तुम यहाँ आये हो वो सद्गुरु, वो देव दरबार वो परमात्मा तुम्हारी उस कामना को पूरी करे। सबसे पहले सद्गुरु कि ओर से आदेश हो रहा है कि मैं तुम्हें दो मिनट का अवसर देता हूँ, दो मिनट मैं सद्गुरु का देव दरबार कि शक्तियों का आवाहन करता हूँ, आप मेरी तरफ देखें और जो आप मांगना चाहते हैं, जो भी आपकी कामना है उसको दोहराते जाएँ दो मिनट के लिए, दो मिनट के लिए दोहराते जाएँ, दोहराते जाएँ, दोहराते जाएँ।  अब मांगने का कम बंद, अब आप केवल शून्य हो जाएँ, खाली हो जाएँ, अब चित्त में कुछ न रहे।  अब केवल मैं रहूँ तुम्हारे ह्रदय में, तुम्हारी आँखों में केवल मैं रहूँ।  मेरे अलावा  और कुछ बचे नहीं जितनी देर यहाँ बैठो।  केवल खाली होकर, शून्य होकर मेरी तरफ देखेंगे।  आखें खुली रहेंगी और मेरी तरफ देखेंगे पूरा का पूरा – जैसे कि आप मेरे भीतर प्रवेश कर रहे हैं। इस तरह आप मेरी तरफ देखें।  मैं आपके भीतर प्रवेश कर रहा हूँ।  खाली हो जाएँ पूरी तरह, कोई विचार न रह जाय, केवल अपने को मेरे हाथों में छोड़ दो, सद्गुरु के हाथों में छोड़ दो, परमात्मा के हाथों में छोड़ दो, तुम बचो ही नहीं, अपना अहंकार यहीं छोड़ दो।  तुम हो ही नहीं, केवल मैं ही हूँ।  तुमने तो अपना सब कुछ मुझे दे दिया, अपने को ही मुझे दे दिया और मेरी तरफ देखते रहें, देखते रहें, देखते रहें, देखते रहें।  अहंकार छोड़ते ही, मेरे हाथों में अपने को छोड़ते ही वह सद्गुरु शक्ति आपके भीतर प्रवेश करेगी, आपके भीतर का सारा कचरा साफ़ कर जाएगी।  आज यहीं इसी जगह; मैं कल कि बात नहीं करता लेकिन पूरे भाव से अपने को छोड़ो, अहंकार जरा भी न बचे, एकटक मेरी तरफ देखते रहें।  आँखें थकती हैं तो थकने दो, कुछ होना नहीं उनमें, थोडा उनका कचरा निकल जायेगा, बहार हो जायेगा, थकने दो।  हमेशा तुम्हारी आँखें कुछ न कुछ देखती रहती हैं, आज तो तुम सिर्फ मुझे देखो, मुझे अवसर दो, सद्गुरु को अवसर दो ताकि वो तुम्हारे भीतर प्रवेश करे ताकि तुम्हारे भीतर से बहुत कुछ कूड़ा करकट बाहर निकल सके।  तुम मेरी तरफ देखो, मैं तुम्हारी सांस के साथ तुम्हारे भीतर प्रवेश करूँगा, हाँ और तुम्हें शुद्ध कर सद्गुरु तुम्हारी सांस के साथ बाहर आ जायेगा, और अब आँखें बंद कर लें। बंद आँखों से ऐसा अनुभव करें, ऐसी भावना करें जैसे आप किसी झरने के नीचे बैठे हैं और अद्भुत शांति, अद्भुत आनंद, अद्भुत ऊर्जा कि वर्षा हो रही है आपके ऊपर, ऐसी भावना करें।  जब तक मैं संकेत न दूं तब तक आप शांतिपूर्वक आँख बंद किये बैठे रहें और ऐसी भावना करें जैसे आप झरने के नीच बैठे हैं और अद्भुत शांति, अद्भुत आनंद, अद्भुत ऊर्जा कि वर्षा हो रही है आप के ऊपर।  सद्गुरु कि आँखें तुम्हारी तरफ हैं और अपनी आँखों से सद्गुरु गहराई से तुम्हें देख रहा है और तुम्हारे ऊपर अपने नेत्रों के माध्यम से शांति, आनंद और ऊर्जा कि वर्षा कर रहा है।  भीगो, विचार में, भावनाओं में बहुत शक्ति होती है।  आप शांति और आनंद और ऊर्जा कि भावना करें, वो बरस रही है आप भीगें, अगर पांच मिनट आप ऐसी भावना करते हैं तो पूरी जिंदगी शांति, आनंद, ऊर्जा से भर जाएगी।
धन्यवाद्।

और अब हम इस विराट अस्तित्व की अद्भुत ऊर्जा, ओमकार का, ॐ शक्ति का उच्चार करेंगे।

ॐ शक्ति ॐ शक्ति ॐ शक्ति ॐ

ॐ शक्ति ॐ शक्ति ॐ शक्ति ॐ

आज के सन्देश के रूप में बहुत थोड़ी से कुछ बातें आपके ह्रदय तक पहुँचाना चाहता हूँ।  बात शुरू करना चाहता हूँ एक छोटी सी कहानी से।  रूसी लेखक दोस्तोयेव्स्की की प्रशिद्ध कहानी है ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ जिसका अर्थ होता है अपराध और सजा।   ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ , कहानी बड़ी छोटी है लेकिन बड़ी प्रीतिकर है, विचारों में कितनी शक्ति होती है, विचार कृत्य से भी ज्यादा मूल्यवान होते हैं।  आप क्या सोचते हैं, क्या विचार करते हैं वही आपके जीवन में होने लगता है, आपका जीवन निर्मित होता है, आपका व्यक्तित्व निर्मित होता है, जैसा जैसा आप सोचते हैं, जैसा जैसा आप विचार करते हैं।  आपका जीवन शांति और आनंद का पिंड बन सकता है, शांति और आनंद का पिंड यानि साक्षात् परमात्मा यानि सच्चिदानंद। कैसे बन सकता है,  अगर आपकी सोच शांति और आनंद से भरी हो, अगर आपके विचारों में मौज हो, आशा हो, आनंद हो, उत्साह हो, उदासी न हो, निराशा न हो, निषेधात्मक विचार न हों तो आप परमात्मा की ओर अग्रसर होने लगते हैं।  अगर आपके विचार खराब-खराब हैं, दुखद हैं, निराशा भरे हैं, जाने क्या हो जायेगा, इस तरह आप सोचते हैं तो आप मरने के पहले ही मर गए, तो आपका कदम पाप की ओर उठने लगा। एक ओर पाप दूसरी ओर परमात्मा, तब आप का कदम पाप की ओर उठने लगा, अधर्म की ओर उठने लगा यानि आप केवल अपनी सोच से धर्म की ओर परमात्मा की ओर बढ़ सकते हैं।  अपनी नेगेटिव सोच से, अपनी निषेधात्मक सोच से, अपनी निराशा भरी सोच से अधर्म की ओर पाप की ओर और विनाश की ओर बढ़ सकते हैं। ये बात आपकी समझ में आ जाएगी अगर आप ध्यान से दो मिनट इस छोटी सी कहानी को सीधे-सीधे अपने ह्रदय तक जाने देंगे।  एक नवजवान युवक था, विद्याथी था, गाँव में  उसके घर के सामने एक बूढी औरत रहती थी, वह बहुत धनी औरत थी और लोगों का सामान गिरवी  रखकर लोगों को कर्ज देती थी, ब्याज पर पैसे देती थी और सारे गाँव को उसने कर्जदार बना रखा था लेकिन अब उसकी उम्र कोई अस्सी साल की हो रही थी। इतनी बूढी औरत अस्सी साल की उसे ठीक से दिखाई भी नहीं पड़ता था जर्जर हो रही थी लेकिन जिन्दा थी।  वह नवजवान युवक लगातार सोचता रहता था की ये बुढ़िया सारे गाँव का धन चूसती जा रही है, सबसे धनी औरत है, ये मर क्यों नहीं जाती, ये मर जाती तो सारा गाँव संपन्न हो जाता, सारे गाँव को कर्जे से मुक्ति मिल जाती, नहीं तो सारा गाँव इसके कर्ज का गुलाम है।  वह लगातार यही सोचता रहता विद्यार्थी की भगवन कुछ करो की ये बुढ़िया कैसे भी ख़तम हो जाये, मर जाये।  वो बेचारा विद्यार्थी भी गरीब था, परीक्षा के दिन आ गए, परीक्षा की फीस जमा करना भी जरूरी था, फीस घर में थी नहीं, फीस की किल्लत थी, मजबूरी में अपनी घड़ी लेकर उस बुढ़िया के घर जाता है कहता है कि इसको गिरवी रख लें और मुझे फीस के लिए कुछ पैसे चाहिए।  दो साल से जो युवक सोचता रहा कि ये बुढ़िया मर क्यों नहीं जाती, इसे कोई मार क्यों नहीं डालता।  दो साल से यही सोचता रहता था, सोचता रहता था और वही विचार फिर उसके मन में आ रहा है, अपनी घड़ी निकाल कर उस बुढ़िया को देता है बुढ़िया घड़ी हाथ में लेकर, कमरे से बाहर निकलकर घड़ी देखने कि कोशिश करती है कि ये घड़ी गिरवी रखने योग्य है भी कि नहीं।  दिखाई तो पड़ता नहीं लेकिन आँखें खोल-खोल कर देखने कि कोशिश करती है कि ये घड़ी गिरवी रखने लायक है भी या नहीं।  और कहते हैं कि जब वो चेष्ठा कर ही रही थी, उसी वक्त उस युवक का हाथ उस बुढ़िया कि गर्दन तक पहुँच जाता है और वह युवक बुढ़िया कि गर्दन दबा देता है।  बुढिया तो वैसे ही मरी मराई थी ही उसके हाथ उस नवजवान के हाथ बुढिया की गर्दन तक पहुँचते ही, दो साल से जो सोचता रहा की कोई इसे मार क्यों नहीं डालता, ये मर क्यों नहीं जाती, सारे गाँव का खून चूस रखा है इसने; उसने कभी खुद मारने की नहीं सोची थी लेकिन गर्दन दबा दी और दबाते ही बुढ़िया मर गयी।  मरी थी ही, मरी मराई तो थी ही लेकिन मर गयी। और जब देखा उस नवजवान ने कि बुढ़िया  मर गयी, भगा और अपने घर पहुंचा, बहुत घबराया हुआ था, मारना नहीं चाहता था बुढ़िया को, ये जरूर सोचता था की मर जाती तो अच्छा था, कोई मार डालता तो अच्छा था लेकिन खुद मारे इसकी बात तो सोची ही नहीं थी, लेकिन पता नहीं क्या हुआ दो साल से सोचते सोचते , जब अपनी घड़ी गिरवी रखने गया उसके हाथ अचानक उसकी गर्दन पर पड़  ही गए।  कभी मारना नहीं चाहता था लेकिंन उसके हाथों ने बुढ़िया की गर्दन दबा दी।  यानि कोई विचार तुम्हारे चित्त में, तुम्हारे ह्रदय में बहुत दिनों से चल रहा है तो वह अपने आप मूर्त रूप ले ही लेता है, वह अपने आप प्रकट हो जाता है।  जो विचार लगातार चलता रहता है वो घटना को जन्म दे देता है वह आप चाहे चाहें, चाहे न चाहें; चाहे जाने, चाहे अनजाने वो विचार घटना में बदल जाता है, वह विचार कृत्य बन जाता है, वह विचार कर्म बन जाता है, यह मनोविज्ञान का सत्य है, ये कृष्ण और क्राइस्ट के अनुभव का भी सत्य है कि जो विचार लगतार तुम्हारे चित्त में चलता रहता है धीरे-धीरे तुम्हारी देह में प्रविष्ट हो जाता है।  इसी तरह जो विचार चलता रहा उस नवजवान के ह्रदय में उसने, उस विचार ने यांत्रिक रूप से काम करके उस बुढ़िया स्त्री को मार डाला।  किसी को कुछ हवा भी नहीं लगी की क्या हुआ, सारा गाँव जानता ही था कि बुढ़िया मरणासन्न है, मर गयी और वह सीधा-सादा विद्यार्थी था किसी को शक भी नहीं हुआ होगा, किसी प्रकार का संदेह भी नहीं हुआ उस नवजवान के बारे में लेकिन अपने घर में पड़ा-पड़ा वह घबराने लगा कि अब तो मैं पकड़ा जाऊँगा, जेल में डाल दिया जाऊँगा, सजा होगी, मेरी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी।  घबराता रहा और लगातार यही सोचता रहा कि अब मैं किसी भी समय पकड़ा जा सकता हूँ, किसी भी समय जेल में डाला जा सकता हूँ,  मुझे सजा हो जाएगी, मेरी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी, मैंने कितना बड़ा अनर्थ कर दिया, कितना बड़ा पाप कर दिया और कहते हैं की यही सोचते-सोचते महिना बीत गया, वह नवजवान घर से बाहर ही नहीं निकला।  सूखता गया – सूखता गया, खाना-पीना न खाया जाय उससे और कहते हैं ऐसा करते-करते दो महीने बीत गए और अपने कमरे में ही पड़ा-पड़ा सोचता रहा की अब पकड़ा जाऊँगा।  रास्ते से कोई निकलता, उसे आहट लगती, उसे अहसास होता कि जैसे वह पकड़ा जाने वाला है।  किसी जूते की चरमराहट होती तो सोचता कि पुलिस आ गयी, अब पकड़ने ही वाली है।  पोस्टमैन  आया तो सोचता की अब पकड़ कर उठा ही ले जायेगा, समझता की बस पुलिस वाली आ गए, पकड़ने वाले आ गए।  तीन महीने हो गए लेकिन कुछ भी नहीं हुआ, किसी को शक नहीं हुआ, लेकिन वास सोचता-सोचता भीतर-भीतर मरता रहा।  ये विचार घूमता रहा उसकी खोपड़ी में कि अब पकडे गए, अब पुलिसवाले आयेंगे, अब पकड़ ले जायेंगे, और जब घुमड़ते-घुमड़ते विचारों की पराकाष्ठा हो गयी, एक दिन उसके बर्दास्त के बाहर हो गया, सहा नहीं जा पा रहा था, वह भगा-भगा पुलिस-स्टेशन पहुँच जाता है और थानेदार के सामने हाथ उठाकर आत्म समर्पण कर देता है, कहता हैं अब मुझसे बर्दास्त नहीं हो रहा है, मैं आत्मसमर्पण करता हूँ, मैं हत्या की है।  तुम लोग मुझे पकड़ते क्यों नहीं हो, अब पकड़ लो मुझे, अब बर्दास्त से बाहर हो गया है, मैं पागल हुआ जा रहा हूँ, तुम पकड़ते नहीं हो।  पुलिस इंस्पेक्टर ने समझा की शायद इसका दिमाग चल गया है, ये परेशान हो गया है।  उस गाँव का बड़ा पढ़ाकू लड़का मन जाता था तो लोगों ने समझा कि ज्यादा पढ़ लिख लिया और पागल हो गया।  इंस्पेक्टर ने बहुत समझाया कि तू सीधा – सदा विद्यार्थी है, सीधा-सादा लड़का, तू क्यों हत्या करेगा बुढ़िया की। बुढ़िया वैसे ही गयी गुजरी 80 साल की, क्या मिलेगा तेरे को उसकी हत्या करके।  उसने वापस भेजा विद्यार्थी को, घर पहुंचा दिया लेकिन वह नवजवान बा-बार लौट आता पुलिस-स्टेशन – तुम लोग पकड़ते क्यों नहीं, मैं जानता हूँ मैंने हत्या की है, मेरे बर्दास्त से बहार है, जल्दी तुम मुझे सजा दिलाओ ताकि जो अपराध मैंने किया है उससे मुझे मुक्ति मिल जाये, तुम जल्दी मुझे सजा दो।

विचार कृत्य बन जाता है।  जो विचार उमड़ता रहा उसकी खोपड़ी में वही कृत्य बन गया, कोई उसे पकड़कर ले नहीं गया, लेकिन विचार अपने-आप उसे अपने-आप पकड़कर उठा ले गए और थाने तक पहुंचा दिया।  विचारों में बड़ी प्रबल शक्ति होती है इसलिए जब मैं 5 मिनट के लिए आपसे कहता हूँ की आँखें बंद करो और ऐसा विचार करो की सद्गुरु के माध्यम से अद्भुत शांति, अद्भुत आनंद, अद्भुत ऊर्जा की वर्षा हो रही है तुम्हारे ऊपर; अगर तुम ऐसी भावना लगातार करते जाओगे – 5 मिनट तो करो ही, जब भी खाली बैठो, आँखें बंद कर लो और भावना करो की शांति, आनंद और ऊर्जा की वर्षा हो रही है।

शुभ-शुभ का विचार, मौज का विचार जीतन ही तुम्हारे भीतर भरता जाये, वैसे ही तुम्हारे जीवन में कृत्य होने लगते है।  सबसे बड़ी प्रार्थना है – ‘शुभ संकल्पमस्तु शुभ-शुभ’।  आँखें बंद कर लो और भावना करो कि  शांति, आनंद, ऊर्जा की वर्षा हो रही है।  शुभ-शुभ का विचार, मौज का विचार जितना ही तुम्हारे भीतर भरता जाये वैसे ही तुम्हारे जीवन में कृत्या होने लगते हैं।  आनंद से भरा हुआ, शांति से भरा हुआ, मौज से भरा हुआ तुम्हारा जीवन है ऐसा विचार करो।  है, होगा नहीं, है, मौज में हूँ, आनंद में हूँ, शांति में हूँ, सद्गुरु की कृपा है।  है, होगा नहीं, है, वर्तमान में, अभी, यहीं और इसी क्षण है, अगर तुम ऐसा विचार करोगे तो ऐसा-ऐसा ही तुम्हारा व्यक्तित्व बनता जायेगा, ऐसी ही ऊर्जा तुम्हारे भीतर भरती जाएगी।  इसीलिए कहता हूँ – कभी उदास नहीं, कभी निराश नहीं, कभी मुरझाये हुए नहीं, कभी मर-मराये नहीं।  ऐसे उदास, निराश, मुरझाये, मरे-मराये से रहोगे तो बिना मारे ही मर जाओगे।  मौत को मारने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, तुम अपने-आप, तुम्हारे विचार ही तुम्हें मार डालेंगे।  जैसे उस नवजवान ने विचार किया कि ये बुढ़िया मर क्यों हैं जाती, सालों उसकी खोपड़ी में ये विचार चलता रहता था, उसके विचारों ने ही उसे मार डाला,  वो मारना नहीं चाहता था लेकिन उसके हाथ उस बुढ़िया की गर्दन तक पहुँच जाते हैं, और बुढ़िया को मार डालते हैं।  उसके विचारों ने मार दिया, मारना नहीं चाहता था वो और पुलिस-स्टेशन जाना नहीं चाहता था वो।  लेकिन जो विचार उसमें अपराध की भावना लाया  – पुलिस पकड़ने वाली है, पकड़ ले जाएगी – ये जो विचार आया, उन विचारों ने उसे पकड़वा दिया, थाने पहुँच गया वह।

जैसा-जैसा सोचोगे, वैसा-वैसा बनते जाओगे, मौज की सोचो – वही भर जाएगी तुम्हारी जिंदगी में, वही भर जाएगी।

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